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गौ और गोवंश

गोहत्या पर यह कैसी राजनीति ?

डॉ.वेदप्रताप वैदिक

गोमांस खाने के शक को लेकर मोहम्मद इखलाक की जो हत्या हुई है, उसकी भत्र्सना पूरे देश ने की है लेकिन फिर भी क्या कारण है कि इस मुद्दे पर देश में बेहद कटु और ओछी बहस चल पड़ी है? सिर्फ नेताओं ही नहीं, बुद्धिजीवियों में भी आरोपों-प्रत्यारोपों की बाढ़-सी आ गई है। कुछ साहित्यकारों ने अपने पुरस्कार लौटा दिए हैं। इस बात की किसी को चिंता नहीं है कि सारी दुनिया में इस एक दुर्घटना से भारत की छवि कितनी विकृत हो रही है।

जहां तक साहित्यकारों द्वारा साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने का प्रश्न है, उसका औचित्य मेरी समझ में नहीं आया। क्या साहित्य अकादमी ने इखलाक की हत्या करवाई थी? या उसके द्वारा प्रकाशित किसी पुस्तक को पढक़र उसके गांव वालों ने इखलाक की हत्या की थी? साहित्य अकादमी और इखलाक का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। लेखकों का यह तर्क भी किसी के पल्ले नहीं पड़ा कि प्रधानमंत्री ने उस दुर्घटना पर कोई बयान नहीं दिया, इससे नाराज होकर उन्होंने पुरस्कार लौटा दिए। क्या प्रधानमंत्री साहित्य अकादमी का अध्यक्ष होता है? अकादमी स्वायत्त संस्था है। यदि वह प्रधानमंत्री या सरकार के इशारों पर काम करती है तो ऐसी अकादमी से पुरस्कार लेना ही कौन-से सम्मान की बात है? जहां तक प्रधानमंत्री के बयान देने या न देने का सवाल है, यह उनकी मर्जी है। इस मसले पर आपके इस्तीफों की तुक क्या है? प्रधानमंत्री तो सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे के मामले में भी ‘मौनी बाबा’ बने रहे। तब किसी ने पुरस्कार क्यों नहीं लौटाए? जब दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी जैसे साहित्यकारों और विचारकों की शर्मनाक हत्या हुई, तब भी पुरस्कार लौटाने वालों का अंतकरण कुंभकर्ण क्यों बना रहा? सिर्फ उदयप्रकाश ने ही अपने हमसफरों के साथ हमदर्दी दिखाई।

अब प्रधानमंत्री ने बयान दे दिया है, ऐसा दावा अखबार और सारे टीवी चैनल (मूरख बक्से) कर रहे हैं। क्या बयान दिया है, मोदी ने इखलाक और बिसहड़ा के बारे में उन्होंने एक शब्द भी नहीं बोला। बस राष्ट्रपति के बयान की प्रशंसा कर दी है। सांप्रदायिक सद्?भाव की घिसी-पिटी बात फिर दोहरा दी है। उन्होंने राजनाथ सिंह और अरुण जेटली की तरह भी कुछ नहीं कहा है। अब पुरस्कार लौटाने वाले क्या करेंगे? क्या वे प्रधानमंत्री को उनके बयान का मसविदा बनाकर भेजेंगे? मैं पूछता हूं कि हमारे नेताओं के बयानों का महत्व क्या है? वे कौन-सी अकल या साहस की बात कहने की क्षमता रखते हैं? इखलाक की हत्या, गोमांस भक्षण और सांप्रदायिक सद्भाव पर वे कौन-सी मौलिक बात कह रहे हैं? यदि मोदी सचमुच दादरी-कांड पर कोई बयान दे भी देते तो क्या हो जाता? जो लोग गोमांस या मांस खाते हैं, क्या उनके कहने से वे शाकाहारी हो जाते? या जो लोग गोहत्या के बदले मानव-हत्या करने पर उतारू हो जाते हैं, वे अपने आचरण को सुधारने के लिए तैयार हो जाते? नेताओं में आज नैतिक बल लगभग शून्य हो गया है। राजनीतिक लोगों में राजबल तो है, नैतिक बल नहीं। इस नैतिक बल का प्रयोग साधु-संत, समाज-सुधारक, लेखक, कवि और विचारक तो कर सकते हैं, लेकिन इसकी उम्मीद नेताओं से करना वैसा ही है जैसा रेत में नाव चलाना।

इस दुर्घटना को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश किस नेता ने नहीं की है? कौन-कौन इखलाक के घर नहीं हो आया है, लेकिन असली नैतिक साहस का परिचय तो उसी गांव के लोगों ने दिया है। इखलाक पर हमले की जब तैयारी हो रही थी तो उनके तीन हिंदू नौजवान पड़ोसियों ने 70 मुसलमानों को रातोरात गांव से निकाला। वे रात को दो बजे तक उन लोगों को गांव का तालाब पार करवाते रहे। मुसलमान बच्चों को अपने कंधों पर बिठाकर उन्होंने तालाब पार करवाया। इखलाक के छोटे बेटे ने कहा हम अब दिल्ली या चेन्नई में रहेंगे तो पूरा गांव उमड़ आया।

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