उल्लूओं की तरह भागते न फिरें

असली धन है संतोषी जीवन

आजकल इंसान की सर्वाधिक दौड़ धन की ओर लगी हुई। इसमें दो किस्मों के लोग हैं। एक वे हैं जो धर्म एवं नीति संगत कार्यों और स्वयं के पुरुषार्थ से धन संग्रह करते हुए पूरी मस्ती के साथ जीवन जीते हैं। दूसरे प्रकार में वे लोग हैं जिन्हें पुरुषार्थ से कहीं अधिक भरोसा अपनी कुटिल बुद्धि और चातुर्य पर है तथा गोरखधंधों और बिना मेहनत-मजदूरी किए सब कुछ अपने अधिकार में कर लेने की मनोवृत्ति हावी है।

हड़पाऊ स्वभाव त्यागें

इन लोगों के लिए धनसंचय के लिए किसी भी प्रकार के अधर्म, अनीति और अन्याय को स्वीकार कर इनके उपयोग मेंं कहीं कोई लाज-शरम नहीं आती। इनका मकसद सिर्फ और सिर्फ यही है कि चाहे जिस तरह भी हो सके जमीन-जायदाद अपनी होनी चाहिए। ऎसे लोग जिन्दगी भर पराये लोगों की जमीन, जायदाद और अधिकारों को हड़पने में लगे रहते हैं।

पुरुषार्थी बनें

इन लोगों के जीवन का मकसद हराम की कमाई करना ही होता है चाहे इसके लिए औरों को कितना ही कष्ट क्यों न दिया जाए।  इनके जीवन में पुरुषार्थ नाम का कोई तत्व शेष नहीं रहता। ये मानते हैं कि जो कुछ इस संसार में है वह पूरा इनका है और जब जाएंगे तब सारा कुछ साथ ले जाएंगे। नहीं ले जा पाएं तो कम से कम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए इतना कुछ कर जाएंगे कि वे भी याद रखेंगी।

याचकों की तरह बर्ताव न करें

इन लोगों को यह भ्रम सदैव बना रहता है कि दुनिया में उन्हीं की पूछ होती है जिनके पास बेहिसाब धन-दौलत होती है। अपने आपको ऎसे लोग कितने ही धनवान क्यों न मानें मगर हकीकत यह है कि ये लोग अपार धन-दौलत, भोग-विलासिता के तमाम ऎश्वर्यों, संसाधनों के होते हुए भी कई मामलों में भिखारियों से भी गए गुजरे होते हैं।

जहाँ पैसा खूब, वहाँ दूसरे अभाव

इनके पास कहने को धन के नाम पर रुपया-पैसा, चाँदी-सोना और वैभव जरूर होता है लेकिन ये दूसरे सारे पहलुओं में दरिद्री और घटिया किस्म के निर्धन हुआ करते हैं। ऎसे धनी और हरामखोर लोग अपने पास कितना ही संचय क्यों न कर लें मगर प्रसन्नता, मानसिक एवं शारीरिक आरोग्य, सुकूनदायी जिन्दगी से लेकर सभी दृष्टियों से निर्धन होते हैं। इनका पूरा जीवन गोलियों, इंजेक्शनों पर गुजरता है। कई लोग तो रोजाना गोलियाेंं का नाश्ता ही करते हुए लगते हैं। खूब सारे लोग ऎसे हैं जो हमेशा जात-जात की दवाइयां हमेशा अपने साथ रखने को विवश हो गए हैं।

स्वाभाविक मुस्कान गायब

अपार संपदा प्राप्त होने के बाद भी व्यक्ति का चित्त प्रसन्न न हो, लाख कोशिशों के बाद भी चेहरे पर उन्मुक्त खुशी के भाव न आ पाएं, बीमारियां घेर लें, आम आदमी के लायक खाना-पीना भी न कर सकें, मस्ती से सो नहीं पाएं, औरों को दुःखी करते रहें तथा उन सभी प्रकार के आनंदों से दूर हो जाएं, जो एक आम आदमी मौज-मस्ती के साथ बिना परिश्रम के पा लेता है, ऎसी स्थिति में इन धनाढ्यों और अपार वैभवशाली लोगों की जिन्दगी भिखारियों से कहाँ अच्छी होती है?  आज कितने लोग ऎसे रह गए हैं जिनके चेहरे पर सहज स्वाभाविक रूप से मुस्कान तैरती रहती है।

जहाँ शुचिता, वहीं आनंद

जीवन में धन और आरोग्य का सीधा संबंध है जो मनुष्य के समझदार होने से लेकर मरने के बाद तक गूंजता रहता है। जहाँ धन में शुचिता होगी वहाँ आरोग्य अपने आप आ ही जाएगा। और जहाँ धन में पुरुषार्थ और पवित्रता का अभाव रहेगा, वहाँ कोई भी व्यक्ति अपार वैभव सम्पन्न तो कहा जा सकता है लेकिन लक्ष्मीवान और आरोग्यवान कभी नहीं हो सकता।

आरोग्य धन सबसे बड़ा

आरोग्य वहीं रहता है जहाँ लक्ष्मी हो। जहाँ कहीं अलक्ष्मी है, पुरुषार्थहीनता है, हराम की कमाई हो, लोभ-लालच और दबावों से कमाया पैसा आ जाए, वहाँ कभी भी आरोग्य नहीं रह सकता। इसके साथ ही संतोष सबसे बड़ा धन है जिसके आ जाने पर चित्त की उद्विग्नताएं और असीमित कामनाओं का ज्वार समाप्त हो जाता है।

बेहतर जिन्दगी जीने के लिए मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य जरूरी है। हम सभी को यह समझने की आवश्यकता है कि आरोग्य और संतोष का धन पाने के लिए पुरुषार्थ और जीवनशैली के हर पहलू में शुचिता सर्वोपरि है अन्यथा तैयार रहें उन सभी हालातों के लिए जो आजकल अधर्म और अनीति से धन-दौलत पाने वाले भुगत रहे हैं।

धनतेरस एवं भगवान धन्वन्तरि जयंती पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ …..

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