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आत्मज्ञानी है वही,
आत्मरमण करे रोज।
स्थित आत्मस्वरूप में ,
करे ब्रह्म की खोज॥1474॥

व्याख्या:- पाठकों को यह बताना अपेक्षित रहेगा कि यह मरण-धर्मा शरीर उस अमृत रूप अशरीर आत्मा का अधिष्ठान है,उसके रहने का स्थान है।आत्मा स्वभाव से अशरीर है,परन्तु जब तक इस शरीर के साथ अपने को एक समझ कर रहता है तब तक उसे भी सुख-दु:ख लगा ही रहता है किन्तु जब वह अशरीर रूप में जाता है,तो उसे सुख-दु:ख छू भी नहीं सकेंगे।इसके अतिरिक्त जिसे इस बात का प्रतिबोध हो जाता है कि शरीर,मन,बुद्धि,चित्त,अहंकार में नहीं हुँ।मैं आत्मा हूँ।नित्य,शुद्ध, बुद्ध,मुक्त मेरा स्वभाव है,जो हृदयाकाश में निवास करने वाला आत्मा है,वह जीर्ण नहीं होता, न शरीर के साथ उसका नाश होता है,यह पापों से अलग है, ज़रा और मृत्यु से छूटा हुआ है, यह अज़र है, अमर है,अनादि है।इसमें ईश्वरीय गुण विद्यमान है, जैसे -गन्ने के चाहे पचास टुकड़े करो, फिर भी प्रत्येक टुकड़े में मिठास विद्यमान रहती है,ठीक इसी प्रकार प्रत्येक साधक के मानस में देवीय-गुण विद्यमान होते हैं, आवश्यकता इन्हें निखारने की है। जो इस रहस्य को आत्मसात कर लेता है,उसके अन्तःकरण की मलिनता दूर हो जाती है।उसके आचरण में ईश्वरीय गुण भासने लगते हैं।शनै: शनैः वह अपने अशरीर रूप को प्राप्त होने लगता है।उसका तादात्म्य परमात्मा से हो जाता है, ऐसा साधक,नाम से लेकर भूमा तक के सारे सोपानों के रहस्य को जान जाता है।
इसके बाद आत्मा में स: और अहं का अर्थात् ‘वह’ और ‘मैं’ का भेद मिट जाता है।ऐसा साधक आत्मा में खेलने लगता है, आत्मा के साथ जुड़ जाता है, आत्मानन्द अर्थात् आत्मा में ब्रह्म के आनन्द – रस का भोक्ता हो जाता है , वह ‘स्वराट’ हो जाता है अर्थात् अपने शासन वाला (प्रकृति के शासन से मुक्त) अथवा स्वयं-ज्योति हो जाता है। अपने भीतर के प्रकाश से चमक उठता है।इस अवस्था को प्राप्त करने वाला साधक ही आत्मज्ञानी कहलाता है।वह अपने आत्मस्वरूप को अक्षुण्ण रखने के लिए अपनी आत्मा को रोज पवित्र रखता है,सभी प्रकार के मनोविकारों से वह दूर रहता है। वह अपने सत्यस्वरूप को सूक्ष्मता से जानता है, जैसे क्रोध करना मेरा स्वरूप नहीं है। मेरा स्वरूप तो शांति,प्रेम,प्रसन्नता, (आनन्द) है।इसलिए वह हर समय अपने आत्मस्वरूप में अवस्थित रहता है। इतना ही नहीं आत्मज्ञानी नित्य निरंतर ‘ब्रह्म’ की खोज में रत रहता है। इसलिए वह रोजाना आत्मरमण करता है।ऐसे साधक के जीवन में वह क्षण भी आता है,जब वह ब्रह्मनिष्ठ कहलाता है अर्थात् ब्रह्मवेत्ता अथवा ब्रह्मज्ञानी कहलाता है।

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