आइए जानें पुनर्जन्म के बारे में

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पुनर्जन्म

-सहदेव समर्पित

1 सृष्टि के जड़ पदार्थों में भी पुनर्जन्म है। यथा- पानी गर्म होकर भाप बन जाता है। वह ऊपर जाकर बादल के रूप में बरसता हुआ पुनः पृथ्वी पर आ जाता है। अधिक शीतलता पाकर वही बर्फ का रूप ले लेता है। अर्थात् सृष्टि के आरम्भ से अब तक पानी की एक बूंद भी कम नहीं हुई है। वैज्ञानिकों का कथन है कि कोई भी पदार्थ नष्ट नहीं होता, केवल स्वरूप बदल जाता है।
2 प्राणी का किसी भी योनी में जन्म लेने का आधार क्या है? क्योंकि सूअर, पशु, कीड़ा आदि कोई भी प्राणी स्वेच्छा से नहीं बनता। अर्थात् कोई अन्य सत्ता उसे ऐसा बनाती है। अन्य सत्ता भी स्वेच्छा से नहीं बनाती है, इसमें निश्चित रूप से आत्मा के पूर्वजन्म कृत कर्म ही कारण बनते हैं। क्योंकि बिना कारण कार्य नहीं होता।
3 पैदा होते ही प्राणी अपनी योग्यता के अनुसार क्रिया करता है। वह निश्चित रूप से उसके पूर्व अभ्यास का परिणाम है,क्योंकि इस जन्म में तो उसे किसी ने सिखाया नहीं होता। जैसे मनुष्य या पशु का बच्चा माँ के स्तन से दूद्द चूसता है।
4 प्रत्येक प्राणी मृत्यु से सदा भयभीत रहता है। इसका कारण यह है कि मृत्यु उसका अनुभूत विषय है। वह मृत्यु के समय होने वाली पीड़ा को अनुभव कर चुका है। तभी तो वह उससे बचना चाहता है।
5 कर्मफल भोगने के लिए पुनर्जन्म आवश्यक है। जैसे किसी व्यक्ति ने कुछ लोगों की हत्या कर दी और इसके कुछ समय बाद वह मर गया। ऐसी अवस्था में न्यायालय तो उसे दण्ड नहीं दे सका। तो उसे दण्ड कैसे मिलेगा। निश्चित रूप से पुनर्जन्म होगा।
6 यदि यह कहें कि यह जन्म तो ईश्वर ने स्वेच्छा से दिया है तो किसी को सुख और किसी को दुःख क्यों दिए हैं। यदि कोई कहे कि परीक्षा करने के लिए दिए हैं, तो ईश्वर अज्ञानी ठहरता है, क्योंकि परीक्षा की आवश्यकता उसको होती है जिसको पता न हो। ईश्वर अन्यायकारी भी ठहरता है क्योंकि किसी की परीक्षा ली, किसी की नहीं।
7 यदि यह भी मान लिया जाए और यह भी कि वह कर्मों के फल कयामत के दिन देता है तो यह भी अन्याय है कि अधिकतम 100 वर्षों का जीवन और सजा अनन्त काल तक! और न्याय के लिए अनिश्चित काल तक प्रतीक्षा!
8 पं0 रामचन्द्र देहलवी का तर्क- जब कयामत के दिन न्याय के दिन सभी मनुष्य उठ खड़े होंगे तो उनको दूसरा शरीर मिलता है या यही? उत्तर दिया गया- दूसरा। क्योंकि यह शरीर तो कहा नहीं जा सकता। यह तो मिट्टी और कीड़े खा गए। यदि दूसरा शरीर मिलता है तो पुनर्जन्म से क्यों इन्कार करते हो? यही तो पुनर्जन्म है कि आत्मा को दूसरा शरीर प्राप्त होना।
9 वस्तुतः आत्मा को अनादि न मानना ऐसा ही है जैसे एक झूठ छुपाने के लिए हजार झूठ बोलना। जो अनादि नहीं है वह अनन्त भी नहीं हो सकता। कयामत के दिन सबका न्याय करके सबको बहिश्त या दोजख में भेजकर खुदा क्या करेगा? और यह दुनिया बनाने से पहले क्या कर रहा था?
10 वैदिक सिद्धान्त के अनुसार तीन सत्ताएँ अनादि हैं- ईश्वर जीव और प्रकृति। जीव बार बार जन्म लेता है। परमात्मा शरीर धारण नहीं करता। यही सत्य है।
(शांतिधर्मी में प्रकाशित)

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