आरंभ हुआ व्यवस्था परिवर्तन का दौर

डॉ0 वेद प्रताप वैदिक की कलम  से

प्रांतीय चुनावों से मुक्त होते ही सरकार ने तेजी से काम करना शुरु कर दिया है। इसके तीन स्पष्ट संकेत हमारे सामने हैं। पहला श्रम−सुधार की घोषणा, महत्वपूर्ण सचिवों की अदला−बदली और ‘मनरेगा’ का रुपांतरण! यदि इन तीनों परिवर्तनों को एक साथ रखकर देखें तो आशा बंधती है कि इस वर्ष के अंत तक यह सरकार देश के सामने कुछ ठोस उपलब्धियां प्रस्तुत कर सकेगी। दूसरे शब्दों में लोग शायद महसूस करने लगें कि सरकार बदली है तो अब व्यवस्था भी बदल रही है।

हमारी व्यवस्था में कई दोष हैं लेकिन आम आदमी जिन बातों से सबसे ज्यादा खफा होता है, वे हैं नौकरशाही जंजाल और भ्रष्टाचार! इन दोनों की धारावाहिकता अंग्रेज़ के जमाने से चली आ रही है। कई आयोग बैठाए गए, कई कानून बनाए गए और कई लोग दंडित भी हुए लेकिन परनाला वहीं का वहीं बह रहा है। यह इसीलिए हो रहा है कि नौकरशाही और भ्रष्टाचार एक दूसरे को बढ़ावा देते हैं। कोई भी सरकारी काम हो, उसे नौकरशाही के जंजाल में ऐसा फंसा दिया जाता है कि उससे पिंड छुड़ाने के लिए मोटी ‘दक्षिणा’ देनी पड़ती है। इस कु−व्यवस्था के आगे सब बेबस हैं। अब जो श्रम−सुधारों की घोषणा नरेंद्र मोदी ने की है, उसका सुप्रभाव संगठित क्षेत्रों में काम कर रहे करोड़ों मजदूरों के जीवन पर पड़ेगा।

मोदी ने नया नारा दिया। श्रमेव जयते। याने श्रम की विजय हो। यदि हम लालबहादुर शास्त्री की भाषा का इस्तेमाल करें तो कह सकते हैं कि ‘जय जवान−जय किसान’ की तरह एक प्रधानमंत्री ने पहली बार ‘जय−मजदूर’ का नारा दिया है। उन्होंने अपने भाषण में मजदूरों को मिलनेवाली कम लज्जत (मजदूरी) और कम इज्जत का भी जिक्र किया है। मजदूरों की लज्जत और इज्जत बढ़े, ऐसी हमारी श्रम नीति होनी चाहिए। उसका लक्ष्य ऐसा हो कि मजदूर ‘श्रम योगी’ बन सकें और वे राष्ट्र−निर्माता की भूमिका निभाएं। उन्होंने श्रम−कानूनों में सुधार के लिए विधेयक संसद में पहले से पेश कर रखे हैं। ‘दीनदयाल उपाध्याय श्रमेव जयते’ योजना की घोषणा करते समय उन्होंने मजदूरों की भविष्य निधि के संबंध में ऐसी खाता संख्या देने की बात कही है, जिससे नौकरियां बदलने में उन्हें नुकसान न हो। इसी प्रकार प्रशिक्षु मजदूरों को भी उनकी पहले दो वर्ष के प्रशिक्षण के दौरान उनकी आधी प्राप्तव्य राशि सरकार देगी। इसके अलावा भविष्य निधि में पड़े हुए 27 हजार करोड़ रु. के शीघ्र बंटवारे का प्रस्ताव भी उन्होंने रखा। इस राशि के दावेदारों का ही पता नहीं है। जाहिर है कि इन सुधारों से देश के उन मजदूरों को सीधा लाभ मिलेगा, जो संगठित उद्योग कारखानों में काम करते हैं।

उद्योगपतियों ने मोदी की घोषणा का भरपूर स्वागत किया है लेकिन वामपंथी नेताओं और मजदूर संघों ने काफी संदेह व्यक्त किया है। यदि नरेंद्र मोदी उन करोड़ों मजदूरों के लिए भी कुछ कहते, जो फुटकर मजदूरी करते हैं तो वामपंथियों के आरोप में कुछ दम नहीं रह जाता। देश में जो लोग 28 रु. और 32 रु. रोज पर गुजारा करते हैं, ये वही लोग हैं। उन्हें कम से कम कितनी मजदूरी मिलनी चाहिए और साल में कितने दिन मिलनी चाहिए, यह भी कोई सरकार तय करेगी कि नहीं? सिर्फ 4−5 करोड़ मजदूरों की चिंता करना काफी नहीं है। ज्यादा जरुरी देश के 40−50 करोड़ मजदूरों की चिंता करना है। मोदी ने भी कहा है कि श्रम−सुधारों का लक्ष्य सिर्फ उद्योगपतियों का नहीं, मजदूरों का लाभ करना प्रमुख है।

उद्योगपति खुश हैं कि अब वे नौकरशाहों के चंगुल में फंसने से बचेंगे। अब कोई उद्योग शुरु करने के लिए 16 फार्म भरने की बजाय एक ही अर्जी से काम पूरा हो जाएगा। आज देश में कोई छोटे से छोटा उद्योग लगाना हो तो लगभग 50 कानूनों का पालन करना पड़ता है। यह घटकर अगर सिर्फ 5 रह जाएं तो क्या कहने? अब इंस्पेक्टर राज भी खत्म होगा। उद्योग कारखानों में सरकारी इंस्पेक्टर के पहुंचते ही मालिकों की खाट खड़ी हो जाती है। मैनेज़रों के वेतन से ज्यादा इंस्पेक्टरों की दक्षिणा होती है। यह दक्षिणा ऊपर तक बंटती हुई चली जाती है। अब नई व्यवस्था कंप्यूटरीकृत होगी। निहित स्वार्थ निष्क्रिय हो जाएगा। कौन इंस्पेक्टर कहां जाएगा, यह लॉटरी से तय होगा। बंधी−बंधाई दक्षिण का क्रम टूटेगा। 72 घंटे के अंदर उसे रपट देनी होगी। सब कुछ वेबसाइट पर देखा जा सकेगा। यह हुई, पारदर्शिता! इसके बावजूद भ्रष्टाचार रहेगा, लेकिन वह फिर आटे में नमक के बराबर रह जाएगा। जाहिर है कि इन सुधारों से उद्योगों को जबर्दस्त प्रोत्साहन मिलेगा।

मजदूर संघों को भय है कि उद्योगपतियों की जितनी ताकत बढ़ेगी, मजदूर उतने ही कमजोर होंगे। ऐसा होना जरुरी नहीं है। यदि उद्योगपति रिश्वत के बिना अपना काम−धंधा करेंगे तो उनका सालाना मुनाफा बढ़ेगा, जिसके आधार पर वे मजदूरों का वेतन भी बढ़ा सकते हैं। यदि उद्योग−धंधों में स्वच्छता का वातावरण रहे तो आम उपभोक्ताओं को भी काफी राहत मिल सकती है। श्रम−सुधार करते समय सरकार को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि मजदूर अपना काम पूरी ईमानदारी से करें बल्कि जितना काम, उतना वेतन का सिद्धांत लागू किया जाए। चीन के कई बड़े−बड़े कारखानों में इस नियम को काम करते हुए मैंने अपनी आंखों से देखा है। चीन की उन्नति का यह भी एक रहस्य है।

इसी प्रकार मोदी सरकार का यह फैसला भी सही है कि ‘मनरेगा’ को 640 जिलों से समेटकर 200 जिलों में ही जारी रखा जाए। ये सबसे पिछड़े जिले होंगे। महात्मा गांधी के नाम पर ग्रामीण मजदूरों को रोजगार देने के लिए शुरु की गई इस योजना में अरबों रु. खर्च हो गए हैं। इससे ग्रामीण गरीबों को कुछ राहत जरुर मिली है लेकिन न तो इस खर्च से कोई उल्लेखनीय निर्माण हुए हैं, न ही मजदूरों का कार्य−कौशल बढ़ा है और न ही उन्हें पेट भर रोटी मिली है। साल भर में सिर्फ 100 दिन तक 137 रुपए रोज़ की बेगार मिलने का लाभ बहुत सीमित है। यह काम के बदले मजदूरी कम है, बेगारी भत्ता ज्यादा है। 3 लाख करोड़ रु. बंट गए लेकिन उनसे बना क्या? कौनसे पुल, कौनसी नहरें, कौनसे भवन, कौनसी ग्रामीण बस्तियां, कौनसी पशुशालाएं− मनरेगा के खर्च से बनी हैं? इसीलिए अब मजदूरी और माल−खर्च का अनुपात 60:40 से घटाकर 51:49 कर दिया गया है। यदि सरकार न्यूनतम मजदूरी 250 रुपए कर दे और बड़ी−बड़ी योजनाएं ग्रामीण मजदूरों को सम्हला दे तो पांच साल में वे चमत्कार कर दिखाएंगे।

उक्त दोनों सुधारों के अलावा केंद्र सरकार ने अपने कई महत्वपूर्ण विभागों में नए सचिवों को नियुक्त किया है। पिछले पांच माह की अवधि में सरकार ने यह समझ लिया है कि उसे अपने व्वयस्था−परिवर्तन के बड़े काम के लिए कैसे सचिवों की जरुरत है। आशा है कि ये नए सचिव नई सरकार के नए कार्यक्रम को मजबूती से लागू करेंगे ताकि नए साल की शुरुआत के पहले ही लोग नए विहान की उष्मा का अनुभव कर सकें।

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