आर्थिक और तकनीकी विकास महाभारत काल में था अपने चरम पर

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सूर्यकान्त बाली

महाभारत का काल भारत के लिए काफी वैभवपूर्ण और आर्थिक समृद्धि का काल रहा है। महाभारत के काल में तकनीकी विकास भी अपने चरम पर रहा है। आम तौर पर तकनीकी की बातों को महाभारत में काव्य होने के कारण आलंकारिक रूप से दिया गया है। प्रसिद्ध लेखक व पत्रकार श्री सूर्यकांत बाली ने अपनी पुस्तक महाभारत का धर्मसंकट में इस पर विस्तार से चर्चा की है। यहां हम उस पुस्तक के कुछ अंश प्रकाशित कर रहे हैं।
जिन्होंने महाभारत ग्रंथ संपूर्ण रूप से पढ़ा है, वे इस बात से सहमत होंगे और जिन्होंने महाभारत ग्रंथ पढ़ा तो नहीं, पर उसे संपूर्ण या अधिकांश रूप से देखा है, वे भी इस बात से सहमत होंगे और जिन्होंने महाभारत कथा के बारे में परंपरावश सुना, जाना और समझा है, वे भी इस बात से सहमत होंगे कि महाभारतकालीन समाज में आर्थिक वेैभव अपने शिखर पर था और टेक्नोलॉजी का विकास उस समाज में हैरान कर देनेवाली सीमाएँ छू चुका था।
वैसे टेक्नोलॉजी का विकास और आर्थिक वैभव एक-दूसरे का कारण हैं तो एक-दूसरे का परिणाम भी हैं। आज का अमेरिका देख लीजिए, आज का पश्चिमी यूरोप देख लीजिए या फिर अमेरिका और यूरोप को मानदंड मानकर उनके जैसे जीवन की प्राप्ति की ओर बढ़ता अपने व्यक्तित्व से विमुख अपना भारत देख लीजिए, कारण और परिणाम वाला यह फॉर्मूला हर स्तर पर लागू होता नजर आता है।
वेदव्यास ने अपना प्रबंध काव्य महाभारत इसलिए नहीं लिखा था कि वे अपने समकालीन भावी पाठकों को अपने युग की आर्थिक समृद्धि से परिचित कराएँ। वैसा कराना किसी भी कवि का, खासकर वेदव्यास जैसे क्रांतदर्शी कवि का उद्देश्य हो भी नहीं सकता। पर कवि जो भी करता है, उसमें उसके अपने समय के संदर्भ आ ही जाते हैं। इतने सहज और स्वाभाविक तरीके से आ जाते हैं कि पाठक उन्हें बिना रेखांकित किए भी उनका आनंद ले सकता है। फिर वेदव्यास ने तो जिस कथानक को आधार बनाकर अपना प्रबंध काव्य लिखा वह तमाम कथानक उनके अपने जीवनकाल में घटे घटनाक्रम पर ही आधारित था और घटनाक्रम भी वह, जिसमें वे स्वयं भी एक महत्वपूर्ण, बेशक निर्विकार और निर्लिप्त किस्म के पात्र थे। इसलिए उनके प्रबंध काव्य में उनके अपने समय का समाज अपने पूरे वेग और जीवंतता के साथ रूपायित हुआ है। और समाज रूपायित हुआ है तो समाज की आर्थिक समृद्धि का यत्र-तत्र वर्णन महाकवि की लेखनी से कैसे छूट जाता?
पर फुटनोट के तौर पर एक बात हमें कतई नहीं भूलनी चाहिए। वेदव्यास जिन पात्रों और चरित्रों द्वारा घटित घटनाओं वाले कथानक को प्रबंध काव्य का आकार दे रहे थे, वे पात्र और चरित्र ग्राम समाज या मध्यवर्गीय शहरी समाज के नहीं थे। वे राजमहलों में रहनेवाले, राजसी ठाट-बाट वाले राजघरानों के पात्र और चरित्र थे, जो एक राजप्रासाद से दूसरे राजप्रसाद की यात्राएँ करते रहते हैं या अपने-अपने राजमहलों में तरह-तरह के यज्ञ और वैसे ही दूसरे आयोजन करते रहते हैं या फिर अपने-अपने अहंकारों को पूरा करने के लिए एक-दूसरे के विरूद्व छोटे-बड़े युद्ध करते रहते हैं। इसलिए महाभारत में गाँवों और शहरों का जितना भी वर्णन है, उससे कहीं ज्यादा वर्णन राजप्रासादों और उनसे जुड़ी घटनाओं का है। और ये राजप्रासाद किस कदर समृद्धि के छोटे-बड़े द्वीप जैसे हमारे सामने आते हैं, वेदव्यास द्वारा किए गए ये तमाम विवरण दिलचस्प और पढऩे लायक हैं।
महाभारत में जो राजप्रासाद सबसे नया-नया बना है, वह है इंद्रप्रस्थ का राजप्रासाद जिसे मय नामक राजमिस्त्री ने वहाँ बनाया था जहाँ कभी खांडव वन था और खांडव वन को जलाकर समतल जमीन में बदल दिया गया था। महाभारत में पूरे राजप्रसाद का वर्णन नहीं है, राजमहल के भीतर के सिर्फ  उस सभास्थल का वर्णन है, जहाँ युधिष्टिर के राजसूय यज्ञ में शामिल होने के लिए आए अनेक राजा-राजन्य इक_ा हुए थे। वेदव्यास द्वारा किए गए उस सभास्थल के वर्णन से ही आप न केवल पूरे राजप्रासाद के वैभव का अंदाजा लगा सकते हैं, अपितु उस समाज की समृद्धि की एक तस्वीर भी आपके दिमाग में खिंच सकती है।
वह सभास्थल दस हजार हाथ लंबा-चौड़ा था, दस हजार हाथ! उसी में सभास्थल के अंदर वृक्ष लहलहा रहे थे और करीब 8,000 सेवक उस सभास्थल में बैठनेवाले दरबारियों की सेवा में उपस्थित थे। वहाँ की मणि-जडि़त सीढिय़ाँ, पानी और जमीन का फर्क खत्म कर देने वाला फर्श, बीचों बीच एक सरोवर यानी स्विमिंग पूल और सभास्थल के चारों ओर हरे-भरे उद्यान। इस पर भी तुर्रा यह कि मय और उसकी टीम ने सभास्थल समेत पूरे राजप्रासाद का निर्माण चौदह महीने में पूरा कर दिया था। इसी से आप बनानेवाले की कारीगरी, भवन सामग्री की प्रचुरता और संसाधनों की गति की तीव्रता का अनुमान लगा लीजिए और फिर सोचिए कि वेदव्यास के समय देश में आर्थिक समृद्धि का आलम क्या होगा। इंद्रप्रस्थ का राजप्रासाद कोई वैसा अकेला नहीं था, बल्कि राजप्रासाद की शाृंखला में नवीनतम था। राजधानी हस्तिनापुर के धृतराष्ट्र के आवास की भी आप चाहें तो इसी आधार पर कल्पना कर सकते हैं। उधर पंचाल राज्य के जिस सभास्थल में द्रौपदी स्वयंवर हुआ था, वह सभास्थल पंचाल राजप्रासाद के ईशान कोण में था, सारा-का-सारा समतल था, जिसके चारों ओर बड़े-बड़े महल परकोटे, खाइयाँ और फाटक बने हुए थे, दीवारों पर चित्रकला के अद्भुत रंग थे और उसमें सैकड़ों राजन्यों के बैठने का इंतजाम था। यह वर्णन हमारा नहीं, वेदव्यास का है और अपने प्रबंध काव्य में अतिरंजनाएँ करनेवाले वेदव्यास कभी क्रांतदर्शी नहीं हो सकते थे। अगर उस समय वारणावर्त में दुर्योधन का कारीगर पुरोचन लाख और मोम का एक अद्भुत महल बना सकता था, जिस पर लाख और मोम से बने होने का शक ही किसी को न हो, तो फिर बताइए, कैसी रही होगी महाभारत के समय की भवन-निर्माण कला, जो विपुल समृद्धि में से ही जन्म ले सकती थी।
अब जरा विपुल समृद्धि से सराबोर उस युुग के एक अन्य पहलू से परिचित हो लिया जाए। ययाति, सौ कौरव और जरासंध, इन तीनों पात्रों या पात्र समूहों में एक समानता है, जिसके लिए इन तीनों से जुड़ी संदर्भ-कथाओं का फिर से वर्णन करना होगा, बेशक संक्षेप में और इनके बीच समानता को परखना होगा। सबसे पहले ययाति। ययाति अपने जमाने का महाकामुक व्यक्ति था। वह बूढ़ा हो गया, पर भोगों को पाने और उनका जमकर उपभोग करने की उसकी लालसा बरकरार थी। उसकी दो पत्नियाँ थीं- शर्मिष्ठा और देवयानी। इनमें से देवयानी के पिता शुक्राचार्य ने बूढा हो जाने का शाप दिया तो ययाति रो पड़ा कि मेरी तो भोग-लिप्सा अभी बरकरार है, बूढ़ा हो गया तो मेरा क्या हाल होगा? उदार शुक्राचार्य ने उसे रास्ता सुझाया कि अगर तुम्हारे पाँच पुत्रों में से कोई एक अपनी जवानी तुम्हें दे दे तो तुम्हारी समस्या हल हो जाएगी। बेचारा ययाति, गया अपने पाँच पुत्रों के पास। चार पुत्रों ने उसे साफ  मना कर दिया। सबसे छोटे पुत्र ने पिता की हालत पर तरस खाकर उसे अपनी जवानी दे दी और बदले में उसका बुढ़ापा ले लिया। भोगों से तृप्त होकर और भोगों की व्यर्थता को समझकर जब ययाति ने पुत्र को अपने साम्राज्य का उत्तराधिकारी भी बना दिया। वहाँ से शुरू हुआ पौरव वंश हस्तिनापुर का केंद्रीय शासन।
क्या आप बुढ़ापे और जवानी के इस लेन-देन पर कमीज और पतलून के लेन-देन की तरह विश्वास करने को तैयार हैं? नहीं हैं, तो सुनिए, इससे भी बढ़कर एक दूसरी रोमांचक कथा। वेदव्यास के वरदान से धृतराष्ट्र-पत्नी गांधारी को सौ पुत्र पैदा होने थे, पर उसके गर्भ से पैदा हुआ एक मांस-पिंड। जानकारी मिलने पर वेदव्यास तुरंत गांधारी के पास आए और उस मांस-पिड को फेंकने को तत्पर महारानी को रोका। फिर उस गरम मांस-पिंड पर ठंडा पानी डाला, उसके सौ टुकड़े किए, हर टुकड़े को घी से भरे एक-एक कुंड में डाल दिया। दो साल बाद जब कुंड खोले गए तो मांस-पिंड का हर टुकड़ा एक-एक शिशु के शरीर में रूपांतरित हो चुका था। ये सौ शिशु सँभालकर गांधारी के पास लाए गए, उनका प्रयत्नपूर्वक पालन-पोषण हुआ और वे धृतराष्ट्र के दुर्योधन, दु:शासन आदि सौ बेटे हुए।
अब इन दोनों से भी ज्यादा अविश्वसनीय कहानी सुन लेनी चाहिए, जरासंध की कहानी। मगधराज बृहद्रथ ने पड़ोसी काशीराज की दो कन्याओं से शादी की। चंडकौशिक ऋषि के वर से उन दोनों को एक (एक-एक नहीं, एक) पुत्र होना था। दोनों रानियाँ खुश थीं कि उन्हें एक-एक पुत्र होगा पर हुआ कुछ और ही। दोनों के गर्भ से एक शिशु के शरीर का आधा आधा भाग (आधा बायाँ और आधा दायाँ भाग) पैदा हुआ। निराश और डरी हुई दोनों बहनों ने उस शरीर के दोनों हिस्सों को महल से बाहर फिंकवा दिया, जिन्हें वहाँ घूम रही जरा नामक एक राक्षसी ने उनकी सिलाई कर एक शिशु में रूपांतरित कर राजा बृहद्रथ को (पूरी कहानी सुनाते हुए) लौटा दिया। राजा प्रसन्न कि उसके पुत्र को जरा ने जोड़ (संध) दिया है और उसने पुत्र का नाम रख दिया जरासंध।
यह कैसे हो सकता है? एक मांस-पिंड को सौ शिशुओं में विकसित कर दिया गया, यानी एक कोरी गप्प? दो टुकड़ों को सीकर या जोड़कर एक शिशु बना दिया गया, कौन मानेगा भला? हमारी भी इच्छा होती है कि हम भी इस आसान रास्ते को चुनकर इन कथाओं को इंटरनेट के चुटकुले मान लें। पर फिर सवाल उठने लगते हैं कि क्या इन्हीं गप्प-कथाओं के सहारे महाभारत कालातीत ख्यातिप्राप्त प्रबंध काव्य बन गया? क्या ऐसी ही छोटे स्तर की बातें लिखकर महर्षि वेदव्यास क्रंातदर्शी महाकवि बन गए और आनेवाली कवि-पीढिय़ों के प्रेरणास्त्रोत बन गए?
इन सवालों और इन कथाओं को गप्प मान लेने के विकल्प में चूँकि परस्पर कोई तालमेल नहीं है, इसलिए कुछ समझदार विकल्पों की ओर जाना हमारी विवशता है। हमारा शुरू से मानना रहा है कि महाभारतकालीन भारत का समाज विज्ञान और टेक्नोलॉजी की दृष्टि से परम समुन्नत समाज था, आज के पश्चिम के जैसा या पश्चिम जैसा बनने की ओर उन्मुख आज के भारत जैसा। हमने जिन तीन संदर्भ-कथाओं को आपके सामने फिर से पेश कर दिया है, ऐसी ये कोई तीन घटनाएँ ही नहीं हैं। महाभारत में ऐसी घटनाएँ यहाँ-वहाँ खूब बिखरी हुई है, जिनका अर्थ यही है कि शरीर-विज्ञान और आयुर्विज्ञान उन दिनों विकास की एक खास सीमा तक पहुँच चुके थे, जहाँ आज के ‘टेस्ट-ट्यूब बेबी’ सरीखी घटनाएँ अकसर हो जाया करती थीं। नोट करने लायक बात यह है कि वेदव्यास ने इन घटनाओं को चमत्कार जैसा नहीं बताकर सामान्य घटनाओं के रूप में ही बताया है, इस हद तक सामान्य तरीके से कि एक घटना के घटित होने में तो खुद वे भी एक पात्र हैं।
हमारी समस्या यह है कि हमारे इस प्रबंध काव्य में उस तमाम विधि का वर्णन नहीं हैं, जिसके तहत पुरू ने अपनी जवानी ययाति को सौंप दी, व्यास ने एक मांस-पिड़ को सौ शिशुओं में रूपांतरित कर दिया और जरा ने दो शरीरार्धों को एक शिशु-शरीर में जोड़कर रख दिया। पर फिर महाभारत तो एक लंबी कविता है, कोई शरीर-विज्ञान या आयुर्विज्ञान का ग्रंथ तो नहीं कि जो हमें इन तमाम वाकयों की विधि भी समझाए। जिनको यह बात समझ में आती हो कि गप्प मारने में, चमत्कार बताने में एक क्रंातदर्शी कवि की कोई रूचि नहीं हो सकती, उनका फिर फर्ज भी बनता है कि वे महाभारत की इस टेक्नोलॉजी को जानने की कोशिश करें। हमारा संकेत उन वैज्ञानिकों की ओर है, जो आज परखनली शिशु और भ्रूण प्रत्यारोपण जैसे कार्यो में पूरी निष्ठा से जुटे हैं। इस देश के उनके पूूर्वज वैज्ञानिक भी ऐसी निष्ठा दिखा चुके हैं।
हमारे देश के लोगों के मन में संजय की उस शक्ति को लेकर भी भारी असमंजस रहता है, जिस शक्ति के तहत उन्होंने धृतराष्ट्र को अठारह दिनों के महाभारत युद्ध का पूरा-का -पूरा विवरण सुनाया। हमारा ऐसा कोई दावा नहीं कि हम उस असमंजस को दूर कर देने वाले हैं। पर संजय को लेकर वह असमंजस कम जरूर हो सकता हैं जिसके तहत उसने अंधे धृतराष्ट्र को युद्ध का पूरा विवरण सुनाया, ताकि संजय की सही-सही भूमिका का कुछ अनुमान आज युद्ध के 5,000 साल बाद लगाया जा सके। महाभारत पर एक विशालकाय प्रबंध काव्य लिखा जाए और उसमें अठारह दिनों तक लड़े गए उस ऐतिहासिक युद्ध का विवरण न हो ऐसा कैसे हो सकता है? वेदव्यास ने उस युद्ध का विवरण देने का एक अनोखा तरीका निकाला। वे पहले धृतराष्ट्र के पास गए। कहने लगे कि एक महाभयानक युद्ध होने वाला है, जिसमें तुम्हारे पु़त्र व सभी असंख्य योद्धा मरने को तैयार खड़े हैं। तुम्हारी आँखें नहीं हैं, चाहो तो मैं तुम्हें इतने समय के लिए दिव्य दृष्टि दे सकता हुँ, ताकि तुम युद्ध को खुद देख सको। धृतराष्ट्र तैयार नहीं हुए। कहने लगे कि मैं अपने ही पुत्रों की मौत देखना नहीं चाहता। तुम्हीं मुझे इसका वर्णन कर देना। व्यास का कहना था कि मैं तो उस महाभारत युद्ध का विस्तार से वर्णन करूँगा; पर तुम अगर नहीं देखना चाहते तो कोई बात नहीं, मैं संजय को ही यह क्षमता दे देता हूँ कि वह तुम्हें युद्ध का पूरा विवरण देता रहेगा। यह सारा संवाद महाभारत के ‘भीष्मपर्व’ के दूसरे अध्याय में है (हम गाीताप्रेस, गोरखपुर की ‘महाभारत’ को आधार बना रहे हैं)।
वेदव्यास ने संजय को जो शक्ति दी उसे जान लिया जाए। व्यास ने कहा, ‘संजय दिव्य दृष्टि से संपन्न होकर सर्वज्ञ हो जाएगा और तुम्हें युद्ध की बात बताएगा। कोई भी बात प्रकट हो या अप्रकट, दिन में हो या रात में या फिर मन में ही क्यों न सोची गई हो, संजय सब कुछ जान लेगा।’ (श्लोक 10-11)।
इतना तो ठीक है, पर इसके बाद यानी यह पराभौतिक शक्ति देने जैसी बात के बाद व्यास ने खाँटी व्यावहारिक बात कह दी। कहा, ‘इसे कोई हथियार काट नहीं सकेगा। इसे मेहनत से या थकावट से कोई असर नहीं पड़ेगा। गवल्गण का यह पुत्र संजय इस युद्ध से जीवित बच जाएगा।’ (श्लोक12)। इस आखिरी श्लोक से तो जाहिर है कि संजय ने रोज युद्धस्थल में जाकर वहाँ का हाल-चाल देखकर फिर साँझ के वक्त वापस आकर धृतराष्ट्र को सारा विवरण सुनाया था। हस्तिनापुर से कुरूक्षेत्र खासा दूर है। रोज सुबह, भोर में ही जाकर रात को वापस आना और फिर विस्तार से सुनाना खासी मेहनत और थकावटवाला काम है। युद्ध में जाकर, हर जगह हर कोने और मौके पर जाकर भी जीवित और अक्षत बने रहना खासी उपलब्धिवाला काम है। यानी मामला रोज के आने-जाने, देखने-भालने और बताने-सुनाने का भी है।
यानी व्यास द्वारा संजय को दी गई दिव्य दृष्टि संजय को दिया गया एक आदेश जैसा था कि उसके जिम्मे यह दायित्व है कि वह रोज युद्धस्थल जाकर और वहाँ से वापस लौटकर अपने स्वामी धृतराष्ट्र को युद्ध का विवरण दे। संजय ने यह काम पूरी तल्लीनता, निष्पक्षता और निस्पृह भाव से किया। इस दिव्य दृष्टि को कभी हम भारतवासी सचमुच दिव्य दृष्टि मानते थे और जब टेलीविजन का आविष्कार हुआ तो कहने लगे कि देखा, महाभारत काल में भी हमने टेलीविजन जैसा कुछ बना लिया था। ये सब बच्चों की बातें हैं। संजय का काम रोज का था, मेहनत का था, थकावट का था, जो उन्होंने बखूबी किया। हाँ, इतना जरूर है कि रोज कुरूक्षेत्र जाकर हस्तिनापुर लौटना जिस तीव्र गति का काम था, उस गति को महाभारत काल की ऊँची टेक्नोलॉजी ने जरूर हासिल कर लिया था।

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