वेदों और वैदिक ग्रंथों में समता का भाग ही रखा गया है शूद्रों के प्रति

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सचिन सिंह गौर

देश में दलित विमर्श करने वाले बुद्धिजीवियों द्वारा सनातन धर्म पर शुद्रों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया जाता है। इसके लिए अक्सर श्रीराम द्वारा शम्बुक का वध किए जाने जैसी घटनाओं का उल्लेख किया जाता है। यदि हम शम्बुक की पूरी कथा और वेदादि शास्त्रों में शुद्रों के लिए दी गई व्यवस्थाओं को देखें तो यह कथा विश्वसनीय नहीं लगती।
शम्बूक वध का प्रसंग उत्तर रामायण में मिलता है जिसके अनुसार शम्बूक नाम के एक शूद्र के तपस्या करने के कारण अयोध्या में एक ब्राह्मण का पुत्र अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है। तत्पश्चात वह ब्राह्मण श्रीरामचंद्र के दरबार में जाकर अपने पुत्र की अकाल मृत्यु की शिकायत करता है एवं आरोप लगाता है कि यह राजा का दुष्कृत्य है जिसके परिणामस्वरूप ऐसा हुआ। तब श्रीराम ब्राह्मणो और ऋषियों की एक सभा करते हैं जिसमें नारद मुनि कहते हैं अवश्य ही आपके राज्य में कोई शूद्र तप कर रहा है जिसके फलस्वरूप ऐसी घटनायें हो रही हैं। चूंकि त्रेता युग में शूद्र का तप करना पूर्णत: वर्जित है एवं हानिकारक था, इसलिए यह सुनते ही श्रीराम चंद्र अपने पुष्पक विमान पर सवार हो ऐसे शूद्र को ढूंढने निकल पड़ते हैं। दक्षिण दिशा में शैवल पर्वत के उत्तर भाग में एक सरोवर पर तपस्या करते हुए एक तपस्वी मिल गया जो पेड़ से उल्टा लटक कर तपस्या कर रहा था।
प्रसंग के अनुसार श्रीराम उस शूद्र के पास जाते हैं और पूछते हैं ‘तापस! जिस वस्तु के लिए तुम तपस्या में लगे हो, उसे मैं सुनना चाहता हूँ। इसके सिवा यह भी बताओ की तुम ब्राह्मण हो या अजेय क्षत्रिय? तीसरे वर्ण के वैश्य हो या शुद्र हो?’ कलेश रहित कर्म करने वाले भगवान् राम का यह वचन सुनकर नीचे मस्तक करके लटका हुआ वह तपस्वी बोला – हे श्री राम ! मैं झूठ नहीं बोलूँगा। देव लोक को पाने की इच्छा से ही तपस्या में लगा हूँ। मुझे शुद्र जानिए। मेरा नाम शम्बूक है। इतना सुनते ही श्रीराम अपनी तलवार से उसका वध कर देते हैं। यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण में उत्तर कांड के 73-76 सर्ग में मिलता है।
इस प्रसंग को आधार बनाकर आज खूब राजनीति की जाती है, जबकि यह प्रसंग पूर्ण रूप से असत्य, काल्पनिक, प्रक्षिप्त है और बाद के काल में उत्तर रामायण में जोड़ा गया है। वैसे तो पूरी उत्तर रामायण ही संदिग्ध है, क्यूंकि महर्षि वाल्मीकि अपनी रामायण में केवल 6 काण्ड ही लिखे थे और युद्ध कांड में रावण वध के पश्चात श्रीराम जानकी और लक्ष्मण के अयोध्या वापिस आने पर रामायण समाप्त कर दी थी।
निषाद के साथ पढऩे वाले उससे जीवन भर मित्रता निभाने वाले, भील शबरी के जूठे बैर खाने वाले, वनवासियों को साथ लेकर उनका आत्मविश्वास बढ़ाकर रावण जैसे शक्तिशाली राजा का मान मर्दन करने वाले रघुनाथ ऐसा कार्य करें, यह असंभव है। इस प्रसंग को जोडऩे का कारण पूरी तरह राजनीतिक ही रहा होगा।
जहाँ तक शूद्रों के ऊपर किये जाने वाले अत्याचार करने और तपस्या न करने देने की बात है तो शास्त्रों में कहीं भी शूद्र को तपस्या करने, यज्ञ करने का निषेध नहीं किया गया है। सनातन धर्म के सर्वोच्च ग्रन्थ वेदों के आधार पर ये बात सर्वसिद्ध है। वेदों के नाम और सर्ग के अनुसार हमने यहाँ इस विषय को स्पष्ट करने का प्रयास किया है।
वेदों में शूद्रों के विषय में कई मन्त्र एवं श्लोक हैं जो समाज में शूद्रों के महत्व का वर्णन करते हैं। वेदों में शुद्र को अत्यंत परिश्रमी कहा गया है। तप शब्द का प्रयोग अनंत सामथ्र्य से जगत के सभी पदार्थों की रचना करने वाले ईश्वर के लिए वेद मंत्र में हुआ है।
महापुराण में कहा गया है कि त्रेता युग में केवल एक वेद था, यजुर्वेद। यजुर्वेद मुख्य रूप से यज्ञों का विधान है। यज्ञ आर्य संस्कृति में सबसे मत्वपूर्ण, फलदायी एवं पवित्र कर्म माना गया है। अग्नि पवित्र है और जहां यज्ञ होता है, वहां संपूर्ण वातावरण, पवित्र और देवमय बन जाता है। यज्ञवेदी में ‘स्वाहा’ कहकर देवताओं को भोजन परोसने से मनुष्य को दुख-दारिद्रय और कष्टों से छुटकारा मिलता है। यजुर्वेद में कई मन्त्र हैं जो शूद्र को यज्ञ तप करने का अधिकार देते हैं। जिनसे स्पष्ट है कि शूद्र को यज्ञ आर्यों का सबसे पवित्र कर्म करने का पूर्ण अधिकार था।
यजुर्वेद अध्याय 30 मन्त्र 5 में कहा गया है – तपसे शुद्रम् अर्थात् तप यानी कठोर कर्म करने वाले पुरुष का नाम शुद्र है।
यजुर्वेद अध्याय 16 मन्त्र 27 कहता है – नमो निशादेभ्य अर्थात् – शिल्प-कारीगरी विद्या से युक्त जो परिश्रमी जन (निषाद यानी शुद्र) हैं उनको नमन है ।
यजुर्वेद अध्याय 18 मन्त्र 48 में कहा गया है – रुचं शुद्रेषु के अनुसार जैसे ईश्वर सभी वर्णों के साथ समान रूप से प्रेम करता है, उसी प्रकार विद्वान लोग भी सभी वर्णों से समान रूप से स्नेह करें। अर्थात् समाज में वर्ण के अनुसार भेद निंदनीय है क्यूंकि ईश्वर सबको समान मानता है।
इसी सन्दर्भ में यहाँ ऋग्वेद का भी एक मन्त्र प्रस्तुत है। ऋग्वेद 10. 53. 5 में कहा गया है – पञ्च जना मम होत्रं जुषन्तां गोजाता उत ये यज्ञियास: अर्थात् पांचों वर्गों के मनुष्य यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र एवं अतिशूद्र यानी अवर्ण मेरे यज्ञ को करें। इसमें वर्ण व्यवस्था से बाहर के अतिशूद्रों का भी वर्णन है।
वेदों में वर्णात्मक दृष्टि से शुद्र और ब्राह्मण में कोई भेद नहीं है। यजुर्वेद में आता है कि मनुष्यों में निन्दित व्यभिचारी, जुआरी, नपुंसक जिनमें शुद्र (श्रमजीवी कारीगर) और ब्राह्मण (अध्यापक एवं शिक्षक) नहीं है, उनको राज प्रसाद से दूर बसाओ और जो राजा के हितकारी (सदाचारी) है, उन्हें समीप बसाया जाये। यजुर्वेद अध्याय 30 मन्त्र 22 में कहा है – अथैतान् अष्टौ विरूपान् आ लभते ऽतिदीर्घं चातिह्रस्वं चातिस्थूलं चातिकृशं चातिशुक्लं चातिकृष्णं चातिकुल्वं चातिलोमशं च । अशूद्रा ऽ अब्राह्मणास् ते प्राजापत्या:। इस मंत्र में व्यवहार सिद्धि से बतलाया गया है कि ब्राह्मण एवं शूद्र में कोई भेद नहीं है। ब्राह्मण विद्या से राज्य की सेवा करता है एवं शुद्र श्रम से राज्य की सेवा करता है। दोनों को समीप बसने का आदेश दिया गया है जो यही दर्शाता है कि शुद्र अछूत शब्द का पर्यावाची नहीं है एवं न ही नीचे होने का बोधक है।
अन्यत्र ऋग्वेद में आता है कि मनुष्यों में न कोई बड़ा है, न कोई छोटा है। सभी आपस में एक समान बराबर के भाई है। [ऋग्वेद 5/60/5]।
वेदों के अलावा सनातन धर्म के अन्य पवित्र ग्रन्थ रामायण, मनुस्मृति, महाभारत एवं पुराण भी शूद्रों को सभी वर्णों के सामान मानते हैं।
मनुस्मृति में लिखा है कि हिंसा न करना, सच बोलना, दूसरे का धन अन्याय से न हरना, पवित्र रहना, इन्द्रियों का निग्रह करना, चारों वर्णों का समान धर्म है। [मनुस्मृति 10 /63]।
इसी प्रकार मुनि वाल्मीकि जी कहते हैं कि इसे यानी रामायण को पढऩे से (स्वाध्याय से) ब्राह्मण बड़ा सुवक्ता ऋषि होगा, क्षत्रिय भूपति होगा, वैश्य अच्छा लाभ प्राप्त करेगा और शुद्र महान होगा। यदि शुद्र को शिक्षा का अधिकार नहीं होता तो वह पढ़ता कैसे? रामायण में चारों वर्णों के समान अधिकार के अनेक संदर्भ प्राप्त होते हैं । उदाहरण के लिए बालकांड के अंतिम श्लोक देखे जा सकते हैं। अयोध्या कांड अध्याय 63 श्लोक 50-51 तथा अध्याय 64 श्लोक 32-33 में रामायण का श्रवण करने का वैश्यों और शूद्रों दोनो के समान अधिकार का वर्णन हैं।
इसी प्रकार महाभारत में भी कहा इस बारे में काफी कुछ लिखा मिलता है। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं। ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न होने से, संस्कार से, वेद श्रवण से अथवा ब्राह्मण पिता कि संतान होने भर से कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता अपितु सदाचार से ही मनुष्य ब्राह्मण बनता है। [महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 143]
कोई भी मनुष्य कुल और जाति के कारण ब्राह्मण नहीं हो सकता। यदि चंडाल भी सदाचारी है तो वह ब्राह्मण ही है। [महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 226]।
जो ब्राह्मण दुष्ट कर्म करता है, दम्भी, पापी और अज्ञानी है, उसे शुद्र समझना चाहिए। और जो शुद्र सत्य और धर्म में स्थित है, उसे ब्राह्मण समझना चाहिए। [महाभारत वन पर्व अध्याय 216/14]।
शुद्र यदि ज्ञान सम्पन्न हो तो वह ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ है और आचारभ्रष्ट ब्राह्मण शुद्र से भी नीच है। [भविष्य पुराण अध्याय 44/33]।
शूद्रों के पठन पाठन के विषय में लिखा है कि दुष्ट कर्म न करने वाले का उपनयन अर्थात् (विद्या ग्रहण) करना चाहिए। [गृह्यसूत्र कांड 2 हरिहर भाष्य]।
कूर्म पुराण में शुद्र के वेदों का विद्वान बनने का वर्णन इस प्रकार से मिलता है। वत्सर के नैध्रुव तथा रेभ्य दो पुत्र हुए तथा रेभ्य वेदों के पारंगत विद्वान शुद्र पुत्र हुए। [कूर्मपुराण अध्याय 19]।
इस प्रकार हम पाते हैं कि न केवल वेदों में बल्कि रामायण, महाभारत और पुराणों में भी शुद्रों को सम्मानजनक स्थान मिला है। इतना ही नहीं, उन्हें ब्राह्मण के समान सम्माननीय भी कहा है। यह भी कहा गया है कि अच्छे कर्मों से शुद्र भी ब्राह्मण बन सकते हैं, जोकि वर्णव्यवस्था के लचीलेपन को दर्शाता है।

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