Categories
नारी समाज

क्या मातृत्व स्त्री के पैरों की बेड़ी है?

लेखक – आर्य सागर

फ्रांसीसी स्त्रीवादी सीमोन द बुवा ने एक बार कहा था- मातृत्व स्त्री मुक्ति की राह में बांधा है। उसी दौर में यूरोप जर्मनी में नाजी पार्टी ने एक नारा दिया- स्त्री -मुक्ति से स्त्रियों को खुद को मुक्त करना चाहिए। लोकतंत्र, नस्ल को लेकर नाजी विचारधारा अमानवीय अविकसित पुर्वाग्रह से भले ही युक्त रही हो लेकिन स्त्री व मातृत्व जैसे विषयों पर नाजी विचारों का बढ़-चढ़कर समर्थन जर्मनी की स्त्रियों ने ही किया। एडोल्फ हिटलर ने अपने एक भाषण में कहा था—women are the internal mother’s of the nation।

कुछ ऐसा ही भारतीय संस्कृति में महिला जो एक माता है उसको निर्माता तो कहीं-कहीं ब्रह्मा की पदवी स्त्री को दी गई है उसे सृजन की देवी भी कहा गया है ।मनुष्य को वैचारिक स्वतंत्रता नैसर्गिक तौर पर मिली हुई है। आज दुनिया में विभिन्न वाद प्रचलित हैं उन्हें में से एक वाद स्त्रीवाद है स्त्रीवाद एक व्यापक दर्शन है यूरोप व अमेरिका के समाज में तो यह महिलाओं के लिए प्रासंगिक है क्या यह भारतीय समाज में उसी अर्थों में प्रासंगिक है।

क्या भारतीय समाज में महिलाओं के लिए यूरोप की तर्ज पर स्त्रीवाद के विचार को घड़ा जा सकता है। यूरोप के स्त्रीवाद की आड़ में भारतीय वामपंथी विचारधारा जो हमेशा से ही विरोधाभासी दुराग्रह से युक्त रही है उसने आज स्त्रीवाद के नाम पर महिलाओं को पुनः निराशा व अंधकार के युग में धकेल दिया है जबकि मूल वैदिक समाज में महिलाओं की स्थिति ऐसी नहीं रही है।

वामपंथी कहते हैं -महिलाओं की प्रशंसा में जो वचन प्राचीन भारतीय साहित्य में मिलते हैं इन्हें पुरुषों के द्वारा महिलाओं को गुलाम बनाने के लिए रचा गया है जिससे महिलाएं अपने शरीर ,अपनी कोख व अपने श्रम पर पुरुषों के अधिकार का कोई विरोध ना कर सके।

क्या वैदिक दर्शन पुरुषों पर स्त्री के अधिकार का कोई दावा या घोषणा करता है।

वामपंथी विचारकों के अनुसार भारत की आजादी की लड़ाई में जो महिला स्वतंत्रता सेनानी रही है उनके पीछे स्त्रीवाद नहीं अपितु पितृसत्ता का हाथ था भारतीय पुरुषों ने स्त्रियों को आजादी की लड़ाई में शामिल होने में केवल इसलिए स्वीकृति दी कि जिससे वह अपने पतियों और भाइयों का साथ दे सके।

में ज्यादा अतीत में पीछे नहीं जाऊंगा औपनिवेशिक काल में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को उसके पति की मृत्यु होने पर झांसी की बागडोर संभालने की जिम्मेदारी किसने दी यदि निरंकुश पितृसत्ता थी तो। झांसी के 900 कर्मचारीयों से युक्त दरबार का प्रबंध झांसी की रानी कुशलतापूर्वक करती थी। उस जमाने में तो कोई कथित स्त्रीवाद की विचारधारा भी नहीं थी।

हम मातृवाद पर ही विचार करेंगे छद्म स्त्रीवादियों (सूडो फेमिनिस्टों) के अनुसार मातृवाद स्त्री के साथ सबसे बड़ा छलावा है वह तर्क देते हैं प्रकृति ने यह निर्देश कभी नहीं दिया की स्त्री गर्भधारण करें प्रसव की पीड़ा को सहे संतान का पालन पोषण करें स्त्री पर मातृवाद संस्कृतिवादीयो नैतिकता वादीयो ने थोपा है। भारत में मनुस्मृति जैसे ग्रंथ इसी साजिश के तहत रचे गए हैं, ऐसा वह कहते। इस लेख के लेखक ने मनुस्मृति के 12 अध्यायों जिसमें 1400 से अधिक श्लोक है कोई भी श्लोक ऐसा नहीं पाया जो निरंकुश भेदभाव युक्त कथित पितृ सत्तात्मक समाज की स्थापना करता हो।

इन कथित स्त्रीवादियों के अनुसार विवाह स्त्रियों के लिए उत्पीड़न है विवाह रूपी संस्था के दामन में स्त्रियां घुट- घुट कर अपना जीवन जीती है।

यदि विवाह के दामन में दम घुटता है तो क्यों आज हाईली क्वालिफाइड आईटी पेशेवर डॉक्टर इंजीनियर लड़कियां विवाह रूपी संस्था में प्रवेश कर रही है। जबकि वह फाइनेंशली इंडिपेंडेंट है विवाह जैसा संस्कार रस्म या संस्था उनके लिए भी आदर्श क्यों बना हुआ है अधिकांश लड़कियां यहां तक की जनरेशन जेड वर्ष 1997 से लेकर 2012 के बीच जिनका जन्म हुआ है ऐसी लड़कियां भी विवाह जैसी संस्था में अपना विश्वास प्रदर्शित करती हैं बहुलता से लेखक ने इस पीढ़ी के अनेक बेटियों से यह पूछा है किसी भी लड़की ने विवाह को मजबूरी नहीं बताया। अफवाद तो हर किसी क्षेत्र में मिल जाएगा।

वामपंथी कहते हैं अविवाहित महिला यदि मां बनती है तो उसके मातृत्व का सम्मान क्यों नहीं किया जाता? विवाहित होने पर उसके मातृत्व को स्वीकार्यता मिल जाती है इसमें भी पितृ सत्तात्मक समाज का ही नियंत्रण है।

कुल मिलाकर मातृवाद के विषय में वामपंथी विमर्श यह कहता है । किसी भी स्थिति में मां बनना सौभाग्य नहीं है यह एक महिला के जीवन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। क्या कभी इन कथित स्त्रीवादियों ने भारतीय महिलाओं से यह पूछा है महिलाओं के मत का संग्रह किया है कि क्या मां बनने का निर्णय उन पर पुरुषों द्वारा थोपा गया है? क्या एक माता मजबूरी में बच्चों को जन्म देती है क्या परंपरागत भारतीय समाज में आज भी मातृत्व के विषय में महिलाओं की राय का कोई महत्व नहीं होता।

वहीं वामपंथ यह मांग भी करता है कि अविवाहित महिलाओं को भी बच्चा पैदा करने का अधिकार मिलना चाहिए कहीं ना कहीं लिव -इन की कानूनी वैधता के चलते परोक्ष तौर पर यह अधिकार मिल गया है ऐसा मैं समझता हूं। विवाहित मातृत्व से वामपंथ को आपत्ति है लेकिन अविवाहित मातृत्व उसको स्वीकार्य है जिसको पश्चिमी व पूर्वी समाज ने आज भी खुले हृदय से स्वीकार नहीं किया है खुद महिलाएं भी इसके खिलाफ है अमेरिका में गर्भपात के अधिकार को आज नियंत्रित किया जा रहा है।

आज भी अधिकांश भारतीय महिलाएं मां बनने में अपना सौभाग्य समझती हैं। मातृत्व केवल संस्कृतिवाद धर्म शास्त्रों में नहीं गढा गया है यह एक पवित्र प्राकृतिक व्यवस्था है। करियर व जीवन में मातृत्व को अडचन मानने वाला भी एक छोटा सा भारतीय महिला वर्ग तेजी से उभरा है जिसके मूल में अति मानवीय महत्वाकांक्षा क्षुद्र स्वार्थ है जो एक स्त्री के भावी अस्तित्व की संभावना को निर्ममता से कुचलता है लेकिन विरोधी विपरीत विचारधाराए तो सभ्यता के आदि से ही अस्तित्व में रही है क्या उन्हें समाज की व्यापक सच्चाई माना जा सकता है ।

हद तो तब हो गई जब महज 40 पृष्ठ की एक लघु पुस्तक लिखने वाली उत्तर प्रदेश के बागपत जिले की साहित्यकार लेखिका गायत्री आर्या ने मातृत्व नामक पुस्तक लिखी कोई भी व्यक्ति पुस्तक के नाम को सुनकर यह धारणा बनायेगा, इस पुस्तक में मातृत्व की प्रशंसा में गीतगान हुआ होगा लेकिन इस पुस्तक को जब आप पढ़ेंगे तो आप समझ जाएंगे लेखिका का मातृत्व आम भारतीय महिला का मातृत्व नहीं वामपंथी मातृत्व है लेखिका अपनी पुस्तक में तर्क उठाती है की बच्चा पैदा करने की इच्छा या मां बनने की इच्छा प्राकृतिक नहीं है आखिर ऐसा क्यों होता है 20-21 ,23 वर्ष की उम्र में शादी होने के फौरन बाद या शादी के दो-तीन साल बाद ही मां बनने की इच्छा जागृत हो जाती है वहीं अविवाहित 30-35 वर्ष की महिला स्त्री में यह इच्छा जागृत नहीं होती यदि यह इच्छा जागृत होती प्राकृतिक होती तो 30 -35 वर्ष की आयु की महिलाओं में भी मां बनने की इच्छा जागृत होनी चाहिए अर्थात मां बनने की इच्छा महिलाओं की इच्छा नहीं है यह पुरुषों ने उन पर थोपी है अर्थात लेखिका के अनुसार कोई स्त्री मां पुरुष की इच्छा पूर्ति के लिए बनती है मां बनने की महिला की कोई नैसर्गिक इच्छा नहीं होती।

लेखिका के अनुसार भारतीय समाज में मातृत्व का साजिश के तहत महिमा मंडन किया गया है।

लेखिका ने दूसरा तर्क उठाया है – एक महिला के जीवन में नदी पहाड़ जंगल की ज्यादा भूमिका है उतनी भूमिका उसके मां-बाप की नहीं है अपने मां-बाप के बिना तो वह जीवित रह सकती है लेकिन नदी पर्वत जंगल के बिना वह जीवित नहीं रह सकती यह तर्क कितना हास्यास्पद है साधारण बुद्धि का व्यक्ति भी इस पर अपनी राय रख सकता है क्या माता-पिता प्राकृतिक व्यवस्थाओं के सामने महत्वहीन हो जाते हैं ।क्या महिला का अस्तित्व केवल प्रकृति के कारण है । यह सत्य है हम सब का अस्तित्व पेड़ पौधे नदी पहाड़ पर्यावरण पर आश्रित है लेकिन यह प्राकृतिक व्यवस्था भी मिलकर स्वतंत्रता से जीवन का सृजन नहीं कर सकती जीवन का सृजन माता-पिता ही करते हैं।

ऐसी ऊलजुल बातों को स्त्रीवाद के विकसित विमर्श के तौर पर स्थापित किया जाता है और हद तो तब हो जाती है जब ऐसी कथित स्त्रीवादियों को लाडली मीडिया जैसा लिंग संवेदनशीलता के क्षेत्र में कार्य करने पर मिलने वाला अवार्ड दे दिया जाता है इस लेख के लेखक ने मातृत्व पुस्तक की समालोचना में एक विस्तृत लेख लिखा है जिसे पुस्तक के रुप में प्रकाशित करने की योजना है।

वामपंथ का चरित्र दोहरा होता है एक तरफ तो वामपंथी परंपरा संस्कृति नैतिकता को नहीं मानता धर्म तो उनके लिए दूर की कौड़ी है अफीम है उसे फर्जी मिथक मानता है तो वही यह प्राकृतिक जीवन की वकालत करता है जब प्रकृति के आधार पर वामपंथी महिलाओं को परिभाषित नियमित करते है, तो वहीं वामपंथ आधुनिक सुख सुविधाओं को भी अर्जित करने पर जोर देता है प्रकृति की किस किताब में लिखा है कि हमें 5G 6 G इंटरनेट सर्विस आधुनिक सेवन स्टार होटल में भोजन करना चाहिए। इन कथित छद्म स्त्री वादियों को जंगली मनुष्यों के समान जंगलों में अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। पेड़ों की छाल इन्हें पहननी चाहिए पत्थरों से आग जलानी चाहिए। जहां सुख सुविधा भोग विलास की बात आएगी तो वहां इन्हें तर्क व वैज्ञानिक चेतना याद आती है और जहां परिवारों में शांति समर्पण ईमानदारी स्त्री व पुरुष के बीच समन्वय की बात आती है एक बच्चे को माता-पिता से मिलने वाले सुख की बात आती है तो वहां उन्हें यह थोपी हुई नैतिकता प्रतीत होती है।

तलवार के हमले से भी खतरनाक होता है वामपंथी बौद्धिक हमला वामपंथी दुनिया में ऐसा ही सभ्यता के आदिकाल से कर रहे हैं। मीडिया प्रचार तंत्र सूचना तकनीक कोई यह मारक हथियार के तौर पर प्रयोग करते हैं।

लेखक – आर्य सागर
ग्रेटर नोएडा

One reply on “क्या मातृत्व स्त्री के पैरों की बेड़ी है?”

बहुत ही पारदर्शी और तथ्य के साथ तर्कपूर्ण आलेख

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
jojobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
onwin giriş
onwin giriş
onwin giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
betsat giriş
betsat giriş
betsat giriş
betsat giriş
Kolaybet Giriş
holiganbet giriş
onwin
onwin