भारतीय इतिहास की रहस्यमयी परतों को खुलने वाले महान इतिहासकार डॉ रतन लाल वर्मा

20210218_085745

भारतीय इतिहास को विकृतियों के मकड़जाल से मुक्त करने में डॉ रतन लाल वर्मा जैसे महान इतिहासकार का विशेष योगदान रहा है। उन्होंने इतिहास पर शोध परक ग्रंथ लिखे और भारतीय इतिहास में गुर्जर समाज के विशेष योगदान की विशद विवेचना कर इतिहास को समृद्ध करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया ।

श्री वर्मा जी ने अपने ग्रंथों के माध्यम से कई अनसुलझी पहेलियों को बड़ी स्पष्टता से हमारे सामने प्रकट किया। जैसे उन्होंने बताया कि भारतीय इतिहास में राजपूत शब्द 12 वीं शताब्दी के दौरान सुना जाना आरम्भ हुआ । यह ‘राजपूत’ शब्द किसी एक जाति विशेष के लिए न होकर सम्पूर्ण क्षत्रिय जातियों ने अपने एक संघ के रूप में अपने लिए स्वीकृत किया था। इस संबंध में ‘भारतीय संस्कृति के रक्षक’ नामक अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 33 पर श्री रतन लाल वर्मा जी लिखते हैं :- ” तुर्कों के साथ भविष्य में होने वाले आक्रमणों का मुकाबला करने के लिए विभिन्न जातियों के लोगों ने ‘राजपूत’ नामक जातीय संघ बनाया था । क्योंकि ‘राजपूत’ शब्द से उनके राजवंशी होने का बोध होता था । मेरी पहली पुस्तक ‘गुर्जर वीरगाथा’ की भूमिका में प्रसिद्ध राजपूत विद्वान ठाकुर पी0 एन0 सिंह ने राजपूत जाति का बनना (केवल गुर्जरों से ही ) इस प्रकार लिखा है कि शासक वर्ग अर्थात गुर्जर जाति के सैनिकों व अन्य लोगों को अन्य जातियों के लोगों द्वारा आदर के लिए ‘राजपुत्र’ नाम से पुकारा जाता था तथा बाद में यह आदर सूचक शब्द जातिवाचक बन गया । जो कुछ भी हो , परंतु यह सत्य है कि गुर्जरों तथा अनेक अन्य आर्य , अनार्य, दासी पुत्र आदि से मिश्रित ‘राजपूत’ जाति 12 वीं शताब्दी के अन्त में मुसलमानों द्वारा भारत विजय के बाद बनी थी । जिसमें गुर्जर जाति के अधिकांश कुल गोत्रों के अनेक जत्थे मालवा के परमारों की भांति विद्रोही होकर और अन्य कारणों से अपनी जाति छोड़ राजपूत जाति संघ में सम्मिलित हो गए थे। वर्तमान राजपूत जाति में करीब 70% लोग गुर्जर जाति के हैं । परंतु सभी कुल गोत्रों के कुछ लोगों ने विभिन्न जातियों की मिश्रित जाति राजपूत में सम्मिलित होना पसंद नहीं किया । वह अपने गौरवशाली नाम गुर्जर को चिपटे रहे । विशेषकर विघटित गुर्जर सोलंकी साम्राज्य के अंतर्गत गुर्जरों के सभी कुल गोत्रों के जनसाधारण , सैनिक, सामंत सोलंकी सम्राट गुर्जर ही रहे और उनका प्रदेश भी गुजरात ( तत्काल गुर्जर भूमि ) रह गया । जबकि पुराने गुर्जर देश का उत्तर पूर्वी भाग जयपुर, जोधपुर, बीकानेर आदि राजपूत रियासतों के कारण तभी से राजस्थान कहलाया।”
श्री वर्मा जी के द्वारा लिखी गई यह बात बहुत पते की है । इससे भारतीय इतिहास की सही परम्पराओं का तो हमें बोध होता ही है साथ ही यह भी पता पड़ता है कि हमारे क्षत्रिय वंशी शासकों में देश धर्म के लिए एक साथ आने की उस समय कितनी ललक थी ? श्री वर्मा जी द्वारा राजपूत विद्वान लेखक के द्वारा कही गई बात से हम इसलिए सहमत हैं कि भारत में विदेशी आक्रमणकारियों का सामना करने के लिए एक बार नहीं कई बार हमारे वीर हिंदू योद्धाओं ने राष्ट्रीय सेनाओं और गठबंधनों का गठन किया था।
मेरे द्वारा छह खंडों में लिखी गयी “भारत के 1235 वर्षीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास ” नामक ग्रंथ माला से हमें पता चलता है कि भारतवर्ष के क्षत्रिय योद्धाओं ने अपने देश , धर्म व संस्कृति की रक्षार्थ कई बार सैनिक मोर्चा या राष्ट्रीय सेना बनाईं । ऐसे में यदि सभी क्षत्रिय जातियों ने मिलकर ‘राजपूत’ नाम से अपने आपको संबोधित करते हुए एक राष्ट्रीय मोर्चा विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध उस समय खोल लिया हो तो इसमें किसी भी प्रकार की असम्भावना का प्रश्न नहीं उठता ।
वैसे भी आबू पर्वत पर यज्ञ कर जब शंकराचार्य जी ने क्षत्रिय शासकों को या कुलों को अपने साथ लिया था तो उसकी अनिवार्य शर्त भी यही थी कि आप सभी मेरे साथ आकर मुझे इस बात के प्रति आश्वस्त करें कि हम देश को विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षित करेंगे और गुलाम नहीं होने देंगे। अब जबकि 12 वीं शताब्दी के आते-आते विदेशी आक्रमणकारी भारत में कुछ क्षेत्रों पर अपने पैर जमाने में सफल हो गए थे तो स्वभाविक था कि शंकराचार्य जी के समय लिए गए संकल्प में आ रही गिरावट को दृष्टिगत रखते हुए हमारे शासकों में भीतर ही भीतर इस बात का चिंतन चल रहा हो कि एक साथ बैठा जाए और फिर इस बात पर विचार विमर्श किया जाए कि ऐसा क्या किया जा सकता है जिससे विदेशी आक्रमणकारियों को भारत में पैर जमाने से रोका जाए ? तब भारतीय क्षत्रियों के चरित्र के अनुकूल यह बहुत संभव है कि उन्होंने ऐसा किया हो।

इतिहास की इस उपलब्धि को मिले उचित स्थान

इस विचार पर और भी अधिक शोध होना चाहिए । यदि यह सत्य है तो इसे अपने राष्ट्रीय इतिहास में हमारे इतिहासनायकों का महान चरित्र स्वीकार करते हुए उचित स्थान मिलना चाहिए । जिससे यह बात पुष्ट होगी कि हमारे महान पूर्वजों ने 12 वीं शताब्दी के आरम्भ में विदेशियों के द्वारा जब मां भारती को पददलित करने का पैशाचिक कार्य किया जा रहा था तो उसका उन्होंने एकजुटता से सामना किया था। उसके विरुद्ध वे लोग हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठे थे बल्कि उसका सामना करने के लिए संयुक्त मोर्चा बना रहे थे और अपने आपको जातीय भेदभाव से ऊपर उठाकर ‘राजपूत’ नाम से संबोधित कराने में गर्व और गौरव की अनुभूति कर रहे थे । इस प्रकार उस समय हमारे महान पूर्वज अपनी राष्ट्रीय एकता का परिचय दे रहे थे । उन्होंने देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए अपने जातीय भेदभाव को मिटाने का सत्संकल्प लिया और उसके लिए अपनी एक पहचान , एक सोच , एक चाल और एक दिशा निर्धारित की । सचमुच देशहित में ऐसा कोई महान जाति ही कर सकती है । जिसे निश्चित रूप से उन्होंने हिंदुत्व के ध्वज नीचे रहकर करना उचित समझा । अपने आपको राजपूत कहना उनके इस चिंतन को प्रकट करता है कि वह क्षत्रिय परम्परा के प्रतिनिधि बनकर हिंदुत्व के लिए प्राणपण से कार्य करेंगे और किसी भी विदेशी आक्रमणकारी को भारत में पैर नहीं जमाने देंगे । एक प्रकार से सभी शासक लोगों ने ‘राजपूत ‘ शब्द अपने लिए पंथनिरपेक्षता का मार्ग चुना था , जिसे उस समय का क्रांतिकारी निर्णय कहा जाना चाहिए।
याद रहे कि कोई विदेशी इतिहासकार हमारे इतिहास की इस महत्वपूर्ण घटना को कभी नहीं लिखेगा । क्योंकि उसे तो हम लोगों को यही बताना है कि हम तो सदा लड़ते रहे और परस्पर फूट के कारण विदेशियों के सामने हारते रहे । इस घटना को तो हमको स्वयं ही समझना और महिमामंडित करना होगा कि हमने विदेशियों के विरुद्ध उस समय अपना राष्ट्रीय चरित्र प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रीय एकता का प्रमाण दिया था , जब स्वयं को सबने क्षत्रिय का समानार्थक ‘राजपूत’ कहलवाना आरम्भ किया था । इस प्रकार की मान्यता से हमारे जातीय विद्वेष के भाव समाप्त होंगे और हम अपने आपको यह अनुभव करा सकेंगे कि हम सब एक ही मूल की शाखाएं हैं और उसी के लिए समर्पित रहकर काम करते रहने के अभ्यासी रहे हैं।
इस प्रकार की मान्यता को पुष्ट करने से यह भी लाभ होगा कि जो गुर्जर शासक होकर भी अपने आपको राजपूत कहलाने लगे थे वह भारतीय राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित होकर ऐसा लिखने लगे थे , यद्यपि वह मूल रूप में गुर्जर ही थे।
भारतीय इतिहास की इस प्रकार की अनेकों परतों को खोलने वाले महान इतिहासकार स्वर्गीय बाबू रतनलाल वर्मा जी के वंशज सूर्यवंशी इंद्रजीत जी गुर्जर इस समय अनेकों युवाओं के साथ मिलकर डॉक्टर वर्मा जी की विरासत को आगे बढ़ाने का प्रशंसनीय कार्य कर रहे हैं।
हमने अपने कल के लेख में भी श्री वर्मा जी का उल्लेख किया था और भारत सरकार से यह अपेक्षा की थी कि इतिहास के क्षेत्र में महान कार्य करने वाले ऐसे इतिहास लेखकों के लिए विशेष पुरस्कार योजना आरंभ की जानी चाहिए। यह पुरस्कार ऐसा होना चाहिए जो उन्हें राष्ट्रीय व्यक्तित्व का सम्मान प्राप्त कराने में सहयोगी हो ।हम ‘उगता भारत’ परिवार की ओर से भारत सरकार से मांग करते हैं कि श्री वर्मा जी के प्रशंसनीय और महत्वपूर्ण योगदान के दृष्टिगत उन्हें इस प्रकार के पुरस्कार से सर्वप्रथम पुरस्कृत किया जाना चाहिए। जिन्होंने अंधकार के उस युग पर इतिहास लेखन का कार्य किया जिसकी ओर उस समय इतिहास लेखकों को झांकना भी असंभव हो रहा था।
हमारे बीच से इतिहास लेखन का यह महान योद्धा 20 फरवरी 1993 को महाप्रयाण कर गया था । आज हम उनकी पुण्य तिथि के अवसर पर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं। अंत में बस इतना ही कहूंगा :-

तुम दूर कहीं पर बैठे हो हम याद तुम्हारी करते हैं।
तुम उतर हृदय में आते हो जब बात तुम्हारी करते हैं।।

Comment:

Betist
Betist giriş
betplay giriş
Hitbet giriş
Bahsegel giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betpark
betpark
betpark
betpark
betplay giriş
betplay giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
bepark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet giriş
betnano
meritking giriş
meritking giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
betplay giriş
betnano giriş
betplay giriş
betnano giriş
nitrobahis giriş
betplay giriş
roketbet giriş
betcup giriş
betcup giriş
betcup giriş
betcup giriş
betorder giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betorder giriş
betorder giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
rekorbet giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
vdcasino giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
pokerklas giriş
pokerklas giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpark giriş
vaycasino
vaycasino
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
tlcasino giriş
tlcasino giriş