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आओ कुछ जाने हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

5250 वर्ष पहले हुआ था योगिराज श्री कृष्ण जी का जन्म

आज हम अपने देश के महान इतिहासनायक, युगपुरुष योगिराज श्री कृष्ण जी की 5250 वी जयंती मना रहे हैं। इस राष्ट्र नायक के राष्ट्रवादी स्वरूप को स्थापित न करके उसे छलिया, चूड़ी बेचने वाला श्याम आदि बनाकर जिस प्रकार पाखंड चलाया गया है उससे हमारे देश का बहुत अहित हुआ है। आज अपने इस योगीराज के वास्तविक स्वरूप को लोगों के सामने प्रकट करने का समय आ गया है। क्योंकि जैसी शक्तियां उनके जीवन काल में राष्ट्र और समाज के लिए खतरा बनी हुई थीं उससे भी खतरनाक स्थिति इस समय देश ,समाज और राष्ट्र के लिए बन चुकी है। देश की विघटनकारी शक्तियों के विनाश के लिए योगिराज श्री कृष्ण जी के महान कार्यों का अनुकरण करते हुए हम इन सभी समस्याओं पर पार पा सकते हैं ।
आइए ,जानते हैं योगीराज श्री कृष्ण जी के बारे में कुछ विशेष तथ्य।
18 फरवरी 3102 ईसा पूर्व को कलयुग का प्रारंभ हुआ था।
कलियुगाब्द विश्व का उपलब्ध प्राचीनतम प्रमाणिक संवत है।
वर्तमान में कलियुगाब्द  5122 प्रचलित है।
महाभारत युद्ध के प्रारंभ होने से पूर्व ही घोषणा श्री कृष्ण जी महाराज ने कर दी थी कि कलयुग शुरू हो चुका है। महाभारत के युद्ध के दौरान कृष्ण जी की आयु 128 वर्ष थी। कलियुगवर्ष व कलयुग के प्रारंभ होने का  समय 5122 व कृष्ण जी की आयु  128 जोड़ने पर 5250 वर्ष पूर्ण हो जाते हैं
इस प्रकार आज 30 अगस्त 2021को श्री कृष्ण जी का 5250वां जन्मदिन है।
महाभारत युद्ध की समापन के पश्चात सम्राट युधिस्टर आर्यवर्त के चक्रवर्ती सम्राट बने और युधिष्ठिर संवत् भी प्रारंभ हुआ।
महाभारत के पश्चात सम्राट युधिष्ठिर ने 36 वर्ष राज्य किया था और 36 वर्ष के पश्चात जब कृष्ण जी का स्वर्ग लोक गमन हो गया तो युधिष्ठिर ने भी अपने भाइयों के साथ हस्तिनापुर का राज्य छोड़ दिया था। अर्थात महाभारत युद्ध के बाद में 36 वर्ष 8 माह कृष्ण जी महाराज और जीवित रहे थे इस प्रकार 128 में 36 वर्ष 8 माह जोड़ा जाए तो परलोक गमन के समय श्री कृष्ण जी की आयु करीब 163 – 164 वर्ष थी।
श्री कृष्ण जी महाराज एक योगेश्वर थे। महान एवम्  विचित्र थे। वह अपने समय के बहुत बड़े बुद्धिमान थे। अपने समय में वेदों के प्रकांड पंडित थे ।महाराजा कृष्ण का ऐसा प्रबल आत्मा था कि दूसरों का आत्मा उनके आत्मिक बल से प्रभावित होकर उनके ही आदेशों पर चलने लगता था।

कृष्णा जी योगी

उन्होंने योग शक्ति के द्वारा अपना विराट रूप प्रदर्शित करके अर्जुन के मोह का नाश किया था ।यहां पर कृष्ण जी को ईश्वर का अवतार समझने की गलती हम ना कर दें। जैसे ईश्वर का विराट रूप होता है। ऐसे ही योगी का भी विराट रूप होता है । कृष्ण जी योगेश्वर थे। इसलिए उन्होंने अपना विराट रूप अर्जुन को दिखाया था।
विराट रूप ईश्वर भी दिखा सकता है और योगी भी दिखा सकता है । योगी इस पंच महा भौतिक मानव शरीर में रहते हुए भी विराट रूप दिखा सकते हैं। इससे दर्शक चकित हो जाता है। उसकी चंचल और मानसिक वृत्तियां केंद्रित हो जाती हैं ।दर्शक का अज्ञान समाप्त हो जाता है।
अर्जुन से श्री कृष्ण जी महाराज ने एक गुरु की भांति यही कहा था जैसे गुरु अपने शिष्य को कहता है कि तुम मुझे अब सब अर्पण कर दो, वही श्री कृष्ण ने कहा था ऐसा करने से शिष्य का अज्ञान समाप्त हो जाता है।
शिष्य की चिंता समाप्त हो जाती है।
फिर भी किसी ऋषि मंडल ने श्री कृष्ण को ईश्वर का अवतार अर्थात भगवान के रूप में या पूर्ण ब्रह्म नहीं माना।
वास्तव में मानव को बहुत ऊंचा विचार करना चाहिए। महाराज कृष्ण के जीवन को वास्तविक रूप में हमने जाना ही नहीं।
योगेश्वर महाराज कृष्ण की योग्यता एवं उनके चरित्र को नाना प्रकार से लांछित कर दिया है ।अनेक प्रकार की भ्रांतियां लोगों ने फैला दी है।
नाग नाथन।

देखिए योगिकवाद में जब योगी  आ जाता है तो उसके पांच अवगुण काम, क्रोध, लोभ ,मोह ,अहंकार इनमें से यदि कोई भी उसमें आ जाता है तो वह सर्प के समान हो जाता है। सर्प का प्रभाव उसके अंदर आ जाता है ।वह विषधर बन जाता है। अर्थात योगी के अमृत को कोई भी एक अवगुण विष बनाने के तुल्य अपना क्रियाकलाप करने लगता है । ऐसा योगिक सूत्रों में आया है कि भगवान कृष्ण जहां अध्ययन में इतने पारायण थे। वहां योग में भी उनकी बड़ी प्रवृत्ति थी।  वे जब योगाभ्यास करने लगे तो यह पांच फन वाला शेषनाग बन गया। काम, क्रोध ,लोभ, मोह ,अहंकार उसके फन  कहलाते हैं। इसलिए भगवान कृष्ण अपने योगाभ्यास के द्वारा, अपनी प्रवृत्ति और विवेक के द्वारा इसके फनों के ऊपर नृत्य करने लगे।
  यही नाग नाथन या नाग मंथन है।
मेरा विनम्र निवेदन है कि इस विषय में पहले वास्तविक अर्थ को समझो और इसके वास्तविक अर्थ का ही प्रचार एवं प्रसार करो।

16000 गोपी कौन?

25 वर्ष की आयु तक श्री कृष्ण जी संदीपनी ऋषि के आश्रम में उज्जैन में , क्षिप्रा नदी के तट पर अध्ययन करते रहे। तत्पश्चात उनका विवाह संस्कार हुआ और संसार के कार्य में व्यस्त हो गए। उनका जीवन संसार के कार्यों में रत रहकर भी बड़ी पवित्रता में परिणत रहा। महान रहा। उनके जीवन में कोई अश्लीलता किसी भी प्रकार की नहीं आई ।कभी किसी मानव के द्वारा उनकी किसी बात का विरोध अश्लील कहकर नहीं किया गया।
आज का मानव उनके विषय में कुछ कह रहा है जबकि उनका साहित्य काल कुछ अलग ही कह रहा है।
उन्होंने 16000 वेद की ऋचाएं कंठस्थ की और वे उन्हें विचारों में रमण करते रहते थे ।वर्तमान समाज ने यह नहीं जाना और यह स्वीकार कर लिया कि 16000 गोपी  थी, जिनमें कृष्ण जी नृत्य करते रहते थे। अरे नृत्य नहीं, गोपनीय विषय जो प्रत्येक वेद मंत्र में निहित रहता है, उसी गोपनीय विषय को वह चिंतन में लगे रहते थे।

षोडश कलाएं।

श्री कृष्ण जी 16 कलाओं को जानते थे सोलह कलाएं क्या होती हैं?
सबसे प्रथम कला का नाम प्राचीदिग, दक्षिण दिग,  प्रतिचि दिग,उदीची दिग,  यह 4 कलाएं मानी गई है। पृथ्वीकला ,वायुकला, अंतरिक्षकला और समुद्र कला ,4 कलाएं यह थी।
तीसरे स्थान पर सूर्यकला, चंद्रकला ,अग्निकला और विद्युतकला यह चार थी।
चौथे नंबर पर मनकला ,चक्षु कला , श्रोत्रकला और सूंघने की कला ,इन सब को वह जानते थे।
योग में श्री कृष्ण जी की कितनी गति थी ।
16 कलाओं को जानने वाला महापुरुष होता है इसलिए श्री कृष्ण जी को महान कहते हैं।
मैं क्षमा चाहूंगा मंद बुद्ध अज्ञानी, श्री कृष्ण की लीला, रासलीला करने वालों से ,जो अपने महापुरुषों को, अपने योगियों को, छलिया, गोपियों के मध्य नाचने वाला ,नहाती हुई गोपियों के कपड़े चुराने वाला ,श्री कृष्ण के वास्तविक प्रेम को वासन आत्मक ,अनुचित तरीके से समाज में पेश करने वालों से ।
ऐसे ही लोगों ने योगी शिव जी को भांग पिला कर हिमालय पर बैठा दिया। कृष्ण जी को गोपियों के मध्य रासलीला करते हुए दिखाया। ऐसे लोगों को शर्म आनी चाहिए। यह तो वह कृष्ण है जिन्होंने बचपन से ही अपराधियों का, अत्याचारियों का, दुष्टों का, विरोध करते हुए उनका संहार किया। जिन्होंने कंस, जयद्रथ, जरासंध, दुर्योधन, ताड़का आदि दुराचारीओं से समाज को निजात दिलाई। जो आर्यावर्त की रक्षा करने के लिए उसके द्वार पर समुद्र किनारे द्वारका विशेष शहर बनाकर अथवा बसाकर सफल नायक की भूमिका में सिद्ध हुए। जिन्होंने महाभारत के समय में गीता का अलौकिक ज्ञान समस्त संसार को दिया। जिन्होंने लोक निंदा की परवाह न करते हुए अपनी भूमिका को पूरी निष्ठा से निभाया ।जिन्होंने वैदिक संस्कृति का आर्यवर्त में, भारतवर्ष में पुन: स्थापन किया ।जो बुद्धि और शक्ति के अलौकिक पुरोधा हैं। उनके जन्मदिन पर प्रत्येक भारतवासी को जन्माष्टमी के अवसर पर अत्यंत ही हर्ष का अनुभव होना चाहिए।
(उनको प्राप्त सारी कलाओं का प्रथक प्रथक उल्लेख एवं कलाओं  की महानता का विषय बहुत विस्तृत हो जाएगा )

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन :  उगता भारत

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