लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के त्याग और देशभक्ति का पुनर्मूल्यांकन

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आज(23 जुलाई) लोकमान्य बालगंगाधर तिलक जी का जन्म दिन है. मुझे यह जानकार दुःख हुआ कि अम्बेडकरवादी लगातार अपने लेखों में तिलक जी के लिए अत्यन्त अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर रहे हैं. उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं कि माँ भारती के इस सपूत ने कितना बड़ा कार्य किया था.


आज अपनी ओर से कुछ भी ना लिखकर अन्य महापुरुषों के उदगार दे रहा हूँ. भारत के महनायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अपने मित्र केलकर को एक पत्र लिखा था. उस पात्र में तिलक जी के बारे में नेता जी के विचार पढ़े.—
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का पत्र
प्रिय श्री केलकर,
मै पिछले कई महीनों से आपकों पत्र लिखने की सोच रहा था. जिसका कारण केवल यह रहा हैं, कि आप तक ऐसी जानकारी पंहुचा दू, जिसमे आपकों दिल्सस्पी होगी. मै नही जानता आपकों मालूम हैं या नही कि मै यहाँ गत जनवरी से कारावास में हु, जब बरहमपुर जेल से मुझे मांडले जेल के लिए स्थान्तरित करने का आदेश मिला , तब मुझे यह स्मरण नही आया कि लोकमान्य तिलक ने अपने कारावास का अधिकतर समय मांडले जेल में ही गुजारा था. इस चार दिवारी में, यहाँ के बहुत हतोत्साहित कर देने वाले परिवेश में, स्वर्गीय लोकमान्य तिलक ने अपने सुप्रसिद्ध ‘गीता भाष्य ग्रन्थ’ लिखा था. जिसने मेरी नम्र राय में उन्हें शंकर और रामानुजन जैसे प्रकांड भाष्यकारो की श्रेणी में स्थापित कर दिया हैं.
जेल के जिस वार्ड में लोकमान्य तिलक रहते थे वह आज तक सुरक्षित हैं,यधपि उसमे फेरबदल किया गया हैं और उसे बड़ा बनाया गया हैं. हमारे अपने जेल वार्ड की तरह, वह लकड़ी के तख्तो से बना हुआ हैं. जिससे गर्मी में लू और धुप से, वर्षा में पानी से, शीत में सर्दी तथा सभी मौसम में धूलभरी आधियो से बचाव नही हो पाता था. मेरे यहाँ पहुचने के कुछ ही क्षण बाद मुझे वार्ड का परिचय दिया गया. मुझे यह बात बहुत अच्छी नही लग रही थी. कि मुझे भारत से निष्काषित किया था, लेकिन मेने भगवान् को धन्यवाद दिया कि मांडले में अपनी मातृभूमि और स्वदेश से बलात अनुपस्थति के बावजूद मुझे पवित्र स्मर्तिया राहत व प्रेरणा देगी. अन्य जेलों की तरह यह भी एक ऐसा तीर्थ स्थल हैं, जहाँ भारत का एक महानतम सपूत छ वर्षो तक रहा था.
हम जानते हैं,कि लोकमान्य ने कारावास में छ वर्ष बिताए हैं. मुझे विशवास हैं कि बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि उस अवधि में उन्हें किस हद तक शारीरिक और मानसिक यातनाओ से गुजरना पड़ा था. वे वहां एकदम अकेले रहे उन्हें उनके बौदिक स्तर का कोई साथी नही मिला था. मुझे विशवास हैं, कि उनको किसी अन्य बंदी से भी मिलने-जुलने नही दिया था. उनको सात्वना देने वाली एकमात्र वस्तु किताबे थी. और वे एक कमरे में बिलकुल एकांकी रहते थे. यहाँ रहते हुए उन्हें दो या तीन से अधिक मुलाकात का भी अवसर नही दिया गया था. ये भेट भी जेल और पुलिस अधिकारियो के साथ हुआ करती थी.
जिससे वे कभी खुलकर हार्दिकता से बात नही कर पाए होंगे. उन तक कोई भी अखबार नही पहुचने दिया जाता था. उनकी जैसी प्रतिष्ट स्थति वाले नेता को बहरी दुनिया के घटनाच्रको से एकदम अलग कर देना ,अक तरह की यंत्रणा ही है और इस यंत्रणा को जिसमे भुगता है, वहीं जान सकता है इसके अलावा उनके कारावास की अधिकाश अवधि में देश का राजनैतिक जीवन मंद गति से खिसक रहा था और इस विचार ने उन्हे कोई संतोष नही दिया होगा कि जिस उद्द्देश्य को उन्होंने अपनाया था ,वह उनकी आनुपस्थिति में किस गति से आगे बढ़ रहा है उनकी शारीरिक यंत्रणा के बारे में जितना ही कम कहा जाए, बेहतर होगा
वे दंड सहिंता के अंतग्रत बंदी थे और इस प्रकार आज के राजबंदियो की अपेक्षा कुछ मायनो में उनकी दिनचर्या कही अधिक कठोर रही होगी|इसके अलावा उन्हे मधुमेह की बीमारी थी |जब लोकमान्य यहाँ थे ,माँडले का मौसम तब भी प्राय ऐसा रहा होगा जैसा वह आजकल है और अगर आज नौजवानों को शिकायत है कि वहां की जलवायु शिथिल कर देने वाली और मन्दाग्नि तथा गठिया को जन्म देने वाली है और धीरे -धीरे वह व्यकित की जीवन शक्ति को सोख लेती है ,
लोकमान्य ने ,जो वयोवृदध थे ,कितना कस्ट झोला होगा |लेकिन इस कारागार की चहारदीवारियों में उन्होंने क्या यातनाए सही ,इसके विषय में लोगों को बहुत कम जानकारी है |
कितने लोगों को पता होता है,उन अनेक छोटी -छोटी बातों का ,जो किसी बंदी के जीवन में सुइयों की-सी चुभन बन जाती है और जीवन को दूभर बना देती है| वे गीता की भावना में मग्न रहते थे और शायद इसलिए दू;ख और यंत्रणाओं से ऊपर रहते थे |यहीं कारण है कि उन्होंने उन यंत्रणाओ के बारे में किसी से कभी एक शब्द भी नहीं कहा |समय -समय पर मै इस सोच में डूबता रहा हू कि कैसे लोकमान्य को अपने बहुमूल्य जीवन के छह लंबे वर्ष इन परीस्थातियो में बिताने के लिए विवश होना पड़ा था |
हर बार मैंने अपने आपसे पूछा ‘अगर नौजवानों को इतना कष्ट महसूस होता है तो महान लोकमान्य को अपने समय में कितनी पीड़ा सहनी पड़ी होगी ,जिसके विषय में उनके देशवासियों को कुछ भी पता नही रहा होगा यह विश्व भगवान की कृति है ,
लेकिन जेले मानव के कृतित्व की निशानी हैं. उनकी अपनी एकअलग दुनियाँ हैं और सभ्य समाज ने जिन विचारो और संस्कारो को प्रतिबद्ध होकर स्वीकार किया हैं. वे जेलों पर लागू नही होते हैं. अपनी आत्मा के हास्य के बिना,बंदी जीवन के प्रति अपने आपको अनुकूल बना पाना आसान नही हैं, इसके लिए हमे पिछली आदते छोड़नी होती हैं और फिर भी स्वास्थ्य और स्फूर्ति बनाएं रखनी हैं सभी नियमों के आगे नत होना होता हैं और फिर भी आंतरिक प्रफुल्लता अक्षुण्ण रखनी होती हैं. केवल लोकमान्य जैसा दार्शनिक ही, उस यन्त्रणा और दासता के बिच मानसिक संतुलन बनाए रख सकता था और भाष्य जैसे विशाल एवं युग निर्माणकारी ग्रन्थ का प्रणयन कर सकता था.मै जितना ही इस विषय पर चिन्तन करता हु उतना ही उनके प्रति आस्था और श्रद्धा में डूब जाता हु. आशा करता हु, कि मेरे देशवासी लोकमान्य की महत्ता को आंकते हुए इन सभी तथ्यों को भी द्रष्टि पथ में रखेगे.
जो महापुरुष मधुमेह से पीड़ित होने के बावजूद इतने सुदीर्घ कारावास को झेलता गया. और जिसने उन अन्धकार मय दिनों में अपनी मातृभूमि के लिए ऐसी अमूल्य भेट तैयार की, उसे विश्व के महापुरुषो की श्रेणी में प्रथम पक्ति में स्थान मिलना चाहिए. लेकिन लोकमान्य ने प्रक्रति के जिन अटल नियमों से अपने बंदी जीवन के दौरान टक्कर ली थी. उनको अपना बदला लेना ही था. अगर मै कहू तो मेरा विश्वास हैं कि लोकमान्य ने जब मांडले को अंतिम नमस्कार किया था
तो उनके जीवन के दिन गिने चुने ही रह गये थे. निसंदेह यह एक गंभीर दुःख का विषय हैं कि हम अपने महानतम पुरुषो को इस प्रकार खोते रहे, लेकिन मै यह भी सोचता हू कि क्या वह दुखद दुर्भाग्य किसी न किसी प्रकार टाला नही जा सकता था.

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