माउंटेन मैन दशरथ मांझी सुलगते सवाल ?

तनवीर जाफऱी

देश के हरियाणा राज्य में चौधरी बंसी लाल के शासन से जुड़ी एक घटना बेहद प्रचलित है। एक बार चौधरी बंसी लाल के मुख्यमंत्रित्व काल में पड़ोसी राज्य पंजाब से भूमि संबंधी विवाद उत्पन्न हो गया। बताया जाता है कि पंजाब सरकार ने चेतावनी दी कि यदि पंजाब चाहे तो हरियाणा के शासकों को पंजाब क्षेत्र में उनका प्रवेश निषेध कर उन्हें दिल्ली जाने से रोक सकता है। उस समय चंडीगढ़ से दिल्ली जाने हेतु केवल ज़ीरकपुर -डेराबस्सी-लालड़ू मार्ग ही उपलब्ध था। यह सुनकर बंसीलाल को ग़ुस्सा आया। उन्होंने आनन-फ़ानन में रामगढ़-पंचकुला के बीच पडऩे वाले मोरनी हिल्स के एक पहाड़ रूपी टुकड़े को तुड़वाकर पंचकुला से रामगढ़-बरवाला-साहा मार्ग से चंडीगढ़-दिल्ली मार्ग शुरु करवा दिया। और उसके बाद उन्होंने उसी पंजाब सरकार को चुनौती दी कि उन्होंने तो चंडीगढ़-दिल्ली मार्ग बिना पंजाब में प्रवेश किए हुए निकाल लिया है परंतु अब पंजाब के लोग बिना हरियाणा प्रवेश किए दिल्ली नहीं जा सकते। बताया जाता है कि मोरनी हिल्स के रास्ते में आने वाले मिट्टी के पहाड़ के टुकड़े को साफ़ करने में शासन ने युद्ध स्तर पर कार्य किया था। आज भी चौधरी बंसी लाल को इस चंडीगढ़-पंचकुला-दिल्ली मार्ग के जन्मदाता के रूप में याद किया जाता है। यह कथा हरियाणा के लोगों को गौरवान्वित भी करती है। परंतु इस में भी कोई शक नहीं कि इस नए रास्ते को बनाने में हरियाणा शासन ने अपनी पूरी ताक़त व पैसा झोंक दिया था। फिर कहीं जा कर रातों-रात यह मार्ग बनाया जा सका। परंतु हमारे ही देश में बिहार राज्य के गया जि़ले में गहलोर नामक गांव में दशरथ मांझी नामक एक ऐसे व्यक्ति ने एक अत्यंत गऱीब व मज़दूर परिवार में जन्म लिया था जिसने अपने अभूतपूर्व कारनामे से यह साबित कर दिखाया कि शासन या प्रशासन अथवा धन-दौलत पास हो या न हो परंतु यदि मनुष्य की इच्छाशक्ति व दृढ़ संकल्प उसके साथ है और वह पूरी तरह से अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए अडिग है तो कोई भी व्यक्ति यदि चाहे तो बिना किसी की सहायता के स्वयं अकेले दम पर पहाड़ों के बीच से रास्ता हमवार कर सकता है। दरअसल गरीब दशरथ मांझी की पत्नी का 1959 में केवल इसलिए निधन हो गया क्योंकि वह अपनी बीमार पत्नी को लेकर समय से अपने गांव से गया शहर तक नहीं पहुंच सका। दरअसल उसके गांव व शहर के मध्य एक पत्थर का पहाड़ पड़ता था। और उस पहाड़ के किनारे से घूमकर गया शहर तक पहुंचने का रास्ता लगभग 70 किलोमीटर का था। अपनी बीमार पत्नी के साथ यह दूरी तय करने में उसे काफी समय लगा। और दशरथ मांझी की पत्नी फागुनी देवी ने अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में ही दम तोड़ दिया। इस घटना ने दशरथ मांझी को भीतर से हिलाकर रख दिया। वह सोचने पर मजबूर हुआ कि यदि इस पहाड़ के बीच से रास्ता होता तो वह जल्दी शहर पहुंच जाता और अपनी पत्नी की जान बचा सकता था। अपनी पत्नी के देहांत के बाद दशरथ मांझी ने रास्ते में खड़े उस पहाड़ को अकेले ही तोडऩा शुरु किया। और अपने अकेले दम पर 22 वर्षों तक की गई लगातार मेहनत के बाद आखिऱकार अपने गांव व गया शहर के बीच की लगभग 70 किलोमीटर की दूरी को उसने मात्र 15 किलोमीटर के रास्ते में परिवर्तित कर दिया। उसने लगभग 360 फुट लंबा तथा 25 फुट गहरा तथा लगभग 30 फुट चौड़ा मार्ग गहलोर की पथरीली पहाडिय़ों की बीच से निकाल दिया। 1960 से लेकर 1982 तक अर्थात् 22 वर्ष में उसने यह कारनामा कर दिखाया। आज उस व्यक्ति को माऊंटेनमैन के नाम से पुकारा जा रहा है।

हालांकि दशरथ मांझी की 73 वर्ष की आयु में 2007 में मृत्यु हो चुकी है। परंतु आज भी उसके उक्त संकल्प की दास्तानें बड़े गर्व से सुनाई जा रही हैं। उसके द्वारा बनाया गया मार्ग एक दर्शनीय स्थल बन चुका है। दशरथ मांझी के इस अज़ीमुश्शान कारनामे पर िफल्मकार केतन मेहता द्वारा माऊंटेन मैन फि़ल्म बनाई जा चुकी है। आमिर ख़ान अपने प्रसिद्ध टीवी शो सत्यमेव जयते में मार्च 2014 में एक एपिसोड दशरथ मांझी के हौसले को समर्पित कर चुके हैं। आज बड़े से बड़ा फि़ल्मकार व राजनेता गहलौर गांव जाकर दशरथ मांझी जैसे महान पुरोधा के पहाड़ तोडऩे जैसे कारनामे को अपनी आंखों से देखना चाहता है। इतना ही नहीं बल्कि बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार 2007 में दशरथ मांझी को अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाकर पांच मिनट के लिए उसे राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में उसका सम्मान भी कर चुके हें। आज दशरथ मांझी के नाम से उसी क्षेत्र में कहीं सडक़ बन रही है तो कहीं अस्पताल स्थापित किया जा रहा है। और तो और उस गरीब माऊंटेनमैन की तुलना बादशाह शाहजहां से भी सिफऱ् इसलिए की जा रही है कि एक बादशाह होकर शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ महल की याद में धन-बल की सहायता से जहां ताजमहल जैसी बेशकीमती इमारत बनवा कर रख दी वहीं दशरथ मांझी भी किसी शहाजहां से इसलिए कम नहीं क्योंकि उसने भी अपनी पत्नी की मृत्यु से प्रेरित होकर अपने अकेले दम पर पहाड़ काटकर उसके बीच से रास्ता निकाल डाला। मेरे विचार से दशरथ माझी शाहजहां के ताजमहल निर्माण के कारनामे से भी बड़ा सिफऱ् इसलिए है कि क्योंकि ताजमहल आगरा के लोगों के लिए तो आर्थिक तरक़्क़ी का कारण तो भले ही बन गया हो परंतु उसके निर्माण से समाज का कोई कल्याण नहीं हो रहा। जबकि दशरथ मांझी द्वारा निर्मित किया गया मार्ग रहती दुनिया तक प्रत्येक व्यक्ति को फायदा पहुंचाएगा तथा न जाने कितने फागुनी देवी जैसे बीमार लोगों की जान बचाता रहेगा।

परंतु दशरथ मांझी के इस कारनामे से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्र यह है कि जिस पहाड़ को काटकर गांव और शहर के बीच की दूरी कम करने की ज़रूरत दशरथ मांझी ने महसूस की आिखर यही ज़रूरत उस क्षेत्र के विधायकों,सांसदों तथा मंत्रियों द्वारा क्यों नहीं महसूस की गई? दूसरी बात यह कि 22 वर्षों तक एक अकेला व्यक्ति पत्थर के पहाड़ों को तोड़ता रहा और इन 22 वर्षों के दौरान भी प्रशासन व शासन के कानों में जूं तक न रेंगी? यदि शासन की ओर से उसे उसकी योजना को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी सहायता मिल जाती, उसे बुलडोजऱ व जेसीबी मशीनों अथवा विस्फ़ोटकों की मदद दे दी जाती तो 22 वर्षों का कार्य बहुत कम समय में पूरा हो जाता। परंतु बिहार सरकार द्वारा या स्थानीय जि़ला प्रशासन की ओर से कुछ भी नहीं किया गया। जिस समय दशरथ मांझी ने पहाड़ खोदने की शुरुआत की थी उस समय तो उसके गांव के लोग भी उसे पागल ही समझ रहे थे। परंतु क्या सूरज की तपिश तो क्या मूसलाधार बारिश,क्या दिन तो क्या रात, क्या भूख तो क्या प्यास वह उन्हीं पहाड़ों में अपनी झोंपड़ी बनाकर दिन-रात पहाड़ तोडकऱ रास्ता निकालने के अपने संकल्प में जुट गया।आखिऱकार धीरे-धीरे उसके गांव के लोग उसके संकल्प के प्रति गंभीर होने लगे और उसे रोटी-पानी की सहायता देनी शुरु कर दी।

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