सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उदभट् प्रस्तोता थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय

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 डॉ. राकेश मिश्र

अपने जीवन में सफ़लता की अनेक सीढियां चढ़ने के बाद पंडित जी ने स्वयं को पूर्ण रूप से देश के प्रति अर्पित कर दिया। 21 अक्टूबर सन् 1951 में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की तो 1951 से 1967 तक वे भारतीय जनसंघ के महामंत्री रहे।

अपने उच्च विचारों, आदर्शों और त्याग के कारण भारत के लोगों के हृदय में स्थान बनाने वाले और एकात्म मानववाद जैसी विचारधारा और राष्ट्रवादी चिंतन देनेवाले, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ व राष्ट्रीय जनसंघ के संस्थापकों में शामिल पंडित दीनदयाल उपाध्याय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रणेता भारत के सबसे तेजस्वी एवं यशस्वी चिंतकों में से एक रहे हैं।

25 सितम्बर सन् 1916 को चंद्रभान, फ़राह, जिला मथुरा, उत्तर प्रदेश में जन्म लेने वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी एक मध्यम वर्गीय परिवार से थे। जब दीनदयाल उपाध्याय की आयु महज़ ढ़ाई साल की थी, तब वे पितृविहीन हो गए, पिता की मृत्यु के बाद इनकी मां बीमार रहने लगी और 8 अगस्त 1924, पंडित जी के जीवन का सबसे दुखद दिन रहा। इसी दिन मां भी इन्हें छोड़कर चल बसी। महज सात साल की उम्र में दीनदयाल उपाध्याय माता-पिता के प्यार से वंचित हो गए। इसके बाद उनका पालन-पोषण उनके नाना के यहां होने लगा, 10 वर्ष की आयु में उनके नानाजी का भी देहांत हो गया। इसके बाद उनके मामा ने इनका पालन-पोषण शुरू कर दिया। छोटी सी उम्र में ही दीनदयाल उपाध्याय पर ख़ुद की देखभाल के साथ अपने छोटे भाई को सम्भालने की जिम्मेदारी आ गयी। कोई मनुष्य इन विपदाओं के आगे घुटने टेक देता,लेकिन उन्होंने दुखों का पहाड़ टूटने के बावजूद  हार नहीं मानी और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ते रहे। शिक्षा प्राप्त करने के लिए पंडितजी ने सीकर, राजस्थान के विद्यालय में दाखिला लिया, जहां माध्यमिक  परीक्षा में उन्होंने सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। दीनदयाल जी बचपन से ही बुद्धिमान और मेहनती थे। इन्होनें अपनी इंटर की शिक्षा बिरला कॉलेज, पिलानी से की तो वहीं सनातन धर्म कॉलेज, कानपुर से 1939 में स्नातक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। अपनी पढ़ाई को आगे जारी रखने के लिए सेंट जॉन्स कॉलेज, आगरा में दाखिला लिया और वहां से वे अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की पढाई करने लगे। उन्होंने  प्रथम वर्ष की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की, किन्तु ममेरी बहन के अचानक बीमार पड़ जाने के कारण वे उनकी सेवा में व्यस्त हो गये और पढाई अधूरी छोड़नी पड़ी। 1937 में कानपुर में अपनी बी.ए. की पढ़ाई के दौरान वे अपने सहपाठी बालूजी महाशब्दे और सुंदर सिंह भंडारी के साथ मिलकर समाज सेवा करने लगे। इन्ही दिनों वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी व भाऊराव देवरस जी से संपर्क में आए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से प्रभावित होकर संघ से जुड़ गए। संघ की शिक्षा का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए वे 1939 में संघ के 40 दिवसीय नागपुर शिविर का हिस्सा बने। अपने मामा के कहने पर पंडित जी प्रशासनिक परीक्षा में बैठे, उत्तीर्ण हुए, साक्षात्कार में भी चुन लिए गए, लेकिन नौकरी में रूचि नहीं  होने के कारण एल.टी. की पढाई करने प्रयाग चले गए। सन 1942 में उन्होंने एल.टी. परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली, यह उनके विद्यार्थी जीवन का आखिरी सोपान था। इसके बाद उन्होंने न विवाह किया और ना ही धनोपार्जन का कोई कार्य किया, बल्कि अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र निर्माण और सार्वजनिक सेवा में लगा दिया।
भाऊराव देवरस से प्रेरणा पाकर सन 1947 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने लखनऊ में “राष्ट्रधर्म प्रकाशन” स्थापित किया, जिसके अंतर्गत मासिक पत्रिका “राष्ट्रधर्म” प्रकाशित एवं प्रसारित की जाने लगी। बाद में “ पांचजन्य” साप्ताहिक और दैनिक समाचार पत्र “स्वदेश” का भी प्रकाशन यहां से हुआ। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी एक अच्छे  साहित्यकार व लेखक भी थे। 1946 में जब संघ से जुड़े किशोरों तक अपनी विचारधारा सरल शब्दों में पहुंचाने की बात आयी तो पंडित जी ने बिना किसी से कुछ कहे रातभर जागकर चाणक्य और सम्राट चन्द्रगुप्त को केंद्र में रखकर “सम्राट चन्द्रगुप्त” नाम से एक उपन्यास लिख डाला। अगली सुबह जब उन्होंने यह पुस्तक भाऊराव जी को दी तो सभी आश्चर्यचकित थे। इस उपन्यास की सफलता के बाद युवाओं के लिए भी कुछ ऐसे ही लेखन की मांग उठी। तब उन्होंने “जगद्गुरु शंकराचार्य” नाम से अपना दूसरा उपन्यास लिखा।
अपने जीवन में सफ़लता की अनेक सीढियां चढ़ने के बाद पंडित जी ने स्वयं को पूर्ण रूप से देश के प्रति अर्पित कर दिया। 21 अक्टूबर सन् 1951 में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की तो 1951 से 1967 तक वे भारतीय जनसंघ के महामंत्री रहे। 29 दिसम्बर 1967 को उन्हें पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया गया। विडम्बना ही कही जायेगी कि पंडित जी सिर्फ 44 दिनों तक ही बतौर अध्यक्ष कार्य कर पाए। 1952 में कानपुर में हुए पार्टी के पहले अधिवेशन में पंडितजी को महामंत्री निर्वाचित किया गया। यहीं से अखिल भारतीय स्तर पर राजनीतिक यात्रा प्रारंभ हुई। पंडित जी ने प्रथम अधिवेशन में ही अपनी वैचारिक क्षमता का परिचय देते हुए सात प्रस्ताव प्रस्तुत किये और सभी को पारित कर दिया गया। उनकी कार्यक्षमता, परिश्रम और परिपूर्णता के गुणों से प्रभावित होकर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था- यदि मुझे ऐसे दो दीनदयाल मिल जाएं तो मैं देश का राजनीतिक मानचित्र बदल दूंगा। डॉ. साहब की यही बातें पंडित जी का हौंसला और भी बढ़ाती गई। पंडितजी राष्ट्रनिर्माण व जनसेवा में इतने लीन थे कि उनका कोई व्यक्तिगत जीवन ही नहीं रहा, बांकी का जीवन संघ और जनसंघ को मजबूत बनाने और इन संगठनो के माध्यम से राष्ट्र की सेवा करने में अर्पित कर दिया। दीनदयाल उपाध्याय जी के विचार उन्हें औरों से बिल्कुल अलग साबित करते हैं। उनकी अवधारणा और चिंता का विषय था कि लम्बे समय तक की गुलामी के पश्चात कहीं पश्चिमी विचारधारा भारतीय संस्कृति पर हावी न हो जाए। भारत एक लोकतांत्रिक देश बन चुका था, परन्तु पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के मन में भारत के विकास को लेकर चिंता थी। वे मानते थे कि लोकतंत्र भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार है न कि अंग्रेज़ो का एक उपहार। उनका मकसद था कि कर्मचारियों और मज़दूरों को सरकार की शिकायतों के समाधान पर ध्यान देना चाहिए और प्रशासन का कर्तव्य होना चाहिए कि वे राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान करे। दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ के राष्ट्रजीवन दर्शन के निर्माता माने जाते हैं। उनका उद्देश्य स्वतंत्रता की पुनर्रचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्वदृष्टि प्रदान करना था। उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए एकात्म मानववाद की विचारधारा दी। उन्हें जनसंघ की आर्थिक नीति का रचनाकार माना जाता है। उनका विचार था कि आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य सामान्य मानव का सुख है। उनके अनुसार लोकतंत्र अपनी सीमाओं से परे नहीं जाना चाहिए और जनता की राय, उनके विश्वास और धर्म के आलोक में सुनिश्चित करना चाहिए, यही देश की उन्नति और प्रगति के लिए श्रेष्ठ होगा।
भारत में रहने वाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं। उनकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा। “वसुधैव कुटुम्बकम्” भारतीय सभ्यता से प्रचलित है। इसीके अनुसार भारत में सभी धर्मों को समान अधिकार प्राप्त हैं। संस्कृति से किसी व्यक्ति, वर्ग, राष्ट्र आदि की वे बातें, जो उसके मन, रुचि, आचार, विचार, कला-कौशल और सभ्यता की सूचक होती हैं, पर विचार होता है। दीनदयाल जी ने एकात्म मानववाद के आधार पर एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की, जिसमे विभिन्न राज्यों की संस्कृतियां विकसित हों और एक ऐसा मानव धर्म उत्पन्न हो जिसमे सभी धर्मों का समावेश हो, जिसमें व्यक्ति को सामान अवसर और स्वतंत्रता प्राप्त हो जो एक सुदृढ़, सम्पन्न एवं जागरूक राष्ट्र कहलाए। हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था का केंद्र ‘मानव’ होना चाहिए। भौतिक चीजें मानव के सुख के साधन हैं, साध्य नहीं। पंडित जी का मानना था कि व्यक्ति का अर्थ सिर्फ उसका शरीर नहीं है, बल्कि उसका मन, बुद्धि, और आत्मा भी है। यदि इन चारों में से किसी एक की भी उपेक्षा की जाए तो व्यक्ति का सुख विकलांग हो जाएगा।
11 फ़रवरी 1968 को पंडित जी इस संसार को छोड़ गये। इस महान नेता, पत्रकार, सहित्यकार, अर्थशास्‍त्री, चिंतक और विचारक का निधन सभी को अचंभित कर दिया था। उनके विचार आज भी देश को प्रगति के मार्ग पर ले जा रहे हैं और यह उनकी ही देन है कि देश में लोकतंत्र का मतलब सबके लिए एक समान है। वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री श्री अमित शाह जी उनके चिंतन को साकार कर रहे हैं। श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने पर एकात्ममानववाद और अन्त्योदय को मूर्त रूप दिया गया। परमब्रह्म में विलीन होने के बाद भी पंडितजी अपनी लेखनी, ज्ञान, शिक्षा और उच्च विचारों से आज भी हमारे बीच जीवंत हैं। ऐसे महान व्यक्तित्व को हम शत् शत् नमन करते हैं। पुण्यतिथि पर प्रेरणापुरुष पं. दीनदयाल उपाध्याय जी को विनम्र श्रद्धांजलि।

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