चीन 2015 से कोरोनावायरस पर काम करता रहा है

कोरोना

द वीकेंड ऑस्ट्रेलियन’ ने अपनी रिपोर्ट में यह खुलासा किया है कि चीन 2015 से कोरोना वायरस पर काम कर रहा है। चीन इसे जैविक हथियार की तरह इस्तेमाल करता चाहता था..!!!

युद्ध के बदले हथियार- आज से नहीं बल्कि दशकों पहले से

युद्ध में हथियार कई किस्म के होते हैं। ज़रूरी नहीं कि बम-बारूद और गोलियों से ही हर लड़ाई जीती जा सके। कभी-कभी ऐसा होता है कि कोई देश लाख झुकाने की कोशिशों के बाद भी घुटने टेकने को तैयार ही ना हो! कुछ-कुछ वैसा ही जैसा भारत!

हज़ार वर्ष तक आक्रमण झेलने के बाद यहाँ वही होना चाहिए था जो इरान-इराक, तुर्की जैसे इलाकों में हुआ। लोगों को स्थानीय धर्म-संस्कृति का त्याग करके हमलावरों के रिलिजन-मजहब, उनकी संस्कृति को अपना लेना चाहिए था। ऐसा कुछ हुआ नहीं!

पहला मौका मिलते ही ये लोग फिर से उठ खड़े हुए और अपनी सनातन संस्कृति को यथासंभव अपना लेने की कोशिश की। कुछ ऐसा ही मामला देखना हो तो करीब 50 वर्ष पहले ये वियतनाम में भी हुआ है। करीब एक दशक तक (1961-71) अमरीकियों ने वियतनाम को सैन्य हमले के ज़रिए कुचलने की कोशिश की।

सिर्फ वही एक मुल्क नहीं था जिसने वियतनाम पर हमला किया हो, दूसरे कॉमरेड भी उनकी ही तरह हमला करते रहे थे। खैर तो हम अमेरिका पर थे। अमेरिका ने जब आक्रमण किया तो वियतनाम जैसा छोटा सा देश क्या करता?

उसके पास न तो भयावह हथियार थे, ना ही लंबी-चौड़ी सेना थी। उनके पास केवल आत्मबल था और था आक्रमणकारियों के सामने घुटने ना टेकने का साहस। उन्होंने सम्मुख युद्ध के बदले गुरिल्ला युद्धों के तरीके प्रयोग में लाये और हमलावरों को धूल चटानी शुरू कर दी।

अमेरिका के लिए खर्च लगातार बढ़ रहा था। ये सिर्फ गोला-बारूद में खर्च होने वाले पैसों का मामला नहीं था। सैनिकों के इतने शव आने लगे थे कि अमेरिकी जनता भी वियतनाम पर हमले के फैसले पर सवाल उठाने लगी थी।
आखिर ऐसा कैसे हो रहा था कि कोई पिद्दी-सा तीसरी दुनिया का देश पूरी दुनिया पर दादागिरी दिखाने वाले मुल्क के खाए-पिए मजबूत सैनिकों को मार मार कर लाशें घर भेज दे? लिहाजा अमेरिका ने अपनी युद्ध नीति बदलने का फैसला किया।

अब सीधे-सादे बंदूक-तलवारों की लड़ाई के बदले वियतनाम का सामना रासायनिक हथियारों से होने लगा। नीतियों के बदलने के पीछे अमेरिका की मंशा साफ़ थी। गुरिल्ला हमलावर जंगलों में लड़ते थे। इन जंगलों के आस-पास कोई बड़े शहर नहीं होते थे जहाँ अमेरिकी सैनिक आसानी से कब्ज़ा जमा सकें।

वहाँ टीवी जैसी चीज़ें नहीं थीं, अख़बार-रेडियो भी कम थे इसलिए अमेरिकी प्रोपगैंडा भी कम काम आता था। गुरिल्ला योद्धाओं के लिए खाने-पीने का इंतजाम आसपास के ग्रामीण इलाकों के खेतों से हो जाता था। उनके फंदे जिनमें अमेरिकी सैनिक फंसते थे, उनमें न तो बारूद होता था, ना लकड़ियाँ काटने-जुटाने में जंगल में कोई दिक्कत होती थी।

ऊपर से ऐसा जाल जंगल में छिपा देना और भी आसान था! ज़ाहिर-सी बात थी कि अगर ये जंगल और उसके आसपास के खेत ख़त्म हो जाते, तो गुरिल्ला सैनिकों को हथियार और खाना भी मिलना मुश्किल हो जाता।

रासायनिक हथियारों को इसी पर काम करना था। इसके लिए दो कीटनाशकों को मिलाकर बना “एजेंट ऑरेंज”। ये एक भयावह किस्म का ज़हर होता है जिसके असर से पेड़-पौधे करीब-करीब ख़त्म हो जाते हैं और ज़मीनें कृषि के योग्य नहीं बचतीं।

ये “एजेंट ऑरेंज” कोई पहली बार इस्तेमाल भी नहीं हो रहा था। उपनिवेशवादी इस किस्म के ज़हर का प्रयोग इससे पहले भी कर चुके थे। मलय युद्धों के समय ब्रिटिश सेना ने भी शत्रुओं पर इसी विष का प्रयोग किया था।

अक्टूबर 1962 में अमेरिकी सेना ने इस “एजेंट ब्लू” नाम के ज़हर का प्रयोग खेती पर करना शुरू कर दिया। इस वक्त तक अमेरिकी सरकार स्वीकार नहीं रही थी कि वो खेती और आम लोगों के खाने-पीने की चीज़ों पर कोई विष प्रयोग में ला रही है।

कम ऊँचाई पर उड़ने वाले सी-123 हवाई जहाज़ों और हेलीकॉप्टरों के ज़रिए इसका छिड़काव किया जाने लगा। कुल मिलाकर 80 मिलियन लीटर “एजेंट ऑरेंज” का इस्तेमाल किया गया था। इसके प्रभाव से कम से कम 20,000 स्क्वायर किलोमीटर के क्षेत्र में जंगल और हजारों स्क्वायर किलोमीटर की खेती नष्ट हो गई।

नौ वर्षों में करीब 20 प्रतिशत वियतनाम पर ज़हर छिड़का जा चुका था। अमेरिकी सरकार ने 1966 में जाकर स्वीकारना शुरू किया कि उन्होंने इस तरीके से वियतनाम की खेती और वहाँ के वनों को नष्ट किया है। संयुक्त राष्ट्र में इस बात पर बहस करने की कोशिश की गई कि अमेरिका जिनेवा समझौते का उल्लंघन कर रहा है मगर ऐसे ज्यादातर प्रस्तावों को अमेरिका ने ख़ारिज कर दिया।

मार्च 1966 में जब अमेरिका ने ऐसे विष के प्रयोग की बात स्वीकारना शुरू भी किया तो लोग मान रहे थे कि ये हाल ही में शुरू हुआ है। बाद में पता चलने लगा कि 1965 में 42 प्रतिशत ज़हर का इस्तेमाल सिर्फ खाद्यान्न की फसलों को ख़त्म कर देने के लिए इस्तेमाल किया गया था।

ये खाद्यान्न किन्हीं गुरिल्ला योद्धाओं के लिए रहे हों, ऐसा भी ज़रूरी नहीं था। कुंग नगई इलाके में सिर्फ 1970 में 85 प्रतिशत फसलों को इस तरीके से बर्बाद कर दिया गया था। ब्रिटेन ने 1969 में तर्क रखा कि अंतर्राष्ट्रीय कानूनों में कहीं ये बात स्पष्ट लिखी ही नहीं है कि खाद्यान्न-कृषि पर कीटनाशकों का प्रयोग करना प्रतिबंधित है, इसलिए इसे हथियारों से हमला माना ही नहीं जा सकता!

समस्या ये थी कि ज़हर तो ज़हर होता है। उसे शत्रु और मित्र की क्या पहचान? इस ज़हर के प्रभाव से अमेरिकी सैनिकों का जो हुआ उसके लिए 1984 में 8 मई को जिन कंपनियों ने “एजेंट ऑरेंज” बनाया था, उन्होंने मुआवज़ा देने की घोषणा की थी।

अमेरिकी सैनिकों के लिए उन्होंने 18 करोड़ डॉलर का मुआवज़ा घोषित किया। इसके असर से 4 लाख से अधिक वियतनाम के लोगों को जो उस वक्त झेलना पड़ा या जो 5 लाख वियतनामी जन्म से ही व्याधियों के शिकार रहे, उन्हें आज भी कोई मुआवज़ा नहीं मिला है।
युद्ध के इन तरीकों के बारे में आज सोचना ज़रूरी हो जाता है। भारत ही नहीं, पूरा विश्व आज एक ऐसे विषाणु की चपेट में है जो पैदा क्यों हुआ इसपर बड़ी बहस छिड़ी हुई है। दुनिया भर में कई वैज्ञानिक मानते हैं कि ये प्राकृतिक नहीं बल्कि मानवीय निर्माण है।

हाल ही में लीक हुए एक चीनी दस्तावेज़ के अनुसार पाँच वर्ष पूर्व ही चीनी सेना के वैज्ञानिक सार्स कोरोनावायरस को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने पर विचार कर रहे थे। उन्होंने विचार रखा था कि तीसरा विश्व युद्ध जैविक हथियारों से लड़ा जाएगा।

इन सबके बाद चीन पर संदेह और गहरा जाता है। कोविड महामारी से निपटना भी युद्ध-स्तर पर ही पड़ रहा है तो ये युद्ध ही है ऐसा कहना अनुचित नहीं होगा। बाकी जब युद्धों के बारे में सोचिए तो किसी तीर-तलवार, तोपें-बंदूक लिए हमलावर के बारे में ही मत सोचिएगा।

आज का युद्ध “फोर्थ जनरेशन वॉरफेयर” कहलाता है। यहाँ सूचना भी एक हथियार है, इसलिए अख़बार पढ़ें, टीवी देखें, तो भी चौकन्ने रहें! हो सकता है आपका सामना समाचार से नहीं, किसी प्रोपगैंडा के हथियार से ही हो रहा हो।

Comment:

betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
İmajbet güncel
Safirbet resmi adres
Safirbet giriş
betnano giriş
sekabet giriş
sekabet giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş
winxbet giriş
yakabet giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
batumslot giriş
batumslot
batumslot giriş