भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी

शिव कुमार गोयल

आज आदरणीय शिवकुमार गोयल जी हमारे बीच नही हैं, पर उनके विचार हमारे बीच जरूर हैं। उनका गंभीर और राष्ट्रवादी लेखन आजीवन हमारा मार्गदर्शन करेगा।  31 अक्टूबर उनकी जयंती होती है, इस अवसर पर उन्हीं की पुस्तक ‘क्रांतिकारी आंदोलन’ से प्रस्तुत है उनका यह आलेख। बाबूजी को श्रद्घांजलि के साथ-श्रीनिवास आर्य

अंग्रेजों ने व्यापार के नाम पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के माध्यम से भारत पर अपना साम्राज्य स्थापित करने के बाद बर्बरता और निर्ममता से जिस प्रकार भारत का आर्थिक शोषण किया उससे पूरा देश त्राहि-त्राहि कर उठा था। आर्थिक शोषण के साथ-साथ गोरे शासक भारतीय जनता पर अमानवीय जुल्म ढाने में भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने भारतीय संस्कृति तथा देश की परंपराओं पर आघात पहुंचाने के लिए ईसाई मिशनरियों को पूरी छूट दी थी।

Src;- Wikipedia

ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने हिन्दुओं और मुसलमानों को नौकरियों व धन का लालच देकर ईसाई बनाने की योजना बनानी शुरू कर दी थी। सन् 1850 तक पूरे भारत में लगभग 300 चर्च बनाकर एक हजार पादरियों को हिन्दू-मुसलमानों के धर्मान्तरण का कार्य सौंप दिया गया था। अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी तथा सैन्य अधिकारी तक ईसाईकरण के काम में लग गये थे। मेजर एडवर्ड ने अपनी डायरी में लिखा था-‘भारत पर हमारा अधिकार का एक उद्देश्य देश को ईसाई बनाना है। अंग्रेजी शिक्षा का माध्यम बनाकर हम ईसाईकरण के काम को अंजाम देंगे।’ ईसाई पादरी सेना की छावनियों में पहुँचकर हिन्दुस्तानी सिपाहियों से धर्मपरिवर्तन कर ईसाई बनने का आग्रह करते थे। उन्हें पदोन्नति व वेतनवृद्धि का लालच भी दिया जाता था।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने मंदिरों और मस्जिदों की सम्पत्ति पर कर लगा दिया। चाहे जिसकी भूमि अर्जित कर चर्च व ईसाई स्कूल बनाये जाने लगे।

इसी बीच भारतीय परम्परा को ठुकराकर कानून बना दिया गया कि गोद लिए हुए बच्चे को पैतृक सम्पत्ति में अधिकार नहीं मिलेगा। अनेक भारतीय राजाओं, नवाबों व विधवा रानियों को उनके अधिकारों से वंचित करना शुरु कर दिया गया।…

उपरोक्त कदमों से अंदर ही अंदर सभी भारतीयों के हृदय में विद्रोह पनपने लगा। धर्म को सर्वस्व मानने वाले भारतीयों को लगा कि विदेशी विधर्मी अंग्रेज उनके धर्म तथा उनके देश को मटियामेट करने पर उतारू हैं।

1856 के प्रारंभ में ही स्वधर्म व स्वदेश की भावना से प्रेरित होकर विदेशी विधर्मी अंग्रेजों के शासन को उखाड़ फेंकने की योजना बननी शुरू हो गयी थी। श्रीमंत नानासाहब पेशवा तथा अजीमुल्लाखान ने गुप्त रूप से राजे रजवाड़ों व सेना के राष्ट्रभक्त भारतीय सिपाहियों के पास गुप्त संदेश भेजने शुरू कर दिये थे। अत्यंत सुनियोजित ढंग से साधु संन्यासियों पंडितों व मुल्ला मौलवियों को संदेश वाहक बनाया गया। बिठूर में विशेष रूप से स्वदंश की पुन: स्थापना का स्वप्न देखने वाले राष्ट्रभक्त अत्यंत गुप्त रूप से सक्रिय थे।

जनवरी 1857 में प्रसारित गुप्त घोषणा पत्र में कहा गया था-हे देशबंधुओ और धर्मनिष्ठों उठो। काफिर अंग्रेजों को अपने देश में भगा देने के लिए सब मिलकर उठ खड़े हो। इन अंग्रेजों ने न्याय के सारे सिद्घांत मटियामेट कर दिये हैं। इन्होंने हमारा स्वराज्य हड़प लिया है। अंग्रेजों की इन भयानक यातनाओं से अपने हिन्दुस्तान को मुक्त कराने के लिए केवल एक ही उपाय शेष रह गया है और वह उपाय है सशस्त्र युद्घ करना। ऐसे युद्घ में जो खेत रहेंगे वे देश के शहीद होंगे। जो स्वदेश एवं स्वधर्म के लिए लड़ेंगे-मरेंगे उन राष्ट्रभक्त शहीदों के लिए स्वर्ग के द्वार खुले मिलेंगे। जो देशद्रोही अधम इन विदेशी विधर्मी अंग्रेजों का साथ देंगे उनके लिए नरक के द्वार खुले होंगे।

वीर सावरकर लिखित 1857 का स्वातंत्रय समर ग्रंथ से

स्वधर्म व स्वदेश के संदेश वाहक कमल पुष्प लेकर सैनिक छावनियों में जाते थे। कमल पुष्प व चपाती हिन्दुस्तानी सेना के अफसर व सैनिकों को थमाते तो वे समझ जाते थे किअपने ही स्वदेश बंधु हैं जो गुप्त संदेश देने निकले हैं। अत्यंत गुप्त रूप से हुई बैठक में पूरे देश में एक साथ क्रांति का बिगुल बजाने के लिए 31 मई 1857 का दिन नियत कर लिया गया था। गुप्त रूप से व्यापक तैयारियां की जाने लगीं। किंतु अचानक बैरकपुर की छावनी का एक राष्ट्रभक्त सिपाही मंगल पाण्डे अपनी धर्म व स्वदेश प्रेम की भावनाओं पर आघात सहन नही कर पाया। समय से पूर्व ही हुए इस विस्फोट ने पूरी योजना को धराशाही कर दिया।

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