अचूक प्रभाव है लक्ष्मी मंत्रों का

–  आचार्य योगिता

दीपावली के उपलक्ष्य में श्रीलक्ष्मी माता की विशेष उपासना की जाती है उनकी उत्पत्ति का विषय यामल ग्रन्थों में वर्णित है। श्री लक्ष्मी को कमला एवं सौभाग्य लक्ष्मी भी कहते हैं। मुख्य श्री तो श्रीविद्या महात्रिपुर सुन्दरी ही है। जब समुद्र मन्थन हुआ तब कमलात्मिका लक्ष्मी उत्पन्न हुई। उन्होंने श्री महात्रिपुर सुन्दरी से ऎक्य प्राप्त करने हेतु बहुत आराधना की जिससे प्रसन्न होकर श्रीमहात्रिपुर सुन्दरी ने अपने में ऎक्य कर दशमहा विद्याओं में एक महाविद्या बना दिया और श्री के नाम से ही कमलात्मिका को लोक प्रसिद्ध होने का वरदान देकर वे अन्तर्धान हो गई। लक्ष्मी के अनेक भेद हैं जिसका विशेष विस्तारपूर्वक वर्णन पूजन साधना आदि शाक्त प्रमोद में स्तवन नारद, पंचरात्र, मंत्र महोदधि, श्रीविद्यार्णव आदि ग्रन्थों में है।

एकाक्षरी से लेकर चतुरक्षरी अष्टाविंशति अक्षर धन आदि का वर्णन शास्त्रों में वर्णित है। सो गुरु द्वारा पूर्ण रूप से साधक समझकर ज्ञान प्राप्त करें। इसके मंत्र ध्यानादि के अनन्त भेद हैं। कमला वैष्णवी शक्ति है। महाविष्णु के लीला विलास की सहचरी कमला की उपासना जगदाधार शक्ति की उपासना है। महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए मानव, दानव, देव आदि सभी लालायित रहते हैं। जितनी सांसारिक संपदाएं हैं वे इनकी कृपा से ही प्राप्य हैं। निगम और आगमों में महालक्ष्मी की उपासना के अनेक भेद व विधान उपलब्ध हैं। वैसे लक्ष्मी के सोलह भेद हैं जिसे षोड़श लक्ष्मी कहते हैं। लक्ष्मी के पाँच भेद प्रमुख हैं जिनमें 1. सौभाग्य लक्ष्मी, 2. महालक्ष्मी, 3. त्रिशक्ति लक्ष्मी, 4. साम्राज्य लक्ष्मी और 5. सिद्धि लक्ष्मी का समावेश है। आम्नाय भेद से ऊध्र्वाम्नाय पश्चिमाम्नाय आदि में श्री विद्यालक्ष्मी, राजलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी की उपासना करते हैं। इस प्रकार इन तीनों को मिलाकर अष्ट लक्ष्मी की उपासना करते हैं। मतभेद से दो रूपों में विभक्त कर अन्यान्य नामों से षोड़श लक्षि्मयाँ पूज्य हैं। जिनकी पूजा श्रीयंत्र में की जाती है। विशेष पूजन श्रीसूक्त से किया जाता है।

महालक्ष्मी आद्या शक्ति हैं। लक्ष्मीजी सुवर्ण के समान कान्तिवाली स्मितवदना कमलानना कमल दल नयन युगला और अतिशय सुन्दरी हैं। चतुर्भुजा कमलयुगल उनन्नय वर आदि चारों हाथों में धारण किये हुए हैं।

 लक्ष्मी उपासना के लिए श्री यंत्र प्रमुख है। जिस पर श्री साधना की जाती है। श्रीयंत्र पूजा में यति दण्डैश्वर्य विधान में सोलह आवरणों में सोलह लक्षि्मयों की पूजा होती है। एकादशावरण में स्पन्दिचक्र में गायत्री के 32 नामों से भी पूजा की जाती है। इस प्रकार गायत्री साधना में भी श्री यंत्र की महत्ता है। तंत्र साधना में बाह्य पूजा से अन्तर पूजा की महत्ता है। अन्तर योग से शरीरन्तर नाड़ियों की जागृति होकर अन्तर चक्र जाग्रत होते हैं जिससे साधक के मन के संकल्पों की सिद्धि होती है। दीपावली के पाँच दिवस महत्वता के हैं। धनतेरस से कार्तिक शुक्ल द्वितीया तक रात्रि में नौ बजे से बारह बजे तक बाला बीज के जप अथवा परा प्रासाद बीज के जप करता है उस पर लक्ष्मी की कृपा होती है। साधना गुरु द्वारा जान कर करने से श्रेष्ठ लाभ होता है। हरेक देवी देवताओं की पूजा हेतु श्रीयंत्र उपयुुक्त है।

लक्ष्म्यादि मंत्रों का सूक्ष्म प्रयोग कूर्म पुराण एवं सार संग्रह के अनुसार – श्रियं ददाति विपुलां पुष्टि मेधां यशोबलं। अर्चिता भव तापध्नी तस्माल्लक्ष्मीं समर्चयेत। अथोच्यते रमामन्त्रान् लक्ष्मी सौभाग्यदा भृशम्। दुर्गत्युद्धारणे शक्तास्ति्रवर्ग फलदायकाः। एकाक्षरो रमामंत्रो मनोरथ सुरद्रुमः॥

मन्त्र विधान के तीन प्रकार हैं –

  1. एकाक्षर मंत्र – ‘श्रींं’ है। इसी को चिन्तामणि मंत्र भी कहा गया है।

इसके ऋषि भृगु निचृत् छन्द और श्रीदेवता है। श्रां, श्रीं, श्रूं श्रैं श्रौं श्रः इनसे कर-षडङ्ग न्यास व हृदय न्यास करने चाहिये। इससे पहले ‘सौभाग्य संपत्प्राप्तये जपे विनियोगः’ का विनियोग करना वचाहिए।

इसके उपरान्त देवी का निम्न ध्यान किया जाता है –

कान्त्या कान्चन सन्निभां हिमगिरि प्रख्यैश्चतुभिर्गजै-

र्हस्तोत्कि्षप्त हिरण्ययामृत धरै रासिच्य मानां श्रियं

बिभ्राणां वरमब्ज युग्म मभयं हस्तैः किरीटोज्वलां

क्षौमा बद्धनितम्ब ललितां वन्देऽरविन्द स्थिताम्॥

इस प्रकार धन कर मानसिक पूजा कर अनन्य चित्त से जप करने से सौभाग्य सुख व लक्ष्मी प्राप्ति होती है। इसके अलावा चतुरक्षरी मंत्र, साम्राज्यलक्ष्मी एवं सर्वमंगला आदि मंत्र हैं जो कि त्रिपुरेशी की नित्यायें हैं। किसी एक मंत्र की विधि जानकर दीपावली के पाँच दिवसों में रात्रिमें जप करने से लक्ष्मी प्रसन्न होती है। पुरश्चरण पद्धति से प्रयोग करने से अनन्त लाभ प्राप्त कर साधक सुखी होता है।

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