आर्कटिक क्षेत्र का बेकाबू होता पर्यावरण

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चंद्रभूषण

पृथ्वी के पर्यावरण को लेकर सबसे बड़े प्रयोग की शुरुआती रिपोर्ट आ गई है। सितंबर 2019 से अक्टूबर 2020 तक कुल 389 दिन आर्कटिक महासागर में उत्तरी ध्रुव के इर्दगिर्द रहकर तैयार की गई इस रिपोर्ट का आकार इतना बड़ा है कि इसके सारे निष्कर्ष सामने आने में कई साल लगेंगे। लेकिन इसे संपन्न करने वाली 300 से ज्यादा लोगों की टीम के नेता, जर्मन वैज्ञानिक मार्कस रेक्स ने बीते 15 जून को बर्लिन में स्लाइड शो और विडियो के साथ अपने प्रयोग का एक मोटा खाका पेश कर दिया है। उन्होंने बताया कि आर्कटिक क्षेत्र का पर्यावरण संकट बेकाबू हो गया है।

छोटा हुआ आर्कटिक सर्कल

आर्कटिक महासागर के अधिकतम जमाव का दायरा बीती एक सदी में और उसकी बर्फ की मोटाई पिछले तीन दशकों में ही आधी हो जाने का सबूत देते हुए डॉ. रेक्स ने यह भी कहा कि सन 2050 तक अगर धरती पर कार्बन उत्सर्जन को शून्य तक न लाया जा सका तो अगली पीढ़ी को बिना बर्फ का आर्कटिक देखना पड़ेगा। ध्रुवीय इलाकों से कोई वास्ता न रखने वाले हम जैसे लोगों के लिए इस बात का क्या मतलब है, इस पर आगे चर्चा होगी। फिलहाल साढ़े 16 करोड़ डॉलर लगाकर चलाई गई बीस देशों के वैज्ञानिकों की इस मुहिम पर वापस लौटें तो इसमें पोलरस्टर्न नाम के एक आइसब्रेकर जहाज का इस्तेमाल किया गया, जिसे मदद पहुंचाने के लिए बीच-बीच में कुछ रूसी जहाज आते-जाते रहे।

इस काम के लिए शुरू में जो जगह सोची गई थी, वहां बर्फ की तह बहुत पतली मिली। फिर जहाज को और आगे ले जाकर मोटी बर्फ में फंसाया गया ताकि जहाज के 40 किलोमीटर दायरे में स्थिर सतह मिल सके, जहां से हवा, बर्फ और नीचे मौजूद पानी में दिन-ब-दिन आ रहे बदलावों का रिकॉर्ड रखा जा सके। ध्यान रहे, इस अध्ययन का उद्देश्य धरती के एक कम समझे गए क्षेत्र की समझ बढ़ाने तक ही सीमित नहीं था। अब तक की जानकारी के मुताबिक पृथ्वी समूची सृष्टि का अकेला जीवधारी पिंड है। अगर हम इसे एक जिंदा चीज की तरह देखें तो आर्कटिक क्षेत्र को इसका सिर या दिमाग माना जा सकता है। दुर्भाग्यवश, पृथ्वी का पर्यावरण जिस एक इलाके में सबसे ज्यादा बिगड़ा है, वह आर्कटिक ही है।

भौगोलिक रूप से 66 डिग्री 33 मिनट की अक्षांश रेखा आर्कटिक सर्कल कहलाती है, जबकि मौसमविज्ञानी इसकी परिभाषा उस समतापी रेखा के रूप में करते हैं, जहां जुलाई में तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं जाता। यह रेखा धरती की ट्री लाइन भी है, यानी इसके उत्तर में पेड़ नहीं पाए जाते। ग्लोबल वॉर्मिंग ने इस परिभाषा का इस मायने में कबाड़ा कर दिया है कि पिछले तीन दशकों में 10 डिग्री सेल्सियस अधिकतम तापमान वाली रेखा प्रति दशक 56 किलोमीटर की रफ्तार से उत्तर की ओर खिसक रही है। यानी पर्यावरण में इंसानी दखल आर्कटिक सर्कल को दिनोंदिन छोटा करता जा रहा है।

भू-राजनीति के नजरिये से देखें तो आर्कटिक महासागर और इसे घेरे हुए अनेक समुद्रों (नॉर्वेजियन, बैरेंट्स, कारा, लैप्तेव, ईस्ट साइबेरियन, चुक्ची, ब्यूफोर्ट, बैफिन खाड़ी, डेविस खाड़ी, डेनमार्क खाड़ी और ग्रीनलैंड सागर) के अलावा स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड, रूस, अमेरिका (अलास्का), कनाडा, ग्रीनलैंड और आइसलैंड की मुख्यभूमि का बड़ा क्षेत्र तथा इनके बहुतेरे द्वीप आर्कटिक सर्कल में आते हैं।

आर्कटिक शब्द का भाषाई उद्गम यूनानी शब्द आर्कटोस (भालू) से है। सिकंदर के समकालीन यूनानी खोजी पाइथियास ने अपनी उत्तर की साहसिक यात्रा में दही जैसे समुद्र, आधी रात के सूरज और रहस्यमय रोशनियों (आरोरा बोरियालिस) का जिक्र किया है। इन वर्णनों से यह तो साफ है कि मसालिया के पाइथियास की पहुंच 325 साल ईसा पूर्व में आर्कटिक सर्कल तक हो चुकी थी। लेकिन भालू से इस इलाके के रिश्ते को लेकर दो बातें चलन में हैं। एक तो यह कि जिंदा चीज के नाम पर यहां केवल विशाल सफेद भालुओं के दर्शन हो पाते हैं, जो संसार में कहीं और नहीं पाए जाते। दूसरी शास्त्रीय थिअरी यह है कि उर्सा मेजर (सप्तर्षि) और उर्सा माइनर तारामंडल आर्कटिक सर्कल में बिल्कुल सिर पर दिखाई पड़ते हैं। ग्रीक में आर्कटोस, लैटिन में उर्सा और संस्कृत में ऋक्ष या ऋषि, तीनों का मतलब रीछ या भालू ही है।

आर्कटिक को धरती के दिमाग की तरह देखने की सूझ केवल ग्लोब में इसके ऊपर दिखने के कारण नहीं बनती। समुद्र और हवाओं की जिन तरंग गतियों से इस ग्रह के हर इलाके में बारिश का चक्र संचालित होता है, उनका स्वरूप तय करने में आर्कटिक की महत्वपूर्ण भूमिका है। समस्या यह है कि ग्लोबल वॉर्मिंग का जितना असर बाकी धरती पर दिख रहा है, उससे कहीं ज्यादा इसकी मार आर्कटिक क्षेत्र पर पड़ रही है। बाकी दुनिया का औसत तापमान अभी सन 1900 से 1 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया जा रहा है लेकिन आर्कटिक क्षेत्र में यह बढ़त 2 डिग्री की है। यहां बर्फ का दायरा घटने का मतलब है, सूरज की गर्मी को वापस लौटा देने वाले एक विशाल आईने का काला पड़ना और ग्लोबल वॉर्मिंग की रफ्तार अचानक बढ़ जाना। इसके अलावा एक दुष्चक्र बर्फ से खाली हुए समुद्रों के गर्मी सोख लेने के कारण अगले जाड़े में बर्फ और कम जमने का भी है।

ध्रुवीय भालू खत्म होंगे

इस प्रयोग के दौरान दो किलोमीटर ऊपर हवा से लेकर पूरी बर्फ पार करके नीचे के पानी तक 100 पैरामीटर्स में हर क्षण होने वाले बदलावों को पूरे साल रिकॉर्ड किया गया। साथ में बर्फ के 1000 नमूने भी लिए गए, जिनपर काम जारी है। पानी में सबसे छोटे जंतु जूप्लैंकटन और सबसे छोटी वनस्पति फाइटो प्लैंकटन, दोनों का अध्ययन किया गया, जहां से समुद्री फूड चेन शुरू होती है। यह श्रृंखला झींगों और छोटी मछलियों से होती हुई सील-वॉलरस और आर्कटिक फूड चेन में सबसे ऊपर ध्रुवीय भालुओं तक जाती है। मार्कस रेक्स और उनकी टीम का अनुमान है कि यह खाद्य श्रृंखला 2035 के बाद कभी भी टूट सकती है। इसे ध्रुवीय भालुओं का संहार कहना होगा, जिनसे पृथ्वी के इस विशाल क्षेत्र की पहचान जुड़ी है। हमारे मौसमों पर इसका प्रभाव अभी ही दिखने लगा है। इस प्रयोग से हासिल डेटा के बल पर कंप्यूटर अल्गॉरिथ्म मॉनसून के भविष्य को लेकर ज्यादा सटीक अनुमानित प्रस्तुत करेंगे।

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