करें आवाहन उजालों का

बहुत हो चुका, खूब भटकते रहे हैं हम, हर बार रोशनी का दरिया उमड़ाते रहते हैं फिर भी जाने क्यों ये अंधेरा पसरने लगता है हमारे भीतर, आस-पास, और दूरदराज तक।

जिधर नज़र दौड़ाएं अंधेरों का कोई न कोई कतरा किसी न किसी परछाई के साथ उभर कर सामने आता-जाता रहता है।

कभी डरावना लगता है और कभी विवश होकर स्वीकारना ही पड़ता है अंधेरों के वजूद को। कहीं अंधेरा खुलकर सामने आ जाता है ढेर सारी चुनौतियाें के साथ ललकारते हुए, कभी दबे पाँव हमारे आगे-पीछे घूमता हुआ भ्रमित करता है, कभी किसी कोने के दुबका हुआ जाने कैसे-कैसे सन्नाटों को जन्म देता है।

अंधेरा कहीं एक जगह हो तो बताएं, यहाँ तो अंधेरों ने हर कहीं घर बना रखा है, कहीं अंधेरों की धर्मशालाओं में रातों के उत्सव होने लगे हैं, कई मयखानों और दरीखानों में अंधेरा मुजरा करता हुआ दिखता है।

सब तरफ ऎसा तो कुछ जरूर है जो अंधेरों को वजह-बेवजह पनाह दे रहा है, अंधेरों का प्रजनन करते हुए उसे अंगुली पकड़ कर यौवन तक ले जा रहा है और सौंप देता है कोई सा काम जो अंधेरों में होता है या अंधेरों के लिए।

जहाँ अंधेरों का वजूद प्रसूत नहीं होता दिखता वहाँ किसी न किसी दबाव, लोभ-लालच या स्वार्थ के कृत्रिम गर्भाधान से अंधेरों का जन्म करा देने के सारे हुनरों का कमाल खुलकर दिखता है।

अंधेरों का वंश खूब लम्बा है, इसका फ्यूज वायर ही ऎसा है कि जाने कितने-कितने सम-विषम सिरों को एक साथ जोड़कर अंधेरों का परचम लहरा ही देता है।

कभी किसी के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता, ऎसे-ऎसे मरणधर्मा लोग अंधेरों के अंधानुचर बने हुए हैं, अंधेरों को माई-बाप मानकर चुपचाप पूजते चले आ रहे हैं।

अंधेरा सब तरफ बेरहमी और बेशरमी से पसरा हुआ है। कहीं सफेद हाथियों के पूरे झुण्ड पर अंधेरे की कालिख पुती हुई है, कहीं कहारों के जिस्म पर।

लिबास भी जात-जात की कालिख से सने हुए हैं और टोपियां भी। कटे-फटे झण्डे सड़ान्ध मारने लगे हैं। पालकी ढोने वाले भी अंधेरे में हैं और पालकियों में बैठे लोग भी। अंधेरों को जानने वालों की आँखों पर भी अंधेरा ही छाया हुआ है।

सारे भ्रमों और अंधेरों में बस चले ही जा रहे हैं, किसी को न मंजिल का पता है, न रास्तों का। बस चलते ही चले जाना है अंधेरों का झण्डा फहराते हुए।

इसी बीच लो, दीवाली भी आ गई, हर साल आती है, जाने कब से आ ही रही है। अंधेरों की सियासत और अंधेरगर्दी की रियासतों को बेनकाब करने अर्से से हम दीये जलाते रहे हैं, रोशनी का दरिया उमड़ाते रहे हैं, पटाखे और फूलझड़ियाँ छोड़कर तेज रोशनी में अंधेरों के नग्न जिस्म को देखने का यत्न भी करते हैं।

कोशिशें करते हैं रोशनी में अंधेरों को पहचान कर उनका खात्मा करने की, लेकिन मायावी अंधेरा है कि दो-चार दिन किसी काली कमाई के ढेर में दुबक कर छिप जाता है और फिर दुगूनी ताकत से हमारे सामने हमसे ही लड़ने-भिड़ने आ जाता है।

हम सभी ने अंधेरों की तलाश अब तक बाहर ही बाहर की है जबकि असल में अंधेरा हमारे भीतर छुपा बैठा है। कभी किसी स्वार्थ की चादर में लिपटा हुआ हमारे हृदय में दुबका रहता है, कभी लोभ-लालच या दबावों का कम्बल ओढ़े दिमाग के कोने में घर कर बैठता है।

कभी हम जानबूझकर आँखें मूंद लेते हैं, कभी कुर्सियों, पदों और प्रतिष्ठा से लेकर मुद्रार्चन के मोह से ग्रस्त होकर अपने आपको अंधेरों के हवाले कर दिया करते हैं। कभी गर्म गोश्त से सुकून पाने की वासना हमें अंधेरी गुहाओं में धकेल दिया करती है, कभी जीभ पर लगा दारू और मकवे का स्वाद हमें अंधेरों का गुलाम बना डालता है।

और ये अंधेरा है कि सभी को खुश करने की कला में माहिर है, सभी को कुछ न कुछ चाशनी चटाकर या झूठन का स्वाद देकर राजी रखने में सिद्ध है ये, तभी तो रोशनी के बड़े-बड़े झण्डाबरदार भी अंधेरों से गुप्त सांठ-गांठ कर अपनी चवन्नी चला लेते हैं।

कुछ की मिलीभगत जगजाहिर हो जाती है, काफी इतने शातिर होते हैं कि हीरा बताते हैं और असल में कोयले से भी ज्यादा कालिख लिए हुए।

अंधेरों के रक्तबीज हमारे मन-मस्तिष्क में कब्जा जमाये बैठे हैं और यहीं से अंधेरों की सियासत चलती है, और हम हैं कि अंधेरों के सूत्रधारों को बाहर तलाशने में जुटे हुए हैं।

अपने भीतर की आत्मा को टटोलें, आत्मज्योति को जानें, प्रज्वलित करें और एक सच्चे मशालची के रूप में हृदय के कोने-कोने तक चक्कर लगाकर अंधेरों को दूर करें।

अपने आपको जानें, अपने दीपक स्वयं बनें और चिनगारी को नैतिक मूल्यों व संस्कारों की हवा देकर रोशनी का आवाहन करें, अपने व्यक्तित्व को ज्योतिर्मय बनाएं, अग्निधर्मा बनें, सारी संकीर्णताओं, क्षुद्र स्वार्थों, प्रलोभनों और अंधेरों के मायावी मोहपाशों से दूर रहने की कोशिश करें।

ऎसा हमने आज कर लिया तो फिर न अंधेरों का अस्तित्व रहेगा, न इनके मददगारों या संरक्षकों का। समय आ गया है, अंधेरों के वजूद को चुनौती दें और अपने आपको सूरज नहीं तो दीपक के रूप में प्रतिस्थापित करें।

अपने भीतर के उजालों से एक बार पहरा हटा कर तो देखें, कितना उजियारा फैलने लगता है। यह दीपावली हम सभी से यही तो कहने आयी है।

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
jojobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
onwin giriş
onwin giriş
onwin giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
betsat giriş
betsat giriş
betsat giriş
betsat giriş
Kolaybet Giriş
holiganbet giriş
onwin
onwin
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
onwin
onwin
holiganbet