महात्मा गांधी और बाल्मीकि मंदिर की घटना

veersavarkar

#डॉविवेकआर्य

घटना 2 मई, 1947 की है। दिल्ली के वाल्मीकि मंदिर में प्रार्थना करने के लिए उपस्थित हुए महात्मा गाँधी ने क़ुरान की कुछ आयतों का पाठ किया। इस पर प्रस्तुत सज्जन ने आक्षेप किया तो उसे पुलिस ने पकड़ लिया। गाँधी जी ने प्रार्थना बंद कर दी और अपने भाषण में कहा कि ऐसी संकुचित ह्रदयता पर उन्हें बड़ा हुआ और उन्होंने कहा कि कुछ हिन्दू प्रार्थना में कुरान की आयतें पढ़ने पर क्यों आक्षेप करते हैं? इन वाक्यों में ईश्वर की स्तुति और प्रार्थना की गई है। इस से हिन्दू धर्म को क्या हानि पहुंच सकती है?

  1. 11 मई, 1947 के हरिजन अख़बार में इस प्रसंग के विषय में लिखा –

मुझे एक मित्र ने बताया है कि कुरान की आयतों का जो आशय है वो यजुर्वेद में भी मिलता है। जिन्होंने हिन्दू धर्म को पढ़ा है वे जानते है कि 108 उपनिषदों में से एक अल्लोपनिषद भी है। क्या जिस व्यक्ति ने उसे लिखा उसे अपने धर्म का ज्ञान न था?

समीक्षा-

गाँधी जी के हरिजन अख़बार में छपी टिप्पणी का प्रतिउत्तर आर्यसमाज के दिग्गज विद्वान पं धर्मदेव विद्यामार्तण्ड ने सार्वदेशिक पत्रिका के मई 1947 के अंक में सम्पादकीय के रूप में दिया। पं जी लिखते है-गाँधी जी ने अल्लोपनिषद का वर्णन किया। वास्तविकता में ईश, केन, कठ आदि 11 उपनिषद् ही ऋषिकृत उपनिषदें हैं। इसके अतिरिक्त 100 से ऊपर उपनिषदें सांप्रदायिक लोगों ने बना लिए थे जिनमें एक अल्लोपनिषद भी है। स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश के 14वे समुल्लास के अंत में भंडाफोड़ करते हुए लिखा है- ‘

यह तो अकबरशाह के समय में अनुमान है कि किसी ने बनाई है। इस का बनाने वाला कुछ अर्बी और कुछ संस्कृत भी पढ़ा हुआ दीखता है क्योंकि इस में अरबी और संस्कृत के पद लिखे हुए दीखते हैं। देखो! (अस्माल्लां इल्ले मित्रवरुणा दिव्यानि धत्ते) इत्यादि में जो कि दश अंक में लिखा है, जैसे-इस में (अस्माल्लां और इल्ले) अर्बी और (मित्रवरुणा दिव्यानि धत्ते) यह संस्कृत पद लिखे हैं वैसे ही सर्वत्र देखने में आने से किसी संस्कृत और अर्बी के पढ़े हुए ने बनाई है। यदि इस का अर्थ देखा जाता है तो यह कृत्रिम अयुक्त वेद और व्याकरण रीति से विरुद्ध है। जैसी यह उपनिषद् बनाई है, वैसी बहुत सी उपनिषदें मतमतान्तर वाले पक्षपातियों ने बना ली हैं। जैसी कि स्वरोपनिषद्, नृसिहतापनी, रामतापनी, गोपालतापनी बहुत सी बना ली हैं। देखिये इसका नमूना-

अस्मांल्लां इल्ले मित्रवरुणा दिव्यानि धत्ते। इल्लल्ले वरुणो राजा पुनर्द्ददु । ह या मित्रे इल्लां इल्लल्ले इल्लां वरुणो मित्रस्तेजस्काम ।।१।। होतारमिन्द्रो होतारमिन्द्र महासुरिन्द्रा ।अल्लो ज्येष्ठं श्रेष्ठं परमं पूर्णं ब्रह्माणं अल्लाम्।।२।।अल्लोरसूलमहामदरकबरस्य अल्लो अल्लाम्।।३।। आदल्लाबूकमेककम्।। अल्लाबूक निखातकम्।।४।। अल्लो यज्ञेन हुतहुत्वा। अल्ला सूर्यचन्द्रसर्वनक्षत्र ।।५।। अल्ला ऋषीणां सर्वदिव्याँ इन्द्राय पूर्वं माया परममन्तरिक्षा ।।६। अल्ल पृथिव्या अन्तरिक्षं विश्वरूपम्।।७।। इल्लां कबर इल्लां कबर इल्लाँ इल्लल्लेति इल्लल्ला ।।८।। ओम् अल्ला इल्लल्ला अनादिस्वरूपाय अथर्वणा श्यामा हुं ह्रीं जनानपशूनसिद्धान् जलचरान् अदृष्टं कुरु कुरु फट्।।९।। असुरसंहारिणी हुं ह्रीं अल्लोरसूलमहमदरकबरस्य अल्लो अल्लाम् इल्लल्लेति इल्लल्ला ।।१०।।

इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि किसी ने मुस्लिम मत को वेद और उपनिषद् के अनुकूल दिखाकर हिन्दुओं को भ्रमित करने केलिए इसे रचा था। गाँधी जी का ऐसे विषयों में बिना प्रामाणिक जानकारी के कुछ बी लिखना गलत है।

  1. हरिजन में गाँधी जी लिखते है-

‘मैं एक सनातनी हिन्दू होने का दवा करता हूँ और चूकिं हिन्दू मज़हब और दूसरे सब मज़हबों का निचोड़ मज़हबी रवादारी या धार्मिक सहिष्णुता है, इसलिए मेरा दावा है कि अगर में एक अच्छा हिन्दू हूँ तो एक अच्छा मुसलमान और एक अच्छा ईसाई भी हूँ अपने मज़हब को दूसरे मज़हबों से बड़ा मानना सच्ची मज़हबी भावना के खिलाफ है। अहिंसा के लिए नम्रता जरुरी है। क्या हिन्दू धर्म शास्त्रों में भगवान के हज़ारों नाम नहीं बतलाये गए हैं? रहीम भी उसमें से एक क्यों न हो? कलमे में तो सिर्फ भगवान की तारीफ़ की गई है और मुहम्मद साहिब को उनका पैगम्बर माना गया है। जिस तरह में बुद्ध, ईसा और जरदुश्त को मानता हूँ उसी तरह मुझे खुदा की तारीफ़ करने मुहम्मद साहब को पैगम्बर मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती।’

समीक्षा-

पं जी लिखते है-धार्मिक सहिष्णुता का यह अर्थ है कि दूसरे मत वालों को सुनकर हम उन पर विचार करें और युक्तियों से ही उनके विचारों को बदलने का प्रयत्न करें न कि जबरदस्ती व तलवार के बल से। किन्तु इसका अर्थ उनकी बुद्धि विरुद्ध असंगत बातों को मानना नहीं है। क्या महात्मा जी कह सकते है कि अहिंसा, ब्रह्मचर्य, दयालुता आदि का जो आदर्श आर्यों के धर्म शास्त्रों में बतलाया गया है वही कुरान इत्यादि में भी पाया जाता है? इसी प्रकार से कहाँ वेद का एक पत्नीव्रत आदर्श सिद्धांत और कहाँ अपनी सगी बहन को छोड़कर किसी से भी बहुविवाह। कहाँ निराकार वेद विदित ईश्वर और कहाँ आसमान में तख़्त पर बैठने वाला शरीरधारी खुदा। जहाँ तक कलमा की बात है उसकी दूसरी पंक्ति कि मुहम्मद उस खुदा का दूत है ऐसा कहना और जो मुहम्मद साहिब को पैगम्बर नहीं मानते चाहे वो कितने भी अच्छे क्यों न हो उनको दोजख अर्थात नर्क जाना पड़ेगा। यह सर्वदा अनुचित और युक्ति विरुद्ध है।

  1. क़ुरान की आयतों पर टिप्पणी करते हुए पं जी ने ख्वाजा हसन निज़ामी के क़ुरान भाष्य पृ. 2 से एक प्रमाण पं जी ने प्रस्तुत किया जिसमें लिखा है- जो मार्ग से भटके हुए है अल्लाह उन पर क्रोध करता है। पं जी इसकी तुलना यजुर्वेद ‘अग्ने न्य सुपथा’ मन्त्र से कि जिसका अर्थ है हे ज्ञान स्वरुप परमेश्वर! हमें सब प्रकार के ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए सदा उत्तम धर्ममार्ग पर चला। आगे पं जी लिखते है कि गाँधी जी को सभी मतों की समानता पर अधिक बल देने के स्थान पर स्वामी दयानन्द के इस सन्देश को समझना चाहिए कि सभी मतों में कई सच्ची तथा अच्छी बातें है। हिन्दू मंदिरों में क़ुरान पढ़ना सही नहीं है।

पं जी के सम्पादकीय के कुछ प्रमुख अंशों को हमने यहाँ प्रस्तुत किया है। वास्तव में मुझे अभी तक गाँधी जी द्वारा किसी मस्जिद में वेद मन्त्र को प्रार्थना रूप में पढ़ने का कोई प्रमाण देखने में नहीं आया है। मैं कई बार सोचता हूँ गाँधी जी के बारे में कुछ लेखकों ने विशेष पुस्तक लिखी हैं जैसे मौलाना गाँधी, काश गाँधी जी ने कुरान पढ़ी होती?, गाँधी बेनकाब आदि। इन पुस्तक को लिखने वालों का प्रयोजन क्या था। इस लेख को पढ़ने के पश्चात शायद पाठक इस विषय पर प्रकाश डाल सके।

खिलाफत के दौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। मुसलमानों ने कांग्रेस के मंच से क़ुरान की आयतें पढ़ी। वो आयतें गैर मुसलमानों के विषय में सख्त थी। स्वामी श्रद्धानन्द ने गाँधी को इस विषय में सचेत किया तो गाँधी जी ने उसे गंभीरता से नहीं लिया और कहां कि ये आयतें अंग्रेजों के लिए है। स्वामी जी फिर कहा कि कल को ये हिन्दुओं के विरोध में कहीं जाने लगे। तब आपका रवैया अभी भी ऐसा ही होगा क्या? गाँधी जी मौन हो गए।

कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन में मंच से अली बंधू कहे जाने वाले मौलाना अली ने कहा कि देश में 6 करोड़ अछूत है। उन्हें आधा हिन्दुओं में और आधा मुसलमानों में बाँट देना चाहिये। स्वामी श्रद्धानन्द ने इस विषय पर रोष प्रकट किया पर गाँधी जी मौन रहे।

कांग्रेस के ही मंच से इन्हीं मौलाना ने एक बार गाँधी जी पर आक्षेप करते हुए कहा कि गाँधी जी को कभी जन्नत में जगह नहीं मिलेगी चाहे उनके विचार कितने अच्छे हो, कितने पवित्र हो क्योंकि वे मुसलमान नहीं है। गाँधी जी मंच से कुछ न बोले। अधिक दवाब पड़ने पर केवल यही बोले कि मौलाना मुझ वृद्ध से मज़ाक अच्छा कर लेते है।

ये कुछ घटनाएं है। जो पाठकों को गाँधी जी के अनसुने जीवन का परिचय देती है।

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