भाषा माध्यम है वास्तविक शिक्षा का

अशोक प्रवृद्ध

बोलने वाली भाषा शब्दों से बनती है । शब्द अर्थ से युक्त हों तो भाषा बन जाती है । अत: बोलने वाली भाषा अर्थयुक्त वाक्य है । भाषा की श्रेष्ठता भावों को सुगमता से व्यक्त करने की सामथ्र्य है । भावों को व्यक्त करने की सामथ्र्य को ही भाषा की शक्ति माना जाता है । यह वैदिक संस्कृत में सर्वश्रेष्ठ है । भाषाविदों और वैदिक विद्वानों के अनुसार आदि मनुष्य और आदि भाषा अति श्रेष्ठ थी । भाषा जो आरम्भ में बनी, वह अति अर्थयुक्त थी । वैदिक संस्कृत, मध्यकालीन संस्कृत अर्थात रामायण व महाभारत की भाषा , प्राकृत, और फिर बंगला, तमिल, गुजराती, कन्नड़, पंजाबी, राजस्थानी इत्यादि भाषाओं के गहराई से अध्ययन करने से इस सत्य का सत्यापन होता है कि सर्वाधिक प्राचीन वैदिक भाषा बाद की अर्थात वर्तमान भाषाओँ से अधिक श्रेष्ठ थी और देवनागरी लिपि स्वाभाविक क्रम और वैज्ञानिक ढंग से प्रवृद्ध, निबद्ध और नियत किये जाने के कारण सभी लिपियों में सर्वश्रेष्ठ। इस समय संस्कृत निष्ठ हिन्दी ही वेद भाषा के सर्वथा समीप है और यदि विभाजन पश्चात देश ने हिन्दी और देवनागरी लिपि को स्वीकार किया होता तो हम अब तक वेद की संस्कृत भाषा और उसकी लिपि देवनागरी के साथ ही ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में पर्याप्त प्रगति कर चुके होते ।

शिक्षा और भाषा का वही सम्बन्ध है जो हाथ और दस्ताने का है। दोनों में सामंजस्य होना ही चाहिये ।वस्तुत: शिक्षा के अन्तर्गत ही भाषा है। कारण यह है कि भाषा माध्यम है वास्तविक शिक्षा का। यही कारण है कि देश की भाषा का प्रश्न उत्पन्न होता है। भाषा के सम्बन्ध में कुछ विद्वानों ने भ्रम उत्पन्न कर रखा है कि भाषा का लोगों की सभ्यता और संस्कृति से सम्बन्ध है। यह विचार मिथ्यावाद है। सभ्यता वह व्यवहार है जो सभा, समाज में, परिवार में , मुहल्ले में अथवा नगर में शान्ति, सुख और प्रसन्नता पूर्वक रहने में सहायक हो । इसका सम्बन्ध व्यवहार से है । भाषा बोलने अथवा लिखने से इसका सम्बन्ध नहीं । अभिप्राय यह है कि भिन्न-भिन्न भाषा बोलने वाले समान व्यवहार अर्थात समान सभ्यता रखने वाले हो सकते हैं। इसी प्रकार संस्कृति- संस्कृति में भेद-भाव भाषा के आधार पर नहीं होता। उदाहरणार्थ हिन्दू संस्कृति है- परमात्मा, जीवात्मा, कर्मफल, पुनर्जन्म, सनातन धर्मों को मानना और उनके अनुकूल व्यवहार रखना । कोई भी भाषा बोलने अथवा लिखने वाला हो, ये लक्षण सबमें समान होंगे।

दरअसल भाषा के दो उपयोग हैं। एक यह कि जब दो अथवा दो से अधिक व्यक्ति मिलते हैं तो कोई मध्यम ऐसा होना चाहिए जिससे एक दुसरे को अपने मन की भाव अथवा अनुभवों को बतला सकें । इसका दूसरा उपयोग तब होता है जब हम अपने विचार और अनुभव अपने स्मरण रखने के लिए तथा भविष्य में आने वाले मनुष्यों के लिए सुरक्षित रखना चाहते हैं । इसके लिए बोली और लिपि दोनों का आविष्कार किया गया । इन दोनों के संयोग को भाषा कहते हैं । शब्द और लिपि दोनों के ही सहयोग से हम अपने विचार दूसरों को बता सकते हैं । वे दूसरे समकालीन भी हो सकते हैं और भविष्य में उत्पन्न होने वाले भी हो सकते हैं । इसी कारण भाषा को ज्ञान का वाहन भी कहा जाता है ।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि भाषा परस्पर विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम है । एक देश के नागरिकों को एवं भूमण्डल के नागरिकों को परस्पर बात-चीत करने अथवा विचार बतलाने में माध्यम भाषा ही है। मानव-कल्याण के हित में हमें कोई ऐसा माध्यम चाहिए कि जिसमे हम एक-दूसरे की बात को समझ-समझा सकें । होना तो यह चाहिए और इस बात से सभी सहमत भी होंगे कि भूमण्डल के सभी देशों के रहने वालों में, जिन्होंने अपने भाग्य को एक दूसरे से सम्बद्ध कर रखा है, एक साँझी भाषा हो।तभी वे परस्पर सहचारिता से रह सकेंगे और विचारों का आदान-प्रदान कर सकेंगे । और जहाँ तक एक देश की बात है तो एक देश में एक ऐसी भाषा की नितान्त आवश्यकता है जिससे विचारों का आदान-प्रदान हो सके ।जब कोई यह कहता है कि बंगाल में बंगला भाषा ही माध्यम हो, तो वह अन्जाने में यह भी कह रहा है कि बंगाल और उत्तरप्रदेश में विचारों के आदान-प्रदान की आवश्यकता नहीं , अथवा पंजाब और बंगाल वालों में किसी प्रकार की संपर्क की आवश्यकता नहीं, उन्हें महाराष्ट्रियनों से भी कोई मतलब नहीं। बंगाल, उत्तरप्रदेश. महाराष्ट्र और पंजाब तथा भारतवर्ष के अन्य राज्यों में समन्वय और सम्बन्ध होना परमावश्यक है । इस विचार से इन्कार करने में कोई कारण नहीं कि देश में एक सभ्य भाषा की परमावश्यकता है।इसमें झगड़ा यही है कि देश के कुछ लोग हैं जो किसी कारण से विदेशी भाषा अंग्रेजी पढ़ गए हैं और वे अंग्रेजी को ही भारतवर्ष की सम्पर्क भाषा बनाना चाहते हैं ।उन्होंने ही बंगला, तमिल अथवा तेलुगु भाषा-भाषियों का झगड़ा उत्पन्न कर रखा है जिससे कि अंग्रेजी संपर्क भाषा बनी रहे। तमिल, बंगला, तेलुगु इत्यादि भाषा को वे शतरंज का मोहरा बनाये हुए हैं । वे यह तो जानते हैं कि बंगला, तमिल इत्यादि भाषाएँ राजकीय भाषाएँ हैं, परन्तु वे भारतवर्ष की संपर्क भाषा नहीं बन सकतीं । इससे वे हिन्दी को पराजित करने के लिए बंगला, तमिल, तेलुगु इत्यादि सभ्यताओं और संस्कृति की कूक लगाते रहे हैं । तमिल, बंगला इत्यादि सभ्यताएं यदि पृथक-पृथक हैं तो भी इनका भाषा से सम्बन्ध नहीं है ।ये सभ्यताएं हिन्दी सीख लेने पर अथवा बोलने लगने से भी बनी रहेंगी ।

अंगेजी को संपर्क भाषा बनाने अर्थात अंग्रेजी को सामने रखने में कारण यह नहीं कि देश के अधिकांश प्राणी इस भाषा को समझ सकते हैं, न ही इसके पक्ष में यह बात है कि निकट भविष्य में यह भारतवर्ष में बहुसंख्यकों की भाषा होने वाली है, वरन यह केवल इसलिए कि अंग्रेजी काल से यह विद्यालय-महाविद्यालय में पढ़ाई जाती है और बलपूर्वक सरकारी कार्यालयों , दफ्तरों और व्यवसायों में इसका चलन किया गया है ।इस पर भारतवर्ष का दुर्भाग्य यह है कि विभाजन के पश्चात जब तक देश में कांग्रेस की सरकारों का वर्चस्व स्थापित रहा है तब तक राज्यों की सरकारें और केन्द्रीय सरकार सिर तोड़ यत्न करती रही हैं कि अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाये रखा जाए ।परन्तु दुखद स्थिति यह है कि देश में प्रचण्ड बहुमत से बनी नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी सरकार के आने के बाद भी आशा के विपरीत इसमें कोई सुधार नहीं हो सका है । आज भी देश के अधिकाँश विश्वविद्यालयों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बना हुआ है ।यह अंग्रेजी काल से चला आ रहा है और सरकार ने इसे बदलने का यत्न नहीं किया है । सरकार के अनेर्क अबुद्ध कार्यों में यह सबसे बड़ा अबुद्ध कार्य है कि सरकार ने देश के बच्चों की शिक्षा पर अपना एकाधिकार बनाकर उसका माध्यम अंग्रेजी बना रखा है । सरकार को भाषा में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए । यह राजकीय कार्यों में नहीं कि राज्य शिक्षा को अपने हाथों में ले और फिर उसे अपने हाथों में रखने के लिए यह विधान कर दे कि उसके अधीन शिक्षा केन्द्रों से पढ़े-लिखे हुए ही पढ़े-लिखे माने जायें तथा अन्य शिक्षा केन्द्रों से शिक्षा प्राप्त करने वाले, यदि कोई हैं, तो वे अशिक्षित हैं । ये दोनों कार्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं और देश की कोटि-कोटि जनता को अपार हानि पहुँचाने वाले हैं । सरकार, विशेष रूप से केन्द्र में और उत्तर भारत के राज्यों की सरकारें हिन्दी के पक्ष की बातें तो करतीं हैं, परन्तु भारतवर्ष विभाजन के पश्चात् के विगत अरसठ वर्षों में एक भी विश्वविद्यालय ऐसा चालू नहीं कर सकीं जिसमें शिक्षा का माध्यम पूर्णत: हिन्दी हो और फिर उस विश्वविद्यालय के स्नातकों को दुसरे विश्वविद्यालयों पर उपमा दे सकें ।

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