मां एक संघर्ष है-जो हमारे लिए हर तूफान से लड़ती है

युवा वर्ग को विचार शक्ति सबल, सक्षम और सफ ल बनाती है, और विचार को संस्कार प्रबल करता है। संस्कारहीन युवा सृजनात्मक विचार शक्ति से शून्य होता है। सृजनात्मक विचार शक्ति सुसंस्कृत समाज की संरचना का आधारभूत सत्य है। आप देखेंगे तो पता चलेगा कि समाज में दो विचारधाराएँ सदा प्रवाहित रही हैं एक वह विचारधारा है जिसे लोग राक्षसी विचारधारा कहते हैं, तो दूसरी वह विचारधारा है जिसे लोग देवताओं की विचारधारा कहते हैं।
पुराणों में इन दोनों विचारधाराओं को सुर-असुर विचारधारा कहा गया है। जबकि वैदिक समाज में इसे आर्य-अनार्य के नाम से पुकारा गया है। श्रीकृष्ण जी महाराज ने साधुओं के परित्राण और दुष्टों के जिस विनाश की बात गीता में कही है वह भी समाज की इन दोनों विचारधाराओं की ओर ही हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। वास्तव में सुर विचारधारा उन लोगों की विचारधारा है जो समाज में निर्माणात्मक विचारों के प्रसार-प्रचार में संलग्न रहते हैं और जो समाज की उन्नति के लिए सत्कार्यों को करते हैं और उन्हें करने के लिए दूसरों को प्रोत्साहित भी करते हैं। यह विचारधारा समाज की मुख्यधारा का निर्माण करती है। MATA JEEजिससे समाज की दिशा और दशा सुधरती है। इसमें जब लोग स्वभावत: चलने के अभ्यासी हो जाते हैं तो समाज में मर्यादा का पालन होने लगता है, मर्यादा पालन को ही श्रीकृष्ण जी ने धर्म की स्थापना कहा है। धर्मानुकूल चलने वाला समाज कानून के भय से चलने वाले समाज की अपेक्षा कहीं उत्तम होता है। हर युग में ऐसे धर्मानुकूल समाज की संस्थापना करना ही आप्तपुरूषों का जीवन ध्येय रहा है। क्योंकि धर्मानुकूल समाज में ही ‘सर्वजन सुखाय’ के आदर्श को प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे समाज के लोग दूसरों के उत्थानार्थ स्वेच्छा से मार्ग छोड़ देते हैं। जिससे सुसंस्कारित देव-संस्कृति में आस्था और विश्वास रखने वाले लोगों ने भारतीय संस्कृति और राष्ट्र का निर्माण किया है। कहा गया है –
हिमालयं समारभ्य यावदिन्दु सरोवरम्।
तं देवनिर्मित देशम् हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।।
हिमालय से इन्दु सरोवर पर्यन्त इस देवनिर्मित देश को हिन्दुस्थान कहते हैं। हमसे भूल हो जाती है तब जबकि हम यह स्थापित करने या मानने का प्रयास करते हैं कि देव लोग किसी अन्य लोक के प्राणी हैं और वह आसमान में या कहीं और रहते हैं। जबकि ऐसा नहीं है। देवता लोग वही हैं जो इस लोक में रहते हुए भी सत्कर्मों में, सृजनशीन विचारों में और निर्माणत्मकता में निमग्न रहते हैं। ऐसे लोग संसार के किसी भी कोने में हो सकते है। प्रत्येक सम्प्रदाय में हो सकते हैं। लेकिन भारत के प्राचीन आर्य-समाज में ऐसे दिव्य पुरूषों की बहुलता थी इसीलिए भारत को देवनिर्मित देश कहा गया है। यह देव निर्मित देश इसलिए था कि यहाँ पर सन्तान का आदर्श होता था :-
‘‘अनुव्रत: पितु: पुत्रो मात्रा भवतु सम्मना:’’
अर्थात् पुत्र पिता के व्रत का पालन करने वाला हो और माता के मन की इच्छाएँ पूरी करने वाला हो। ऐसी सुसंस्कृति से ही देव संस्कृति का निर्माण होता है। पिता कोई भी ऐसा नहीं होता कि जो अपने पुत्र से ऊँची अपेक्षाएँ नहीं रखता।
हर एक पिता अपने पुत्र से मानव समाज में मानवता को स्थापित कर उच्चादर्श स्थापित करने और उसके यशस्वी, ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी एवं वर्चस्वी होने की अपेक्षा करता है। पिता का यही व्रत है। पुत्र को चाहिए कि वह पिता के व्रत का अनुगामी हो। इसी प्रकार पुत्र के लिए अपेक्षित है कि वह माँ के समान मन वाला हो। माता के हृदय में और मन में सदा प्रेम, स्नेह, ममता और वात्सल्य का सागर लहराता रहता है। माँ के इन गुणों को हम अपने जीवन में संस्कार रूप में ढाल लें तो हमारे हृदय की कठोरता सरलता में, ज्ञान की स्थूलता सूक्ष्मता में और दृष्टि की ससीमता असीमता में परिवर्तित हो जाएगी। माँ हमारे हृदय में आध्यात्मिकता का और उच्चता का आदर्श स्थापित करती हैं तो पिता भौतिक उन्नति का। इन दोनों विचारधाराओं के समुचित समन्वय से उन्नत समाज का निर्माण होता है। जब स्त्राी से वेदपठन पाठन का अध्किार छीन लिया गया तो आध्यात्मिक विचारों से वह पतित हो गयी। जिसका प्रभाव समाज में यह पड़ा कि आध्यात्मिकता से हीन या आध्यात्मिकता के नाम पर धर्म आडम्बरों में अटके और भटके भारतीय समाज का निर्माण हुआ। क्योंकि सन्तति की समुन्नति का एक स्त्रोत सूख गया। फ लस्वरूप हमारा यह आदर्श कि: ‘मां भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा’ अर्थात भाई से भाई द्वेष न करे और बहन से बहन द्वेष न करे’ कहीं विलुप्त हो गया। यह देव संस्कृति के लक्षण थे। दुर्भाग्य से यह आदर्श आज तक विलुप्त है। क्योंकि आज अधिकांश नारी पढ-लिखकर भी भारतीय आध्यात्मिक विचारधारा के प्रति आकर्षित नहीं हैं। वह निरे भौतिकवादी दृष्टिकोण से जी रही हैं यद्यपि उनके मन में नारी सुलभ कुछ बातें उपलब्ध् हैं, किन्तु मन में भौतिकवादी विचार भरे पड़े हैं। जिसका प्रभाव सन्तति पर पड़ रहा है।
इस प्रकार पिता के व्रत और माता के मन के संकल्प एक ही भौतिकवादी धरातल पर जाकर टिक रहे हैं। जिससे हम समता मूलक समाज की सरंचना के संकल्प को पूर्ण करने में सफ ल नहीं हो सके हैं। समाज की उन्नतावस्था के निर्माण के लिए पिता का उन्नत ज्ञान-विज्ञान उसका अध्यात्म मिश्रित भौतिकवादी दृष्टिकोण तथा माता का भौतिकवाद मिश्रित अध्यात्मवादी स्वरूप ही सहायक होता है। इसलिए उन्हें चाहिए कि युवा वर्ग को उचित दिशा देने के लिए अपने भीतर झाँककर देखें कि हमने अपने भीतर कौन-कौन सी पूँजी संचित की है जिसे हम संस्कार सम्पत्ति के रूप में अपनी सन्तति को परोस रहे हैं। बाल्मीकि रामायण ;बाल कांड में रामचन्द्र जी के लिए आया है वे राम जीवलोक के रक्षक हैं, धर्म का पालन करने वाले हैं, वेद वेदांग के तत्व को जानने वाले हैं धनुर्वेद में पारंगत हैं, सब शास्त्रों के अर्थों के मर्मज्ञ हैं, स्मृतिशाली और प्रतिभाशाली हैं, लोगों में प्रिय है, साधु स्वभाव हैं, अपनी आत्मा में कभी दीनता का समावेश नहीं होने देते, कार्यकुशल हैं, जिस प्रकार नदियाँ समुद्र के पास जाती है, उसी प्रकार वे सज्जनों के लिए सदा सुलभ हैं, वे आर्य हैं, सब पर समदृष्टि रखते है, सदा प्रसन्न वदन रहते हैं, गम्भीरता में समुद्र के समान और धैर्य में हिमालय के समान है, कौशल्या के आनन्द को बढ़ाने वाले श्री राम सभी प्रकार गुणों से समन्वित हैं।’’ कहते है कि माता कौशल्या ने राम जब उनके गर्भ में थे, तो गुरू वशिष्ठ के आश्रम में रहकर आध्यात्मिक वातावरण में स्वयं को रंगा और शुद्घ सात्विक भोजन लेकर ईश्वर-आराधना में समय व्यतीत किया। उनके मन के इस गहरे संस्कार का प्रभाव बालक राम पर पड़ा जिन्होंने जीवन भर मर्यादा और धर्म का पालन किया। आज की माँ राम की पूजा करने से पूर्व तनिक माँ कौशल्या की पूजा करना सीखें। उसके गुणों पर विचार करे और तब देखे कि क्या वह स्वयं भी किन्हीं अंशों में माता कौशल्या है या नहीं? हमने राम की पूजा करने से पूर्व उनके निर्माण में माता कौशल्या के योगदान को विस्मृत कर दिया। जिसका अभिशाप हमें भी भुगतना पड़ रहा है।
मां हमारे जीवन की हर सांस में एक आस बनकर हमेशा हमारे साथ रहती है, मां एक अहसास है-जिसे हम जीवन भर गहराई से अनुभव करते रहते हैं, मां के एक खुशबू है जो हमेशा हमारे जीवन में सर्वत्र बिखरी रहती है, मां स्वयं एक संस्था है जो हमारा निर्माण करती है, मां एक संघर्ष है-जो हमारे लिए प्रत्येक प्रकार के अभाव से लड़ती है, मां का जीवन ज्ञान की अनंत गहराईयों से भरा हुआ है-जिसे कोई माप नही सकता, मां हमारे लिए एक मोमबत्ती है-जो हमारे जीवन में प्रकाश भरने के लिए स्वयं जल जाती है, मां की यादें हमारे लिए अनमोल निधि हैं-जो जीवन भर हमारा मार्गदर्शन करती हैं, मां के सामने संसार की कोई भी वस्तु टिक नही सकती।

मां के गुणों का बखान किया जाना संभव नही-अपनी पूज्यनीया मां स्व. श्रीमती सत्यवती आर्या जी को उनकी 90वीं जयंती 8 अक्टूबर 2015 के अवसर पर इन्हीं भावों के साथ विनम्र श्रद्घांजलि अर्पित करते हैं और इस लेख को प्रत्येक मां के लिए और प्रत्येक पुत्र के लिए विनम्रता के साथ समर्पित करते हैं।

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betnano
Hititbet Giriş
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet
betgaranti giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betgaranti giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
xslot giriş
xslot giriş
sahabet
sahabet
hititbet
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano