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कविता

माँ शब्द वाचिक नहीं, हृदय की सौगात

मां के चरणों में झुके
जितना नर का माथ।
उतना ही ऊंचा उठे
ईश्वर पकड़े हाथ।।

जन्नत मां की गोद में
जीते जी मिल जाय।
मां का नहीं मुकाबला
सब बौने पड़ जाय।।

मां का दिल ममता भरा
वात्सल्य का कोष।
कोमल है नवनीत सा
स्वर्ग सी है आगोश।।

मां होती है प्यार की बदली
निशदिन पड़े फुहार।
मां की ताड़ना में भी
हित है जीवन दे सुधार।।

मां ईश्वर का रूप है
सौम्यता की तस्वीर।
मां के आशीर्वाद
से घटती जावे पीर ।।

अपमान उपेक्षा अभाव
में मां देती है प्यार ।
तन मन धन की कुर्बानी
को हरदम रहती त्यार।।

उत्पत्ति की क्षमता
केवल पृथ्वी तत्व में पाय ।
इसीलिए संसार में
धरती मां कहलाय ।।

सब देवों में श्रेष्ठ है
माता का स्थान।
इसीलिए तो वेद ने
कहा है मातृमान।।

अश्रु ढलके आंख से
देख दुखी संतान।
फिर भी साथ नहीं
छोड़ती मैया मेरी महान।।

मां का ऋण उतरै नहीं
कोटि जन्म के बाद ।
माता का करो मान
तुम मत भूलो मर्याद ।।

पय पान करावे शिशु
को गर्भ में देती खून ।
लेखनी भी न लिख सके
मां महिमा मजमून।।

पन्ना सी इतिहास में
मिलती नहीं मिसाल।
मेवाड़ मुकुट बचाने को
दिया कोख का लाल।।

मां भावनाओं का पुंज है
साहसी और गंभीर।
हौंसला देती दुख में
सदा बंधावे धीर ।।

मां हिमालय सा पाशबां
उर में दया की गंग।
मां के बेटों ने रखा
ऊंचा सदा तिरंग ।।

माँ साहस में शेरनी
दया में है नीर।
रत्नगर्भा कोख से
दिए अनेकों वीर।।

आकाश-मुखी क्षमाशील है,
मैया तेरा स्वभाव ।
तेरे दर्शन मात्र से ,
जगता भगवद्-भाव ॥

आकाश – मुखी से अभिप्राय हैं:- संसार में दो प्रकार के व्यक्तित्व होते हैं, पाषाण-मुखी वो लोग होते हैं ,जो दूसरों को पत्थर की तरह दबा कर रखते हैं ,जैसे पत्थर के नीचे उगने वाला पौधा।आकाश-मुखी वो लोग हैं जो आकाश की तरह सबको विकसित अथवा फलने- फूलने का अवसर देते हैं। मां का व्यक्तित्व इसी प्रकार का होता है,इसलिए मां को आकाश – मुखी कहा गया है।

मैं हंसु मैया हंसे,
मैं रोऊँ मां रोय।
ज़रा कराहूँ दर्द में ,
रात – रात ना सोये॥

मैया जीवित है यदि ,
बूढ़ा भी बच्चा होय।
मां की ताड़ना प्यार है ,
बेशक गुस्सा होय॥

मां के आशीर्वाद से,
पूरे हो सब काम।
बाल शिवा से बन
गए छत्रपति महाराज॥

मां के आंचल में छिपी,
षठ – संपत्ति की खान।
इसलिए संसार में ,
मां होती महान॥

अर्पण – दर्पण – समर्पण ,
संस्कृति मत छोड़।
मां की सेवा से मिले,
स्वर्ग बीच में ठोड़॥

माथे का चंदन है मां ,
करो नित्य तुम मान।
मां के आशीर्वाद से,
व्यक्ति बने महान॥

मां अति पावन शब्द है ,
दिल को दे संतोष।
कराहते को संजीवनी,
और राहत का कोष॥

धरती सूरज चंद्रमा ,
सागर ठहर न पाय ।
मां की उपमा में सभी,
ये बौने पड़ जाय॥

मां शब्द वाचिक नहीं,
हृदय की सौगात।
आत्मा की आवाज माँ,
झंकृत हो जज्बात॥

मां की कोख के लाल ने,
गिने शेर के दांत।
महिमा मां की अनंत है ,
मुझसे कहीं ना जात॥

मोमबत्ती की भांति जले ,
मां करती संघर्ष।
मां के दिये संस्कार से,
नर का हो उत्कर्ष॥

भारत मां की कोख से,
हुए अनेकों संत।
दिव्य प्रतिभा के धनी,
इस धरती के बसंत॥

प्रोफेसर विजेंदर सिंह आर्य
मुख्य संरक्षक : उगता भारत

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