पुण्यसलिला सरित्श्रेष्ठ सरस्वती आखिर कहाँ गई ?

अशोक प्रवृद्ध

भारतीय जीवन एवं साधना में अप्रतिम महत्व रखने वाली सरस्वती भारतीय सभ्यता के उषाकाल से लेकर अद्यपर्यन्त अपने आप में ही नहीं,प्रत्युत अपनी अर्थ,परिधि एवं सम्बन्धों के विस्तार के कारण भी अत्यन्त महत्वपूर्ण रही है। सरस्वती शब्द की व्युत्पति गत्यर्थक सृ धातु से असुन प्रत्यय के योग से निष्पन्न होता है शब्द सरस,जिसका अर्थ होता है गतिशील जलद्यसरस का अर्थ गतिशीलता के कारण जल भी हो सकता है,लेकिन केवल जल ही गतिशील नहीं होता, ज्ञान भी गतिशील होता है। सूर्य-रश्मि भी गतिशील होती है। अत: सरस का अर्थ ज्ञान, वाणी (अन्त:प्रेरणा की वाणी), ज्योति, सूर्य-रश्मि, यज्ञ ज्वाला, आदि भी किया गया है। ज्ञान के आधार पर सरस्वती का अर्थ सर्वत्र और सर्वज्ञानमय परमात्मा भी हो जाती है। आदिकाव्य ऋग्वेद में सरस्वती नाम देवता (विभिन्न वैदिक देवता एक ही देव के भिन्न-भिन्न दिव्यगुणों के कारण अनेक नाम अर्थात सरस्वती मात्र देवता,परमात्मा का सूचक नाम मात्र है, दृश्य रूप भौतिक नदी विशेष नहीं है) तथा नदी वत दोनों ही रूपों में प्रयुक्त हुआ है। सरस्वती शब्द का अर्थ करते हुए यास्क ने निरुक्त में लिखा है-

वाङ नामान्युत्तराणि सप्तपञ्चाशत् वाक्क्स्मात् वचे: तत्र सरस्वतीत्येत्स्य नदीवद् देवतावच्चा निगमा भवन्ति

तद्यद् देवतावदुपरिष्टातद् व्याख्यास्याम: द्य अथैतन्न्दीवत द्यद्य

-निरूक्त 2/7/23

अर्थात- वाक् शब्द के सत्तावन रूप कहे गये हैं। वाक् के उन सत्तावन रूपों में एक रूप सरस्वती है। वेदों में सरस्वती शब्द का प्रयोग देवतावत् और नदीवत् आया है नदीवत् अर्थात नदी की भान्ति (नदी नहीं) बहने वाली सायन एवं निघण्टुकार ने भी सरस्वती के नदी एवं देवता दोनों दोनों रूप स्वीकार किये हैं यास्काचार्य की उक्ति सरस्वती-सरस इत्युदकनाम सर्तेस्तद्वती (निरूक्त 9/3/24) से यह स्पष्ट नहीं होता कि उनका अभिप्राय नदी विशेष है अथवा सामान्य नदियों से अथवा जलाशयों से परिपूर्ण भूमि से फिर कतिपय विद्वानों ने इसे सरस्वती नाम की नदी विशेष अर्थ (रूप) में स्वीकार किया है। ऋग्वेद में यास्कानुसार केवल छ: मन्त्रों में ही सरस्वती नदी रूप में वर्णित है, शेष वर्णन उसके देवता रूप विषयक हैं। ऋग्वेद में सरस्वती का नाम प्रथम वाक् देवता के रूप में प्रयुक्त हुआ है या नदी के लिये यह आज भी विद्वानों के मध्य विवाद के विषय बना हुआ है। यद्यपि मनुस्मृति 1/21 के अनुसार सरस्वती के देवता रूप की कल्पना ही पहले होनी चाहिये तथापि कतिपय विद्वानों के अनुसार बाद में देवता रूप के आधार पर ही नदी विशेष के लिये सरस्वती नाम प्रचलित हुआ। उनके अनुसार ऋग्वेद की सरस्वती मात्र एक दिव्य अन्त:प्रेरणा की देवी, वाणी की देवी ही नहीं वरन प्राचीन आर्य जगत की सात नदियों में से एक भी है।

वैदिक विचार

विद्वानों का विचार है कि ऋग्वैदिक काल में सिन्धु और सरस्वती दो नदियाँ थीं। ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर दोनों नदियों का साथ-साथ वर्णन तो उल्लेख है ही विशालता में भी दोनों एक सी कही गईं हैं। फिर भी सिन्धु के अपेक्षतया सरस्वती को ही अधिक महिमामयी एवं महत्वशालिनी माना गया है। ऋग्वेद के अनुसार सरस्वती की अवस्थिति यमुना और शतुद्रि (सतलज) के मध्य (यमुने सरस्वति शतुद्रि) थी, ऋग्वेद में सरस्वती के लिये प्रयुक्त विशेषण सप्तनदीरूपिणी, सप्तभगिनीसेविता, सप्तस्वसा, सप्तधातु आदि हैं सरस्वती से सम्बद्ध ऋग्वेद में उल्लिखित स्थान अथवा व्यक्ति सभी भारतीय हैं ऋग्वेद 7/95/2 में सरस्वति का पर्वत से उद्भूत हो समुद्र पर्यन्त प्रवाहित होने का उल्लेख मिलता है भूमि सर्वेक्षण के कई प्रतिवेदनों अर्थात रिपोर्टों से प्रमाणित होता है कि लुप्त सरस्वती कभी पँजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान से प्रवाहित होने वाली विशाल नदी थी स्पेस एप्लीकेशनसेंटर और फिजिकल लेबोरेट्री द्वारा प्रस्तुत लैंड सैटेलाईट इमेजरी एरियल फोटोग्राफ्स से भी सरस्वती की ऋग्वैदिक स्थिति की पुष्टि होती है।

ऋग्वेद में सरस्वती के उल्लेखों वाले मन्त्रों को दृष्टिगोचर करने से इस सत्य का सत्यापन होता है कि ऋग्वैदिक सभ्यता का उद्भव एवं विकास सरस्वती के काँठे में ही हुआ था,वह सारस्वत प्रदेश की सभ्यता थी।

बाद में यह सभ्यता क्षेत्र विस्तार के क्रम में मुख्यत: पश्चिमाभिमुख होकर एवं कुछ दूर तक पूर्व की ओर बढती है। सभ्यता का केन्द्र सरस्वती तट से सिन्धु एवं उसके सहायिकाओं के तट पर पहुँचता है और इस सिलसिले में इसकी व्यापारिक गतिविधियों का व्यापक विस्तार होता है। कहा जाता है कि सारस्वत प्रदेश के अग्रजन्माओं की आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति का श्रेय सरस्वती नदी को ही था पशुपालक व कृषिजीवी जहाँ सरस्वती के तटीय वनों और उपजाऊ भूमि से आधिभौतिक उन्नति कर रहे थे,वहीँ ऋषि-मुनिगण इसके तट पर सामगायन कर याजिकीय अनुष्ठानों द्वारा आध्यात्मिक उत्कर्ष कर रहे थे

ऋग्वेद के सूक्तों से इस सत्य का सत्यापन होता है कि सरस्वती नदी नाहन पहाडिय़ों से आगे आदिबदरी के निकट निकलकर पँजाब, हरियाणा, उत्तरी-पश्चिमी राजस्थान में प्रवाहित होती हुई समुद्र में प्रभाष क्षेत्र में मिलती है इसकी स्थिति यमुना और शतुद्रि के मध्य (ऋग्वेद 10/75/5) किन्तु दृषद्वती (चितांग) के पश्चिम (ऋग्वेद 7/95/2) कही गई है। इसकी उत्पति दैवी (असुर्या ऋग्वेद 7/96/1) भी मानी गई है ब्राह्मण ग्रन्थों,श्रौतसूत्रों एवं पुराणादि ग्रन्थों में सरस्वती का उद्गम स्थान प्लक्ष प्राश्रवण कहा गया हैद्ययमुना नदी के उद्गम स्थल को प्लाक्षावतरण कहा गया है ऋग्वेद में सरस्वती सम्बन्धी (करीब) पैंतीस मन्त्र अंकित हैं,जिनमें से तीन ऋग्वेद 6/61,ऋग्वेद 7/95 और 7/96 स्तुतियाँ हैं। विविध मन्त्रों में सरस्वती की अपरिमित जलराशि, अनवरत बदलती रहने वाली प्रचण्ड वेगवती धारा,भयंकर गर्जना, उससे होने वाले संभावित खतरों,महनीयता आदि के भी जीवन्त वर्णन हैं (ऋग्वेद 6/61/3, 6/61/8, 6/61/11,6/61/13) सरस्वती प्रचण्ड वेगवाली होने के साथ ही सर्वाधिक जलराशि वाली होने के कारण बाढ़ के समय इसका पाट इतना चौड़ा और विस्तृत हो जाता है कि यह आक्षितिज फैली हुई प्रतीत होती है ऋग्वेद6/61/7 में अंकित है कि सरस्वती कूल किनारों को तोड़ती हुई बहुधा अपना प्रवाह बदल लेती है। ऋग्वेद 10/64/9 में में सरस्वती,सरयू सिन्धु की गणना बड़े नदों में हुई है जिसमें ऋग्वेद 7/36/3 में सरस्वती ही सरिताओं की प्रसविणी कही गई हैद्यऋग्वेद 6/61/12 में अंकित है कि सरस्वती में सात नदियों के मिलने के कारण सप्तधातु एवं ऋग्वेद 6/61/10 में सप्तस्वसा कही गई हैद्यऋग्वेद 7/96/3 के अनुसार सरस्वती सदा कल्याण ही करती है।

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