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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से समाज

परिवारों से मिटता दादी मां का अस्तित्व चिंता का विषय

आज अनाथालयों में वृद्ध महिलाओं के झुंड आंसू बहा रहे हैं। हमारे देश की परंपरा तो “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव” अर्थात माता-पिता, गुरु और अतिथि का देवता के समान सम्मान करना चाहिए- की रही है। इसके उपरांत भी यदि वृद्ध माताएं दुख के आंसू बहा रही हैं तो समझना चाहिए कि हम अपने देश की ऋषि परंपरा के विपरीत आचरण कर रहे हैं। वास्तविकता यह है कि आज हमारे देश में माता-पिता गुरु और अतिथि चारों ही उपेक्षा के पात्र बन चुके हैं। यह स्थिति हमारे विपरीत दिशा में चलने की परिचायक है। स्थिति यह है कि इसके उपरांत भी हम पतन की ओर ही जा रहे हैं। संभलने का कोई संकेत दूर-दूर तक भी दिखाई नहीं दे रहा। शिक्षा उलटी, दिशा उल्टी, सोच उल्टी, कार्य शैली उल्टी – सब कुछ उलट पलट हो चुका है। हम जाति के नाम पर, भाषा के नाम पर, संप्रदाय के नाम पर और क्षेत्र के नाम पर लड़ रहे हैं। जिनका कोई वास्तव में मूल्य नहीं है और जिनका मूल्य है – उन्हें हम उजड़ने दे रहे हैं। माता-पिता गुरु और अतिथि वास्तव में नाम नहीं हैं, ये संस्थाएं हैं और जिस देश की संस्थाएं उजड़ जाती हैं उसका भविष्य उजड़ जाता है। जाति भाषा संप्रदाय और क्षेत्रवाद तो मिटना चाहिए था। उजड़ना चाहिए था। परन्तु हम उन्हें आबाद करते जा रहे हैं और जो आबाद रहनी चाहिए थीं, उन्हें उजाड़ रहे हैं। यह प्रवृत्ति हमारी मूर्खता और दुर्बुद्धि का परिचायक है। हमारी स्थिति कुछ दुर्योधन जैसी हो चुकी है, जिसने श्री कृष्ण जी से कहा था :-

जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः।
जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः।।

अर्थात मैं धर्म के बारे में जानता हूं किन्तु मेरी उसमें प्रवृत्ति या रूचि नहीं है। मैं अधर्म के बारे में भी जानता हूं, किन्तु उसमें मेरी निवृत्ति नहीं है।
हम जानते हैं कि धर्म क्या है और अधर्म क्या है? परंतु धर्म में हमारी प्रवृत्ति नहीं हो रही है और अधर्म से हमारी निवृत्ति नहीं हो रही है। अधर्म नित्य हमारा पीछा कर रहा है।

जब किसी गाड़ी के पीछे यह लिखा देखता हूं कि “बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ” तो लगता है कि इस नारे को हमने केवल नारे तक ही सीमित रखा है या अधिक से अधिक इस सीमा तक अपनाया है कि बेटी बचाओ जिससे कि संतान बढ़ाई जा सके ! उसके बाद इस बेटी को जब वह दादी मां बनने का सपना देखे तो उठाकर वृद्ध आश्रम में डाल देंगे। यदि हमारी सोच यही बन चुकी है और देश की सच्चाई यही हो चुकी है तो हमारा भविष्य कैसा हो सकता है ? अर्थात अधर्म का दुर्योधन हमारा विनाश करेगा ही – यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इस सबके बीच हम नारी सशक्तिकरण की बात कर रहे हैं। वृद्ध माता को वृद्ध आश्रम की जेल की हवा खिलाती घर की बहू के आचरण के चलते कई प्रकार के प्रश्न खड़े होते हैं। जैसे – यह कौन सा नारी सशक्तिकरण है ? कैसा नारी सशक्तिकरण है ? किसके लिए नारी सशक्तिकरण है ? नारी सशक्त हुई या हो रही है तो क्या वह केवल सास और वृद्ध महिला को घर से उठाकर वृद्ध आश्रम में पहुंचाने के लिए हो रही है ? यदि नारी सशक्तिकरण का यही अर्थ है तो फिर तो हमने नारी का सशक्तिकरण नहीं निष्ठुरीकरण किया है। सशक्त होती हुई महिला ने आज परिवार के भीतर घुटन और कुंठा का परिवेश सृजित कर दिया है। नारी सशक्तिकरण का अभिप्राय था कि वह नारी की गरिमा का ध्यान रखेगी ? इसका अभिप्राय यह तो कदापि नहीं था कि वह नारी होकर भी नारी को अपमानित करेगी ? पति, सास ,ससुर और परिवार के प्रत्येक सदस्य का अपमान करेगी। नारी का अभिप्राय है ‘ न ‘ ‘ अरि’ अर्थात जिसका कोई शत्रु नहीं है। यदि नारी सशक्तिकरण ने नारी को नारी का ही शत्रु बना दिया है तो समझिए कि नारी सशक्तिकरण का सारा प्रयास और पुरुषार्थ व्यर्थ गया, अपितु हमारे लिए और भी अधिक विध्वंसकारी हो गया है। इससे तो अच्छा वही कथित पुरुष प्रधान समाज था , जिसमें दादी मां को विशेष जिम्मेदारियां देकर उसका सम्मान बढ़ाया जाता था। वह चार-पांच भाई बहनों के परिवार की मुखिया होती थी। इसके विरुद्ध आज की नारी समाज और परिवार उजाड़ती जा रही है। किसी के भी प्यार में पागल हुई किसी लड़की को आप समझा नहीं सकते। यहां तक कि विवाह के बाद भी विवाहेत्तर संबंध बनाने की प्रवृत्ति जिस खतरनाक स्थिति तक बढ़ी है , उसमें भी संतान तक के प्रति मां निष्ठुर होती देखी जा रही है। इसे आप क्या कहेंगे – नारी सशक्तिकरण या नारी का निष्ठुरीकरण ? नानी मां के किस्से और दादी मां का लाड प्यार कभी समाज का मार्गदर्शक होता था। वह हमारी विरासत थी। जिसे हमने सहेजकर रखा था और उसे हम बड़े सम्मान के साथ ओढ़कर चलते थे । आज नारी ने दादी मां को जिस प्रकार बड़ी निर्दयता के साथ समाज से बहिष्कृत किया है, उसका पाप यह समाज या देश निश्चय ही भुगतेगा।

कभी वह समय था- जब नई लड़कियों के निकलते पंखों को दादी मां तोलती थी। उसके उठते कदमों को पहचानती थी। उसके उभरते अंगों को लज्जा से ढकने का तरीका बताती थी। उसके लड़खड़ाते कदमों को संतुलित करने का उपाय खोजती थी । उसे सदाचरण का पाठ सिखाती थी। आज की नारी ने अपने सशक्तिकरण के नाम पर दादी मां को ठेंगा दिखाते हुए कह दिया है कि मैं जो कुछ करूं मेरी मर्जी। दादी मां का हस्तक्षेप मुझे बर्दाश्त नहीं।

कभी वह भी समय था जब नवजात बालिका को जन्म लेते ही मार दिया जाता था। उसे मटके में बंद कर जमीन में गाड़ना पुरुष का कार्य होता था। परंतु उससे पहले उसे मारने का काम नारी करती थी। आज भी तो यही हो रहा है। उस समय तो नवजात बालिका को ही मारा जाता था, आज तो भ्रूण हत्या की जा रही है और यदि इसके उपरांत भी किसी कारण बालिका बच जाए तो उसे बुढ़ापे में जेल की हवा खिलाई जाती है। संभवत: उसे इस बात का दंड दिया जाता है कि तू बची क्यों और बचने के बाद तूने परिवार नाम की संस्था को बसाया क्यों ? यदि तूने यह पाप किया है तो तुझे अपने किए का दंड यही मिलेगा कि तुझे अब अब से आगे अभिशप्त जीवन व्यतीत करना होगा। तनिक सोचिए ! दादी मां के बिना आने वाला समय कितना भयानक होगा ?

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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