हड़प्पा सभ्यता के बारे में विशेष जानकारी

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हड़प्पा का नाम सुनते ही क्या याद आता है ? पुरानी सभ्यता, भारतीय इतिहास और इन सब का बंटवारे में पकिस्तान चले जाना ? 1947 के बाद से इनपर काफी सर्वे हुआ है | पाकिस्तान में करीब 800 और इसी कालखंड के अवशेषों वाली जगहें मिली थी और भारत में ASI ने करीब 2000 इलाकों की निशानदेही की है | इनमे से 1000 सिर्फ हरयाणा में हैं | जिस इलाके में ये सबसे ज्यादा दिखते हैं उसे घग्गर-हकरा बेसिन कहा जाता है, ये वो इलाका है जिसे कई लोग वेदों में वर्णित सरस्वती नदी का इलाका मानते हैं |


अच्छा अच्छा आपने इस जगह के बारे में नहीं सुना ? इतिहास की किताबों में भी नहीं था क्या ? फिर तो आपको इतिहासकारों से पूछना चाहिए की ये सारा हिस्सा किताबों से कहाँ गया ?

अगर किसी साईट पर जाकर आप लोगों को वहां काम करते देखेंगे तो लगभग सोना छानने जैसा दृश्य दिखेगा | मिट्टी को खोदकर निकाला जाता है और उसके अलग अलग ढेर लगाये जाते हैं | कोयले जैसे टुकड़ों को अलग, हड्डी के नमूनों का अलग, चूड़ियों जैसे टुकड़ों का अलग और बर्तनों के टुकड़ों का अलग वर्गीकरण होता है फिर | भारत की अलग अलग फोरेंसिक लेबोरेटरी में यहाँ से कई संदूक भर भर कर भेजे जा चुके हैं | कैंप में एक छोटा सा म्यूजियम भी है | वहां अक्सर मालविका चैटरजी होती हैं | वो कहती हैं की ज्यादातर गाँव वाले उनके मिट्टी के बर्तनों के शौक पर अचरज जताते हैं | यहाँ से जो चीजें निकली है उनमे कई जानवरों की मूर्तियाँ हैं | हाथी है, चिड़िया है, बैल हैं और गले में पट्टा लगाये एक कुत्ता भी है | हड़प्पा वाले कुत्ते पालते थे ! आश्चर्य !

प्रोफेसर वसंत शिंदे हड़प्पा के जानकारों में जाने माने नाम हैं | पुणे यूनिवर्सिटी के डेक्कन कॉलेज के ये प्रोफेसर इस खुदाई अभियान के प्रमुख हैं | उनके हिसाब से 5500 से 5000 BCE की तारीखें मिल रही हैं और उस से पहले की भी | जहाँ तक वो मान के चले थे ये सभ्यता उस से कम से कम 1000 साल पुरानी है | अब ये तो इतिहास की हमारी अवधारणा के बारे में काफी कुछ बदल देगा | करीब दो तिहाई खुदाई की जगहें उस इलाके में मिली हैं जिसे सरस्वती नदी का बेसिन माना जाता है | प्रोफेसर शिंदे ये ढूँढने में जुटे हैं की कैसे प्रारंभिक, मध्य और उन्नत रूप में ये सभ्यता आगे बढ़ी, खेती करने वाले छोटे समुदायों से ये विकसित नगरों तक पहुंचे कैसे ? प्रोफेसर शिंदे का मानना है की ये लोग बड़े निर्माण में सक्षम थे और अपने संसाधनों का इस्तेमाल सबके लिए सामान्य सुविधाएँ बनाने में करते थे |

जैसे जैसे नयी खोजे होती जाती हैं वैसे वैसे पता चलता जाता है की ये एक काफी तेज़ी से बदली सभ्यता थी | शुरू में इतिहासकारों का ध्यान उनके शहरों / गाँव की स्थिति का पता लगाना था, फिर उनके शहरों की योजना और लोगों के दिनचर्या पर ध्यान गया | हड़प्पा के लोग शायद पुनर्जन्म में विश्वास करते थे | वहां एक जगह चार कंकाल भी मिले हैं, उनके साथ ही कुछ बर्तनों में खाने के अवसेश भी थे | इनमे दो पुरुष कंकाल हैं, एक महिला का है और एक बच्चे का | साउथ कोरिया की सीओल नेशनल यूनिवर्सिटी के साथ इनपर DNA की जांच का काम चल रहा है | इसके पूरा होते ही ये बताया जा सकेगा की हड़प्पा की सभ्यता के लोग कौन थे | अगर वो कहीं और से आये थे तो कहाँ के थे ? मध्य या पश्चिमी एशिया के थे क्या ? हड़प्पा के लोग दिखते कैसे थे ? हरयाणा और पंजाब के लोग क्या हड़प्पा के लोगों के वंशज हैं ? खाते क्या थे ? कौन सी बीमारियाँ होती थी उन्हें ?

DNA की जांच में संभावनाएं तो अपार है | रहा किताबों में हरियाणा के राखिगढ़ी का जिक्र, तो ये उन बहुत से मुद्दों में से है जिसपर एक पूर्व प्रधानमंत्री कहते थे की भारतीय लोगों को शर्म आती थी |

शर्म आती होगी तभी तो किताबों में नहीं लिखा न ? वरना ढूंढ तो इस जगह को 1963 में ही लिया था ?
✍🏻आनन्द कुमार

कृष्ण विष्णु के अन्य कई अवतारों जैसे अंशावतार नहीं होते | वो पूर्णावतार हैं | एक साथ ही वो कई रूपों में दिखते हैं, चतुर्भुज, शंख-चक्र-पद्म-गदा धारी है तो सखा भी हैं | राधा, सत्यभामा, रुक्मिणी के प्रेमी-पति हैं तो भगवद्गीता के दार्शनिक सखा भी हैं | महाभारत के हिसाब से वो एक राजनीतिज्ञ और योद्धा होते हैं | पुराणों में वो लीलाधर हो जाते हैं |

महाभारत में कृष्ण का जिक्र आदि पर्व से शुरू होता है | उनके बाल काल का वहां वर्णन नहीं है | मगर कृष्ण स्वयं ही कहते हैं कि अगर गीता को समझना है तो उनके पूरे जीवन को देखना होगा | उनकी बाल लीलाओं का वर्णन भागवत और महाभारत का आखरी हिस्सा माने जाने वाले हरिवंश पुराण में है |

इन दोनों पुराणों में यमलार्जुन नाम का प्रसंग आता है | वो कहानी लगभग सभी को पता है | रोज रोज की कृष्ण की शिकायतों से परेशान माता यशोदा एक दिन बाल-कृष्ण को एक उखल में बाँध देती हैं | माता की नजर हटते ही कृष्ण उखल घसीट का ले चले | थोड़ी दूर में दो यमल और अर्जुन के यानि यमलार्जुन का वृक्ष था |

कृष्ण ने उनमें उखल फंसाया और लगे खींचने ! उनके खींचने से पेड़ उखड़ गए और दो गंधर्व नलकूबर और मणिग्रीव प्रकट हुए | दोनों गंधर्व शाप के कारण वृक्ष हो गए थे और कृष्ण ने उन्हें मुक्ति दे दी थी | ये किस्सा पौराणिक है, ऐतिहासिक नहीं है | आश्चर्यजनक रूप से ये मोहनजोदड़ो की खुदाई में भी मिला है |

डॉ. इ.जे.एच. मक्के जब मोहनजोदड़ो की खुदाई कर रहे थे तो उन्हें एक साबुन पत्थर का बना टेबलेट मिला | ये लरकाना, सिंध में मिला पत्थर का टेबलेट यमलार्जुन प्रसंग दर्शाता है | बाद में प्रोफेसर वी.एस. अग्रवाल ने भी इसकी पहचान इसी रूप में की है | प्लेट नंबर 90, ऑब्जेक्ट नंबर डी.के. 10237 के नाम से जाने जाने वाले इस टेबलेट का जिक्र कई किताबों में है |

वासुदेव शरण अग्रवाल सहित कई विद्वानों और इतिहासकारों की किताबों में Mackay report Page 334-335 पर वर्णित plate no.90, object no. D.K.10237 का जिक्र आता है | ऐसा कहा जा सकता है कि सिन्धु घाटी सभ्यता के लोगों को कृष्ण सम्बन्धी कथाओं का पता था | बाकी आपको इस प्लेट के बारे में क्यों नहीं बताया गया ये तो कृष्ण ही जानें ! राधे-कृष्ण, राधे-कृष्ण !!
✍🏻सुगन्धा शर्मा

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