कोरोना में भारत सबसे बड़ी विश्व शक्ति बनकर उभरा

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

भारतीयों टीकों का इस्तेमाल अपने पड़ोसी देशों में भी जमकर होगा। पाकिस्तान के अलावा दक्षेस के सभी राष्ट्र आस लगाए बैठे हैं कि भारतीय टीका उनका उद्धार करेगा। वह सस्ता भी है और उसे सहेजना भी आसान है। भारत इन पड़ोसी देशों को लगभग एक करोड़ टीके शीघ्र देने वाला है।

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कोरोना टीकाकरण अभियान भारत में शुरू हो चुका है। यह अभियान नहीं, युद्ध है। युद्ध से भी बड़ी तैयारी इस अभियान के लिए भारत सरकार और हमारे वैज्ञानिकों की है। यह दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण होगा। 30 करोड़ से ज्यादा लोगों को यह टीका जुलाई तक लगा दिया जाएगा। 30 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाले देश भारत के अलावा सारी दुनिया में सिर्फ दो हैं- अमेरिका और चीन, लेकिन इन दोनों के मुकाबले भारत में कोरोना काफी कम फैला है, क्योंकि भारत के खान-पान में ही जबर्दस्त रोग-प्रतिरोधक क्षमता है। कोरोना से युद्ध में भारत को इसलिए भी गर्व होना चाहिए कि सबसे पहले वह अपने उन 3 करोड़ लोगों को यह टीका मुफ्त लगा रहा है, जो स्वास्थ्य और सेवाकर्मी हैं और उनमें से कइयों ने जन-सेवा करते हुए अपना बलिदान किया है।

यों तो अलग-अलग संक्रामक बीमारियों के लिए टीके बनाने में भारत दुनिया का सबसे अग्रगण्य राष्ट्र है लेकिन आजकल बने उसके दो टीकों पर तरह-तरह के संदेह किए जा रहे हैं और उन्हें लेकर राजनीतिक फुटबाल भी खेला जा रहा है। यदि विपक्षी नेता इन दो भारतीयों टीकों- कोवेक्सीन और कोविशील्ड की प्रामाणिकता पर संदेह न करें तो वे विपक्षी ही क्या हुए? उनका संदेह लाभप्रद है। वह सरकार और वैज्ञानिकों को अधिक सावधान बनाएगा। पिछले तीन दिनों में चार लाख लोगों को ये टीक लगा दिए गए हैं। मुश्किल से 500 लोगों को थोड़ी-बहुत तकलीफ हुई है। वह भी अपने आप ठीक हो गई है। चार-पांच लोगों के मरने की खबर भी है लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि उसका कारण टीका नहीं है। वे लोग पहले से ही गंभीर रोगों से ग्रस्त थे।

लेकिन अफवाहें आग की तरह फैलती हैं। टीकाकरण के तीसरे दिन टीका लगाने वालों की संख्या काफी घट गई है। यह ठीक नहीं है। यदि टीके की प्रामाणिकता संदेहास्पद होती तो आप ही बताइए कि ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के निदेशक को क्या इसका पता नहीं होता ? उन्होंने आगे होकर यह टीका पहले ही दिन क्यों लगवाया ? नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) और पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट के कर्ता-धर्ता ने पहले ही दिन टीका लगवाया, यह किस बात का प्रमाण है ? क्या यह इसका प्रमाण नहीं है कि देश के सर्वोच्च स्वास्थ्यकर्मियों ने अपने आपको टीके की कसौटी पर कस कर दिखा दिया ?

कुछ विपक्षी नेता पूछते हैं कि यह टीका राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने सबसे पहले क्यों नहीं लगवाया ? मेरी अपनी राय थी कि वे यदि सबसे पहले लगवाते तो देश के करोड़ों लोगों को प्रेरणा मिलती, जैसे कि अमेरिका के नेता जो बाइडन, पोप और ब्रिटेन की महारानी ने लगाया था लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह विचार भी तर्कसंगत है कि नेताओं की बारी बाद में आएगी, पहले स्वास्थ्यकर्मियों को मौका मिलना चाहिए। किसी भी बात का फायदा उठाने में नेतागण हमेशा सबके आगे रहते हैं, इस दृष्टि से मोदी की सोच ठीक है लेकिन सिर्फ वे स्वयं और राष्ट्रपति टीका सबसे पहले लेते तो देश के करोड़ों लोगों के मन में इस टीके के प्रति उत्साह जागृत हो जाता। इसके लिए अभी भी मौका है।

वैसे स्वास्थ्यकर्मियों के बाद यदि नेताओं को यह टीका लगे तो वह इस दृष्टि से उचित होगा कि नेता लोग सबसे अधिक जन-सम्पर्क में रहते हैं। उन्हें कोरोना का शिकार होने में देर नहीं लगती। इसके अलावा देश की पंचायतें, नगर निगम, विधानसभाएँ और संसद का जो काम ढीला पड़ गया है, उसमें भी गति आ जाएगी। यदि कृषि-कानूनों पर संसद लंबी बहस करती तो क्या सरकार को इस किसान आंदोलन के दिन देखने पड़ते ?

सरकार के सामने यह भी बड़ा प्रश्न है कि 140 करोड़ लोगों में अब सबसे पहले किन-किन लोगों को यह टीका दिया जाए? स्वास्थ्यकर्मियों के बाद अब यह टीका उन लोगों को दिया जाएगा, जिनकी उम्र 50 साल से ज्यादा है, क्योंकि उन्हें कोरोना का खतरा ज्यादा होता है। यदि इन लोगों को यह टीका मुफ्त या कम कीमत पर दिया जाए तो ज्यादा अच्छा है, क्योंकि इस वर्ग में मजदूर, किसान, ग्रामीण और गरीब लोगों की संख्या ज्यादा है। यों भी ये भारतीय टीके दुनिया के सबसे सस्ते टीके हैं। विदेशी टीकों की कीमत 5 से 10 हजार रु. तक है जबकि हमारे टीके दो सौ से तीन सौ रु. तक में ही मिल जाएंगे। सरकार चाहे तो इन्हीं टीकों को निजी अस्पतालों को हजार-डेढ़ हजार रु. में बेचकर उस पैसे का इस्तेमाल मुफ्त टीके बांटने में कर सकती है।

वैसे भी पिछले दो-तीन हफ्तों में देश के लगभग सभी प्रदेशों से उत्साहजनक खबरें आ रही हैं। जिन अस्पतालों में इस महामारी के मरीजों के लिए विशेष बिस्तर लगवाए गए थे, वे अब खाली पड़े रहते हैं। जो निजी डॉक्टर और नर्सें पहले अपने अस्पतालों में आने से घबराते थे, वे अब आने लगे हैं। अब स्कूल-कॉलेज भी खुलने लगे हैं। सड़कों और बाजा़रों में भी चहल-पहल बढ़ गई है। हो सकता है कि भारत का काम 30 करोड़ टीकों से ही चल जाए।

इन भारतीयों टीकों का इस्तेमाल अपने पड़ौसी देशों में भी जमकर होगा। पाकिस्तान के अलावा दक्षेस के सभी राष्ट्र आस लगाए बैठे हैं कि भारतीय टीका उनका उद्धार करेगा। वह सस्ता भी है और उसे सहेजना भी आसान है। भारत इन पड़ौसी देशों को लगभग एक करोड़ टीके शीघ्र देने वाला है। भारत के इन दोनों टीकों ने दुनिया में धूम मचा दी है। दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील भी इन्हें मंगा रहे हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि पाकिस्तान भी एक-दो दिन में इसकी मांग करने लगे। यह भी हो सकता है कि वह काबुल या दुबई से होकर इन्हें मंगवा ले। कोरोना का यह टीका दुनिया में भारत की छवि को चमकाए बिना नहीं रहेगा।

कोरोना-युद्ध में भारत सबसे बड़ी विश्वशक्ति बनकर उभरेगा। उसके आम लोगों की सावधानियां, उसकी भोजन-पद्धति, उसके आयुर्वेदिक काढ़े, उसके टीके और उसके स्वास्थ्य-कर्मियों की साहसिक सेवाओं ने कोरोना महामारी को मात देने की पूरी तैयारी कर रखी है।

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