क्या है पर्यावरण और हमारे मानसिक स्वास्थ्य का संबंध?

Environment-and-our-Mental-Health-1 (1)

डॉ. राकेश राणा

    सृष्टि में हर एक चीज दूसरे से जुड़ी हुई है। कुछ भी अलग नहीं है। हर चीज का हर चीज पर प्रभाव भी पड़ता है। मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य व पर्यावरण भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यहां यह समझने की जरूरत है कि हमारा पर्यावरण हमारे स्वास्थ्य से कैसे जुड़ा है। स्वास्थ्य मात्र बीमारी की अनुपस्थिति भर नहीं है। मानव स्वास्थ्य को कई कारक प्रभावित करते हैं जिनमें मुख्यतः जैविक, मनोवैज्ञानिक और रासायनिक हैं। ये कारक आंतरिक और बाहरी स्थितियों से जुड़े होते हैं। वाह्य कारकों में स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक पर्यावरण है। पर्यावरण उस हवा से जुड़ा है जिसमें हम सांस लेते हैं, उस पानी से बनता है जिसे हम पीते हैं, उस मिट्टी से इसका संबंध है जिसमें आहार तत्व पोषित होते हैं। इसका प्रत्येक भाग हमें और हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करता है पर मानव स्वास्थ्य का अहम आधार पर्यावरण इस समय कई सवालों से दो चार हो रहा है। सबसे गंभीर सवाल प्रदूषण का है, जलवायु परिवर्तन का है, पारिस्थितिकीय क्षरण का और जैव विविधता के विलोपन का है। इन सबके पीछे मानवीय क्रिया-कलापों से लेकर ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के प्रकृति विरोधी चरित्र और मनुष्य की स्वकेन्द्रित जीवनशैली है।

    हमारे मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य को आंतरिक और वाह्य दोनों कारक प्रभावित करते हैं। आंतरिक कारकों में शरीर के अंदर की समस्याएं जैसेः प्रतिरक्षा का कमजोर होना, हार्मोनल असंतुलन होना अथवा कोई आनुवंशिक विकार होना शामिल हैं। वाह्य कारकों में तीन प्रमुख हैं – पराबैंगनी और रेडियोधर्मी विकिरण, ध्वनि प्रदूषण, कार्बन मोनोऑक्साइड और सीएफसी जैसे तत्व। औद्योगिक खतरों में भारी धातुओं, कीटनाशकों और जीवाश्म ईंधन दहन के रासायनिक खतरे हैं। वहीं परजीवी, बैक्टीरिया और वायरस सरीखे ढेरों जैविक खतरे भी मनुष्य के सामने हैं। इन सबका कारण धरती पर मानवीय क्रिया-कलाप ही है। हम अपने पारिस्थितिक तंत्र में जो भी अच्छा-बुरा साझा करते हैं वही अंततः लौटकर हमारे पास आता है। पारिस्थितिक संतुलन का बिगड़ाव सबसे स्पष्ट रूप में पहले पानी की गुणवत्ता और वायु प्रदूषण तथा विषम परिस्थितियों में परिलक्षित होता है। वहीं विकिरण भी धीरे-धीरे मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। घटती जैव विविधता जीवन को सतत संकट की ओर धकेल रही है। शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के बीच संबंध जटिल है। इसे समझने में मनुष्य थोड़ा लापरवाह भी है। इस संबंध को समझने की दिशा में हम अकाट्य प्रमाणों की प्रतीक्षा में हैं। दूसरी ओर, प्रकृति के साथ तर्क करना समझदारी नहीं है, यह भावना से जुड़ा संबंध है; सामान्य समझ का मसला है। यदि खराब वातावरण मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है तो एक अच्छा वातावरण स्वास्थ्य पोषक भी हो सकता है। यूएनईपी का अनुमान है कि रोगों का 25 प्रतिशत हिस्सा पर्यावरणीय खराबी से जुड़ा है। दूषित जल और स्वच्छता का अभाव प्रतिवर्ष लगभग 3.5 मिलियन लोगों की मृत्यु का जिम्मेदार है। स्वस्थ जीवन के लिए स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र आवश्यक है। स्वस्थ समाज के लिए मजबूत पारिस्थितिक तंत्र, आर्थिक विकास, निरंतर गरीबी में कमी, मानव कल्याण का वातावरण और संसाधनों के संरक्षण की प्रवृत्ति का विकास जरूरी है।

    पर्यावरण में वे सभी शक्तियां शामिल हैं जो व्यक्ति के बिना कार्य करती हैं। मोटे तौर पर पर्यावरण के दो पक्ष हैं: पहला भौतिक, दूसरा सामाजिक। पर्यावरण में उन सभी बाहरी कारकों को शामिल किया जा सकता है जो जीवन शुरू होने के साथ ही व्यक्ति पर कार्रवाई करते हैं। लैमार्क पर्यावरण के प्रति व्यक्ति के अनुकूलन की क्षमता को महत्वपूर्ण मानते हैं, वहीं डार्विन ‘फिटेस्ट’ के जीवित रहने को जीवन सिद्धांत मानते हैं। इन दोनों दर्शनों के इर्द-गिर्द ही मानव का प्रकृति के प्रति रवैया विकसित हुआ। जहां पहला दर्शन प्रकृति के साथ सहकार और सह-अस्तित्व की जीवनशैली को पोषित करता है वहीं दूसरा दर्शन प्रकृति पर विजय पाने का है। प्रकृति पर नियंत्रण के भ्रम की यह प्रवृत्ति विज्ञान और तकनीक के विकास को हवा देती रही। परिणामतः अंधाधुंध शहरीकरण और औद्योगीकरण ने पर्यावरणीय समस्याओं को जटिल बना दिया। भोगवादी क्रिया-कलापों ने जलवायु-परिवर्तन की स्थितियां ला दी। इससे ग्लोबल-वार्मिंग हुई। वायुमंडल में कुछ खास तरह की गैसों के आधिक्य से उपजा यह संकट तमाम पर्यावरणीय संकटों की जड़ में है। यह आज न केवल पर्यावरण को क्षति पंहुचा रहा है बल्कि मानव ज़ीवन के हर पहलू को प्रभावित कर रहा है। पृथ्वी पर घटित हर क्रिया-कलाप का पैमाना पर्यावरण की सेहत ही है जिसके नाप-तौल की सामान्य इकाई कार्बन-फुट-प्रिंटस है। धरती पर समस्त जीव-जगत कैसे अपने जीवन का संचालन कर रहा है? वह प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व और सहकार के भाव वाली जीवनशैली जी रहा है या प्रकृति पर विजय पाने की लालसा और अतिशय उपभोग वाली सुविधाओं को स्वकेन्द्रित होकर गढ़ रहा है? कार्बन-फुट-प्रिंटस हमारी हरकतों की निशानदेही है।

    ग्लोबल वार्मिंग से धरती का ताप बढ़ता है जिससे कृषि बड़े स्तर पर प्रभावित होती है। फसल-चक्र अनियमित होता है, उत्पादकता घटती है नतीजतन खाद्यान्न संकट बढ़ता है और भुखमरी व कुपोषण के रूप में सामने आता है। इससे स्वास्थ्य सीधे प्रभावित होता है और समग्र जीवन-चक्र गड़बड़ा जाता है। पशु, पक्षी और वनस्पतियों की संख्या घटने लगती है। मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बाढ़, सूखा, समुद्री तूफान, चक्रवात, भूकंप-भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ जाती है। विस्थापित जनसंख्या अकाल, भुखमरी, सामाजिक विषमताओं और मानसिक रोगों की चपेट में आती है। इनका पुनर्वास स्थानीय जनसंख्या में असंतोष पैदा कर अतिरिक्त समस्याएं उत्पन्न करता है। दुनिया बाढ़, भूकंप, तूफान, चक्रवात और सुपर साइक्लोन, सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित है। विकास के आधुनिक मॉडल में तकनीकी और औद्योगिक प्रगति ने पर्यावरणीय खतरों को गुणात्मक रूप से बढ़ा दिया है। पर्यावरणीय खतरे इंसान को शारीरिक नुकसान तो पहुंचाते ही हैं, मनोवैज्ञानिक दबाव और तनाव भी लाते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि पर्यावरण प्रदूषण से कैंसर, अस्थमा, टीबी जैसे श्वसन संबंधी रोग होते हैं वहीं वायु प्रदूषण कम दृश्यता, आंखों की जलन, अनिद्रा, थकान, सिरदर्द, एलर्जी और श्वसन रोगों का कारण बनता है। बादल, बारिश, उमस और बहुत गर्म दिन लोगों को उदास और चिड़चिड़ा बनाते हैं। वायु प्रदूषण के कारण विभिन्न प्रकार की मनोवैज्ञानिक समस्याएं बढ़ रही हैं। प्रदूषित हवा की बुरी गंध भी मनोवैज्ञानिक रूप से नकारात्मकता और अप्रिय भाव पैदा करती है। ध्वनि प्रदूषण भी शारीरिक-मानसिक स्वाथ्य को बिगाड़ रहा है। 21वीं सदी में पृथ्वी का तापमान 3से 8डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा। मानव शरीर वातावरण के अनुरूप ढलने की क्षमता रखता है। इसे ही हम शरीर की प्रतिरोधक क्षमता ’इम्यूनिटी’ कहते हैं पर बढ़ती उम्र में पर्यावरण में बढ़ता प्रदूषण हमारी इस क्षमता को घटाता है। इससे स्वास्थ्य खराब होता है और बुढ़ापे का शरीर रोगों का घर हो जाता है। धरती का ताप बढ़ने से वातावरण गर्म होता है तो हमारा शरीर इस तापक्रम के साथ सामान्य बनने के लिए अतिरिक्त जद्दोजहद करता है। इसी से श्वांस और हृदय संबंधी रोग बढ़ रहे हैं।

    मानवीय क्रिया-कलाप और पर्यावरण प्रदूषण दोनों के बीच सीधा संबंध है। यदि हमारी जीवनशैली स्वकेन्द्रित है तो हमारा हर क्रिया-कलाप प्रदूषण पैदा करेगा। मानव और प्रकृति का रिश्ता सह-अस्तित्व और सहकार से चलता है। एक हाथ लेना तो दूसरे हाथ देना। इस वर्तुल को तोड़ना ही जीवन-संधि का उल्लंघन है। आज नदियां प्रदूषित हो गई हैं, तालाब मर रहे हैं। हम पृथ्वी से अपना रिश्ता बिगाड़ रहे हैं। हमने जंगल काट डाले, जमीन खोद डाली, मिट्टी को मृत बना डाला उसमें जीवन छोड़ा ही नहीं। मिट्टी में कीटनाशक इतने डाले कि वह अब खुद मनुष्य को मारने पर उतारु है। हम शायद भूल गए कि जंगल काटने से सिर्फ जंगल ही नहीं कटते हैं, वर्षा भी आनी बंद हो जाती है। धरती से जब एक वृक्ष कटता है तो वह केवल एक पेड़ ही नहीं हटता बल्कि एक पूरी शृंखला (चेन) टूटती है, जो जीवन-शृंखला को चलाती है। पेड़ प्रदत्त सारी चीजें चली जाती हैं। उस पर उगी वनस्पतियां, जड़ी-बूटियां, औषधियां, उस पर आश्रित पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े सबका जीवन विचलित होता है। अगला क्रम बाढ़, मिट्टी विनाश, प्रदूषण, तापमान वृद्धि, सूखा, मरुस्थलीकरण, रेगिस्तानीकरण, वर्षा में अनियमितता, जल-संकट आदि का है। ग्लेशियर पिघलने से समुद्री जल स्तर बढ़ेगा, समग्र जीवन संकटग्रस्त होगा और तरह-तरह की बीमारियां सामने आएंगी। हमारी जीवनशैली से जुड़ी तमाम आदतें जिनमें खानपान, रहन-सहन और पहनावा तक सब शामिल हैं, पृथ्वी पर कार्बन-फुट-प्रिंट का कारण बनती हैं क्योंकि इन सब के लिए ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। इस ऊर्जा के शमन से कार्बन-डाइआक्साइड बनती है, जो धरती को गर्म करती है। एक व्यक्ति दिन, महीने, साल और पूरे जीवन काल में जितनी कार्बन-डाइआक्साइड उत्पन्न करता है, वही उसका कार्बन-फुट-प्रिंट होता है।

    पर्यावरणीय बदलावों की वजह से लोगों में संसाधनों के लिए संघर्ष बढ़ गया है। बरसात के पैटर्न में जो बदलाव हुआ है, उससे खाद्यान्न उत्पादन में कमी आई है और खेती योग्य जमीन के लिए संघर्ष बढ़ गया है। इस तरह के संघर्षों का सबसे नकारात्मक असर गरीबों पर पड़ता है। विकास का आधुनिक वैश्विक मॉडल विस्थापन को बड़े स्तर पर आयोजित कर रहा है। एक स्थान से दूसरे स्थान पर पलायन को मजबूर लोगों को ऐसे विस्थापितों/शरणार्थियों की एक खास श्रेणी के रूप में देखा जा रहा है। सामान्यतः पलायन की जद में पर्यावरणीय कारक ही मुख्य हैं। ‘एन्वारमेंटल रिफ्यूजीज’ जगह-जगह देखे जा रहे हैं। इसका मुख्य कारण पारिस्थिक तंत्र का चरमरा जाना ही है जो जंगलों के कटाव, भूमि क्षरण, जल, मृदा व वायु प्रदूषण, जल स्रोतों का अनुचित दोहन, जैव विविधता का विनाश, समुद्री संसाधनों और पारिस्थितिकी का विनाश तथा प्राकृतिक आपदाओं का परिणाम है। विस्थापन मानसिक स्वास्थ्य को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाले नुकसान में भारत का पांचवां स्थान है। यहां 80 करोड़ लोग गांवों में रहते हैं और जीवनयापन के लिए कृषि और प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित हैं जबकि 50 प्रतिशत जमीन बारिश पर निर्भर है।

    अतः ऐसी तमाम समस्याओं के समाधान की दिशा में एक वैश्विक मॉडल और क्षेत्रीय दृष्टिकोण विकसित करना आवश्यक है। यह भी जरूरी है कि शांतिपूर्ण, सह-अस्तित्व और सहकार वाली क्षेत्रीय भावना का वातावरण बने, जिससे सतत् विकास की संस्कृति का स्फुरण हो सके और पूरी पारिस्थितिकीय व्यवस्था समग्रता में पल्लवित होकर स्थापित हो सके। व्यक्ति-व्यक्ति के बीच तैयार की गई क्षेत्रीय सहयोग की कड़ी और दृष्टिकोण इस दिशा में निर्णायक तत्व बन सकता है। सतत् विकास की समझ धीरे-धीरे समाज में एक पारिस्थितिकीय पोषण की संस्कृति विकसित करने में मददगार बनेगी।

    पर्यावरण हितैषी जीवनशैली के साथ समाज जिए। इसके लिए जल का संरक्षण, ऊर्जा खपत को कम करना, वृक्षों को जल-जंगल-जमीन के रिश्ते से बांधकर प्राकृतिक वन क्षेत्र को अक्षुण्ण बनाए रखने की जरूरत है। तभी पर्यावरण संरक्षित रह सकेगा और मानव का स्वास्थ्य भी। इसके लिए हमें अपनी आदतों में आमूल-चूल बदलाव लाने की जरूरत है। एक ऐसी जीवनशैली विकसित करें जो पर्यावरण का पोषण कर सके। विकास की दिशा सही है तो संसाधनों की दक्षता में वृद्धि होती है; यथाः पानी और ऊर्जा तथा अन्य संसाधनों को उपयोग में लाने के बावजूद उनमें कमी न हो और न ही उत्पादन में कमी आए। तब हम सतत् विकास करते कहे जाएंगे। मनुष्य को ‘जियो और जीने दो’ की प्रकृति प्रदत्त अवधारणा को अंगीकार करना ही होगा जिसके दो मजबूत आधार स्तंभ हैं: सहकार और सह-अस्तित्व। भारतीय चिंतन पद्धति में इसे ही योग कहा गया है। सबके साथ तादात्म स्थापित करना, एकमेव हो जाना ही योग है। इसी से आप प्रकृति के भी करीब आते हैं और अपनी संस्कृति के भी। सबकुछ सदैव संपृक्त है संयुक्त है। इस संयुक्तता में लीन हो जाना ही योग है, ध्यान है, चेतना है, जागरूकता है। इस समन्वय का टूट जाना ही विकृतियों का प्रकटीकरण है, प्रदूषण है, तनाव है, समस्या है और तमाम मानसिक विकृतियां भी हैं। पर्यावरण का अर्थ संपूर्ण का विचार करना है। भारतीय मनीषा हमेशा ‘पूर्ण’ में विचरण करती है। पूर्णता का अहसास ही पर्यावरण है। बस, इतना समझ लीजिए, यही समस्या की पहचान है और यही समाधान भी …और इसी में हमारी बड़ी-बड़ी मानसिक समस्याओं के समाधान के सूत्र भी अंतर्निहित हैं।

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