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आज का चिंतन

“स्वाध्याय का महत्व”

ओ३म्

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मनुष्य जीवन और इतर प्राणियों के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि मनुष्य अपनी बुद्धि की सहायता से विचार व चिन्तन सहित सत्यासत्य का निर्णय करने व अध्ययन-अध्यापन करने में समर्थ है जबकि अन्य प्राणियों को ईश्वर ने मनुष्यों के समान बुद्धि नहीं दी है। मनुष्यों को दो प्रकार का ज्ञान होता है जिसे स्वाभाविक व नैमित्तिक ज्ञान कहते हैं। स्वाभाविक ज्ञान को सीखना नहीं होता वह स्वभावतः व स्वमेव ईश्वर प्रदत्त आत्मा में होता है और नैमित्तिक ज्ञान वह होता है जिसे मनुष्य आचार्यों, माता-पिता, स्वाध्याय, विचार, चिन्तन व अपने अनुभव आदि से सीखता है। पशु व पक्षी आदि प्राणियों में स्वाभाविक ज्ञान होता है और कई अर्थों में वह मनुष्यों से भी अधिक होता है परन्तु वह नैमित्तिक ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। मनुष्य अपनी बुद्धि की सहायता से माता-पिता, विद्वानों, आचार्यों व स्वाध्याय आदि से अपने ज्ञान में निरन्तर वृद्धि करता रहता है। ऐसा करके ही वह विद्वान, ज्ञानी, वैज्ञानिक, चिन्तक व मनीषी बन जाता है। जिस प्रकार माता-पिता आचार्य अपने शिष्यों को ज्ञान देते हैं उसी प्रकार स्वाध्याय से भी वह ज्ञान मनुष्य प्राप्त कर सकता है। वास्तविकता यह है कि हमारे माता-पिता व आचार्य भी स्वाध्याय व अध्ययन से ही ज्ञान प्राप्त करते हैं। अतः पुस्तकों के अध्ययन से भी अनेक विषयों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

हमारे ऋषि मुनि शास्त्रों में लिख गये हैं कि मनुष्यों को स्वाध्याय करने में प्रमाद नहीं करना चाहिये। स्वाध्याय सन्ध्या का अंग है और यह प्रतिदिन किया जाता है। स्वाध्याय के अन्तर्गत स्वयं अर्थात् अपनी आत्मा को जानना भी होता है और इसके साथ वेद एवं ऋषिकृत वैदिक साहित्य का अध्ययन व उसका प्रवचन आदि से प्रचार करना भी कर्तव्य होता है। जो मनुष्य जिस पदार्थ को कहीं से व किसी से लेता है और उसे अपने पास ही सीमित कर लेता है वह उचित नहीं होता। वह ऋणी कहलाता है और उसे वह ऋण ब्याज व सूद सहित चुकाना पड़ता है। ऋणी मनुष्य का कर्तव्य होता है कि उसने अपने आचार्यों से जो सीखा है, उसे दूसरों को भी सिखाये। ऐसा करने पर ही सृष्टि क्रम भली प्रकार से चल सकता है। महाभारतकाल के बाद हम पाते हैं कि अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था क्षीण व निर्बल हो गई थी जिस कारण महाभारत काल तक जो ज्ञान हमारे ऋषि व विद्वानों के पास उपलब्ध था, उसका प्रवचन व अध्यापन द्वारा प्रचार न होने से देश व संसार में अज्ञान फैल गया जिसका परिणाम अन्धविश्वास व सामाजिक असमानता आदि के रूप में सामने आया। यदि महाभारतकाल के बाद भी वेदों का पठन-पाठन व प्रवचन आदि जारी रहता तो कोई कारण नहीं था कि संसार में अन्घविश्वास फैलते और आज जो मिथ्या मत-मतान्तरों की वृद्धि हुई व हो रही है, उनका कहीं किंचित अस्तित्व होता। अन्धविश्वास व सभी समस्याओं का मूल कारण महाभारतकाल के बाद विद्या वृद्धि में बाधाओं का होना ही सिद्ध होता है।

महर्षि दयानन्द जी के जीवन का अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि वह महाभारतकाल के बाद पहले ऐसे विद्वान, आचार्य व ऋषि थे जिन्हें वेदों के सत्य अर्थों का ज्ञान था। उन्होंने अपने अध्ययन, ऊहा व अनुसंधान से इस तथ्य को जाना था कि वेद सृष्टि की आदि में ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है। वेदों के सभी मन्त्र सत्य ज्ञान के उपदेशों से भरे हुए हैं। सभी सत्य विद्याओं का मूल भी वेदों में विद्यमान है। उन्होंने ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका ग्रन्थ लिखकर अपनी इस मान्यता पर प्रकाश डाला एवं इसे सत्य प्रमाणित किया। ईश्वर के सच्चे स्वरूप व गुण-कर्म-स्वभाव का जो यथार्थ ज्ञान वेदों से उपलब्ध होता है वह संसार के अन्य किसी ग्रन्थ से नहीं होता। सारा वैदिक साहित्य वेदों को आधार बनाकर ही प्राचीन ऋषियों ने रचा था। इन ग्रन्थों में प्रमुख ग्रन्थ 6 वेदांग, 4 ब्राह्मण ग्रन्थ, 6 दर्शन ग्रन्थ और मुख्य 11 उपनिषदें आदि हैं। विशुद्ध मनुस्मृति भी वेदों के विधानों के आधार पर महर्षि मनु द्वारा प्रणीत ग्रन्थ है जिसमें मानव धर्म का व्याख्यान है। यदि कोई मनुष्य अपराध करता है तो राजा द्वारा उसके दण्ड का विधान भी मनुस्मृति में है। राजनीति सहित राजा के कर्तव्यों एवं शासन व्यवस्था पर भी इस ग्रन्थ में प्रकाश डाला गया है। विद्वानों को इसका अध्ययन एवं प्रचार करना चाहिये जिससे जन-सामान्य को यह ज्ञान हो सकता है कि सृष्टि के आरम्भ से ही वैदिक ज्ञान परम्परा व संस्कृति-सभ्यता कितनी समृद्ध एवं उन्नत थी। यह भी बता दें कि वेद सहित प्रमुख समस्त वैदिक साहित्य का हिन्दी में अनुवाद व टीकायें आदि उपलब्ध हैं जिससे हिन्दी पढ़ने की योग्यता रखने वाला साधारण व्यक्ति भी वेदों का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

स्वाध्याय से मनुष्य की बुद्धि एवं आत्मा की उन्नति वा विकास होता है। ईश्वर व जीव सहित जड़ सृष्टि वा ब्रह्माण्ड विषयक सभी शंकाओं व प्रश्नों का समाधान भी होता है। मनुष्य जन्म क्यों हुआ व हमारा भविष्य एवं परजन्म किन बातों से उन्नत व अवनत होते हैं, इसका ज्ञान भी हम स्वाध्याय से प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर, माता-पिता, समाज, देश व विश्व के प्रति हमारे क्या कर्तव्य हैं और उनका पालन किस प्रकार से किया जा सकता है, इसका ज्ञान भी हमें स्वाध्याय से मिलता है। मनुष्य जीवन का उद्देश्य दुःखों की पूर्ण निवृत्ति है। दुःखों से पूर्ण निवृत्ति का नाम मोक्ष है। इसकी प्राप्ति के लिए करणीय कर्तव्यों का विधान ऋषि दयानन्द जी के ग्रन्थों एवं दर्शन व उपनिषद आदि ग्रन्थों में मिलता है। जो मनुष्य वैदिक ग्रन्थों का अध्ययन करता है उसे ईश्वर, जीवात्मा, सृष्टि, उपासना सहित भौतिक विषयों का भी पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। स्वाध्याय से मनुष्य देव, विद्वान, आर्य, ईश्वरभक्त, वेदभक्त, मातृपितृभक्त, आचार्यभक्त, देशभक्त, समाजसेवी व समाज सुधारक सहित आदर्श जीवन व चरित्र से पूर्ण मानव बनता है। मत-मतान्तर के ग्रन्थ मनुष्य का ऐसा विकास नहीं करते जैसा कि वेद व वैदिक साहित्य से होता है। हमारे विश्व प्रसिद्ध आदर्श महापुरुष राम, कृष्ण, दयानन्द, चाणक्य, शंकराचार्य जी आदि सभी वैदिक साहित्य की देन थे। इन लाभों को प्राप्त करने के लिए सभी मनुष्यों को वेद एवं वैदिक ग्रन्थों का नित्य प्रति स्वाध्याय अवश्य ही करना चाहिये जिससे उनका सम्पूर्ण विकास व उन्नति होगी और उनका जीवन ज्ञान की प्राप्ति से सुखी व सन्तुष्ट होगा। ऋषि दयानन्द जी ने लिखा है कि मनुष्य को जो सुख ज्ञान की प्राप्ति से मिलता है उतना व वैसा सुख धन व सुख के साधनों से भी नहीं मिलता। अतः स्वाध्याय से अपना ज्ञान बढ़ाना सभी मनुष्यों का कर्तव्य व धर्म है।

मनुष्य जन्म की सफलता भी स्वाध्याय करने व उससे अर्जित ज्ञान से ईश्वरोपासना व समाज के हितकारी कार्य करने में ही है। स्वाध्याय से हम विवेक को प्राप्त होते हैं जिससे भक्ष्य और अभक्ष्य पदार्थों का भी ज्ञान व विवेक होता है। स्वाध्यायशीलता से मनुष्य को अच्छे संस्कार मिलते हैं जिससे वह दूसरों का शोषण व अन्याय नहीं करता और न ही दूसरों को अपना शोषण व अपने साथ अन्याय करने देता है। स्वाध्याय से आत्मा व शरीर दोनों का समुचित विकास होता है। मनुष्य रोग रहित रहकर दीर्घायु भी होता है। स्वाध्यायशील मनुष्य समाज का जितना उपकार कर सकता है उतना स्वाध्याय रहित मनुष्य सम्भवतः नहीं कर सकता। स्वाध्याय से मनुष्यों की आत्मिक शक्ति में भी वृृद्धि होती है। ज्ञान से उसे अच्छे कार्यों को करने में उत्साह उत्पन्न होता है। वह जानता है कि वह जो भी शुभ कर्म करेगा उसका लाभ कई गुणा होकर उसे भविष्य व परजन्म में मिलेगा। उसके प्रारब्ध में उन्नति होगी और उससे उसका भावी जन्म श्रेष्ठ योनि व अच्छे परिवेश में होगा। ऐसे अनेक लाभ स्वाध्याय से मिलते हैं। दैनिक यज्ञ, परेापकार व परसेवा की पे्ररणा भी स्वाध्याय से मिलती है। अतः वेद, वैदिक साहित्य सहित ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश व अन्य ग्रन्थों एवं आर्य विद्वानों के वेद विषयक साहित्य का अवश्य ही अध्ययन करना चाहिये। इससे लाभ ही लाभ होगा, हानि कुछ नहीं होगी। ईश्वर का सहाय व रक्षा आदि भी प्राप्त होगी। ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानकर हम उसकी यथार्थ रीति से उपासना कर उपासना के लाभों से सम्पन्न व संयुक्त होंगे। इसी के साथ इस संक्षिप्त चर्चा को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

One reply on ““स्वाध्याय का महत्व””

देवेन्द्र सिंह चौहान खुरजा सेवानिवृत्त उप निरीक्षकsays:

अत्यंत ही सारगर्भित, गागर में सागर

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