हंस कर लिया पाकिस्तान कहने वालों, सुनो ! ह—“नही मिलेगा हिंदुस्तान-,जाना होगा पाकिस्तान (भाग -२)—इंजीनियर श्याम सुन्दर पोद्दार (महामन्त्री,वीर सावरकर  फ़ाउंडेशन )   ——————————————

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मियां असदुद्दीन ओवैसी यदि यह सोच रहे हैं कि भविष्य में देश की सत्ता पर फिर कांग्रेस का बीज होगी तो अब उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि मुस्लिम तुष्टीकरण के खेल में लगी रही कांग्रेस कभी भी सत्ता में लौट नहीं पाएगी । ओवैसी को यह ध्यान रखना चाहिए कि 2004 में कांग्रेस सत्ता में इसीलिए आ पाई थी कि उस समय उसके साथ 29% हिंदू मतदाताओं का समर्थन था। आज कांग्रेस के साथ 9% हिंदू मतदाता भी नहीं है। कांग्रेस के पापों के प्रति हिंदू की जागरूकता जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है वैसे वैसे ही हिंदू मतदाता का कांग्रेस से मोहभंग होता जा रहा है।
       हिंदुओं को साथ लेकर चलना अब प्रत्येक राजनीतिक दल के लिए अनिवार्य हो जाएगा। कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति हिंदू की समझ में आ चुकी है और हिन्दू भी अपने हितों की रक्षा चाहता है। उसके लिए खुशी की बात है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते उसके हित सुरक्षित हैं।
     बिना हिंदुओं के प्रबल समर्थन के कॉन्ग्रेस नेहरू के समय में पहली बार 1952 में हुए लोकसभा चुनावों में भी जीत नहीं सकती थी।  कांग्रेस के नेता नेहरू ने हिंदू महासभा का समर्थन प्राप्त करके आजादी से पूर्व 1945 – 46 में हुए आम चुनावों में बहुमत प्राप्त किया था। आजादी के बाद भी उन्हें हिंदू मतदाताओं का समर्थन प्राप्त हुआ। परंतु हिंदू महासभा के कार्यकर्ताओं पर उनके प्रधानमंत्री रहते कई प्रकार के अत्याचार हुए। यह ऐसे अत्याचार से जो संपूर्ण विश्व के जनतांत्रिक देशों में अन्यत्र नहीं मिलते।
   १९४७ के बाद भारत  की जो केंद्रीय सरकार बनी गाँधी ने उसे राष्ट्रीय सरकार का दर्जा दिया। हिन्दु महासभा के वीर सावरकर जी से हिन्दु महासभा का एक प्रतिनिधि केंद्रीय मन्त्रीमण्डल में देने का गाँधी ने अनुरोध किया। वीर सावरकर जी ने डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी को हिन्दु महासभा के प्रतिनिधि के रूप में भेजा। इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी से डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर व एक ईसाई समाज के ब्यक्ति को भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में लिया गया। नेहरू गांधी के आदेशों की अवज्ञा करने लगे। गांधी ने नेहरू से  मौलाना आज़ाद को मंत्रिमंडल से निकालने को कहा, पर नेहरू ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। गांधी को पाकिस्तान के बकाए ५५ करोड़ नेहरू सरकार से दिलवाने के लिये अनशन करना पड़ा। तीन दिन बाद नेहरू पाकिस्तान  को ५५ करोड़ देने के लिये राज़ी हो गये। गाँधी ने अनशन नही तोड़ा। कहा कि हिन्दु महासभा व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जब तक आकर मेरी माँग का समर्थन नही करता मै अनशन नही तोड़ूँगा।
      गाँधी के प्राण रास्ट्र के लिए मूल्यवान थे। पहले हिन्दु महासभा ने गाँधी के पास अपना प्रतिनिधि भेज कर अनशन तोड़ने का आग्रह किया । फिर दूसरे दिन राष्ट्रीय स्वयमसेवक  संघ के प्रतिनिधि गये। तब गाँधी ने अनशन तोड़ा। २० जनवरी १९४८ को पाकिस्तान में उजड़े हुए शरणार्थी मदनलाल पाहवा ने बिरला हाउस में गाँधी को मारने के लिये बम फेंका उसका निशाना चूक गया, गाँधी बच गये।
   उस समय बड़ा भयानक दृश्य बन चुका था। पाकिस्तान से उजड़े हुए लाखों लोग दिल्ली शरणार्थी बन कर आ रहे थे। नेहरू का कर्तव्य था कि जिस तरह भंगी कालोनी में गाँधी द्वारा हिन्दु मन्दिर में क़ुरान पाठ करने के बाद लोग प्रतिवाद करने लगे थे उनकी सुरक्षा को देखते हुए उन्हें बिरला हाउस में स्थानांतरित कर दिया गया। गाँधी पर हुए इस प्राणघाती हमले के बाद नेहरू ने यदि उचित व्यवस्था की होती तो गाँधी मारे नही जाते। बाद के घटनाक्रम को देखने के बाद कोई भी कह सकता है कि नेहरू ने गाँधी के मरे शरीर पर राजनीति करने का प्लान बना लिया व गाँधी को मरने दिया।
     नेहरू की योजना थी कि अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदी हिन्दु महासभा व इसके नेता सावरकर को जड़मूल से समाप्त कर १९५२ के चुनाव को जीतना है।  नेहरू इसमें पाक पूरी तरह सफल रहे। उन्होंने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी वीर सावरकर और उनके संगठन हिंदू महासभा को बदनाम करने में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी । ३० जनवरी को गाँधी हत्या होने के कुछ ही घण्टे बाद बिना अपराध के सावरकर जी के निजी सचिव व सुरक्षा अधिकारी  अप्पा कासर को गिरफ़्तार कर लिया गया। ताकि दूसरे दिन नेहरू के गुंडे सावरकर जी पर हमला करें तो वे मारे जाएं। अप्पा कासर के सावरकर जी की सुरक्षा में रहने पर कोई सावरकर जी को मारना तो दूर उनका बाल बाँका भी नही कर सकता। क्योंकि वे ब्लेड चलाने में  निपुण  थे। १०० आदमी का सामना कर सकते थे। दूसरे दिन  सावरकर सदन पर नेहरू के गुंडो ने हमला किया। सावरकर जी व उनके पुत्र ने अपनी रक्षा में बंदूक़ निकाल ली । ख़बर मिलते ही हिन्दू महासभा के सैकड़ों कार्यकर्ता सावरकर सदन पहुँच गये। तब नेहरू के गुंडे वहाँ से भागे। नेहरू के इन  गुंडों ने सावरकर सदन से थोड़ी दूर उनके छोटे भाई नारायण सावरकर के घर पर हमला
किया। उनको मार मारकर अधमरा कर दिया। नारायण सावरकर इतने घायल हुए कि  कुछ महीनो बाद वे स्वर्गवासी हो
गये। यह तो सावरकर व हिन्दु महासभा पर अत्याचारों की मात्र शुरुआत थी। शेष अगले अंक में।

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