धन वही नहीं जो तिजोरियाँ भरता है

धन के बारे में आम तौर पर यही माना जाता है कि रुपए-पैसे और सोना-चाँदी ही धन है जिन्हें बैंक या घरों के भण्डार में सायास सहेजकर सुरक्षित रखा जाता है अथवा विनिमय में प्रयुक्त होता है। और माना जाता है कि चोर-डकैतों की निगाह इसी धन पर होती है।

धन अपने आपमें दुनियावी आकर्षण का वह महामायावी स्वरूप है जो हर किसी की दृष्टि में विकार पैदा कर सकता है, स्वभाव में अचानक बदलाव ला सकता है और सारी मर्यादाओं का हनन करते हुए कहीं भी, कुछ भी ढा सकता है।

लेकिन धन के बारे में हमारी यह धारणा अत्यन्त संकुचित और अपूर्ण ही है।  धन हर इंसान के जीवन में कई पहलुओं को प्रभावित करता है। हमारे पूरे जीवन में कई सारे विषय हैं जो हमें धनहीन करने के लिए हमेशा उद्यत रहते हैं। हमारी जिंदगी के सुख-चैन, प्राण, संबंध, सेहत और मानसिक तुष्टि, संतोष, प्रतिष्ठा, आनंद, शांति, शुद्ध-बुद्ध मन-मस्तिष्क और व्यवहार, स्वभाव और मनुष्यता के सभी गुणधर्मों से व्यक्ति को धनी होना चाहिए।

अकेले धन-वैभव, जमीन-जायदाद और पद-प्रतिष्ठा या प्रभाव वाले भी धनी माने जाएं, यह जरूरी नहीं। धन का संबंध इंसान के हर पहलू से है और असल में वही धनी है जिसके पास सहज जीवनयापन के लिए  जरूरी सारे संसाधनों और परिस्थितियों की उपलब्धता है। आजकल धनहीन करने के ढेरों उपकरण उपलब्ध हैं, माहौल में हर तरफ उन्हीं हवाओं का बोलबाला है जो निरन्तर क्षरण करते हुए जीवन रिसने के सारे रास्तों का पता दे रही हैं।

इंसान जितना प्रकृति के करीब, अपनी मौलिकता और मूल स्वभाव के साथ होता है तभी तक उसे धनी कहा जा सकता है। जैसे-जैसे वह इनसे दूर होता जाता है वह निर्धनता की ओर डग भरने लगता है और अपना मूल धन, मौलिकता खो देता है। यह मौलिकता उसे ईश्वरप्रदत्त होती है। पर मनुष्यों की ओर भागने, स्थूल संसाधनों पर विवेकहीन होकर ललचाने तथा इन्हें जमा करने की अंधाधुंध मनोवृत्ति के आ जाने पर उसके भीतर से मौलिकता का गुणधर्म भी समाप्त हो जाता है और वह अपने मूल स्वभाव से भी भटकने लगता है।

असली धनी वही है जो प्रकृति के करीब और सहज है, शेष सारे आधे-अधूरे हैं और  ज्यों-ज्यों अपने मूल स्वभाव से भटकते हुए प्रकृति से दूर जाने लगते हैं, त्यों-त्यों किश्तों-किश्तों में निर्धन होते चले जाते हैं। धन-दौलत के दीवानों के पास अपार सम्पदा हो लेकिन सेहत का धन न हो, तो उसे धनी नहीं कहा जा सकता।

खूब सारा प्राप्त और जमा कर चुकने के बावजूद संतोष न हो, तन-मन और मस्तिष्क मलीन हो जाएं, चेहरों पर अहंकार का दंभ या कालिख पुत जाए, अपने आपको इंसान समझना ही भूल जाएं और जानवरों, असुरों या डकैतों की तरह व्यवहार करने लगें, संचित धन की सुरक्षा की चिंता दिन-रात सताये रखे, नींद गायब हो जाए, मानसिक परेशानियों और उद्विग्नताओं का साथ हमेशा बना रहने लगे, स्वास्थ्य का पाया कमजोर होने लगे, इतनी बीमारियां हो जाएं कि दाल-रोटी की बजाय दवाइयों का नाश्ता करना पड़े, ऎसे लोगों का कैसे धनी माना जा सकता है।

यों भी जो लोग मुद्राओं और सोने-चाँदी को ही धन मानते हैं उनके साथ अन्न-पानी बगावत कर देता है और ऎसे लोगों का धनीय संतुलन तथा अनुपात गड़बड़ा जाता है। जिसे हम धन मानकर फूल कर कुप्पा हो रहे हैं उसी को पाने तथा संचित रखने के तनावों से सेहत का धन अपने पास से सरक जाए, वो धन किस काम का।

असली धन वही है जिसमें इंसान की जिंदगी को सुकून देने वाले सभी प्रकार के धन उपलब्ध हों तथा इनका पूरा-पूरा संतुलन हमेशा बना रहे। इसके बगैर जो लोग सिर्फ पैसों और रजत-स्वर्ण को ही धन मान बैठे हों, उनके जीवन में दूसरी प्रकार के धनों का अभाव व असंतुलन निश्चय ही विषमता पैदा करने वाला ही होगा, इसमें कोई संशय नहीं है।

आज धनतेरस और धन्वन्तरि जयन्ती यही संदेश देती है कि धन के व्यापक अर्थों को समझें और जीवन में सभी प्रकार के धन के मध्य संतुलन बनाए रखें अन्यथा कोई सा अनुपात गड़बड़ा जाने पर निधन होने का खतरा हमेशा बना रहता है। उन सभी उपकरणों, स्वभाव और आदतों के साथ बदचलन हवाओं से बच कर रहें तो हमें अंधेरे में रखकर निर्धनता की ओर ले जा रही हैं।  प्रकृति के समीप रहें और असली धनवान होने का सुख प्राप्त करें।

धनतेरस की सभी को शुभकामनाएं ….।

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