जीवात्मा का जन्म मरण और आवागमन अनादि काल से चला आ रहा है

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ओ३म्

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मनुष्य जन्म व मरण भोग एवं अपवर्ग की प्राप्ति के लिए प्राप्त एक सुअवसर होता है। यह अवसर सनातन, शाश्वत, अनादि व नित्य आत्मा को परमात्मा प्रदान करते हैं। मनुष्य योनि में जन्म लेकर चेतन व अल्पज्ञ जीवात्मा को अपने माता, पिता, आचार्यों सहित परमात्मा के अपौरुषेय ज्ञान चार वेदों की सहायता तथा ईश्वरोपासना आदि कार्यों से ज्ञान को प्राप्त होकर मुमुक्षुत्व के कर्म करने होते हैं। इससे मनुष्य का आत्मा जन्म-मरण अथवा आवागमन के चक्र से छूट कर मुक्ति वा मोक्ष को प्राप्त होता है। मुक्ति की आवश्यकता इसलिये है कि जन्म व मरण किसी भी योनि व किसी भी उत्तम परिवेश में क्यों न हो, जीवात्मा को नाना प्रकार के दुःख भोगने ही पड़ते हैं। माता के गर्भ में दस मास तक उल्टा लटका रहना होता है। यह भी दुःख है जिससे जीव छूटना चाहते हैं। जन्म के बाद शैशव व बाल्य काल में भी अनेक प्रकार के दुःख होते हैं। सब शिशुओं व बालकों की अपनी अपनी परिस्थितियां होती हैं। किसी का पालन धार्मिक व पवित्र वातावरण में होता है तो बहुतों को अच्छा वातावरण नहीं मिलता। अभावग्रस्त सन्तानें व माता पिता क्लेश को प्राप्त होते हैं।

मनुष्य को जन्म से मृत्यु पर्यन्त सर्दी व गरमी तथा रोग आदि भी दुःख देते रहते हैं। मृत्यु तो दुःख रूप होती ही है। अपने प्रिय जनों को भी कई बार हमें उनकी मृत्यु होने पर विदा करना होता है, यह भी दुःख उत्पन्न करता है। अतः जीवात्मा को होने वाले सभी दुःखों से मुक्ति की कामना तो सभी जीवों को समान रूप से होती ही है परन्तु इसकी प्राप्ति का ज्ञान उन्हीं को होता है जो वेद, वैदिक साहित्य तथा ऋषि दयानन्द के ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश आदि को पढ़ते हैं। वेदाध्ययन से मनुष्य की सभी भ्रान्तियां दूर हो जाती है। उसको अपने जीवन के लक्ष्य भोग, अपवर्ग व मोक्ष प्राप्ति का ज्ञान भी हो जाता है। मोक्ष प्राप्ति के जो साधन हैं उनका ज्ञान भी हमें वैदिक साहित्य के अध्ययन यथा दर्शन एवं सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर हो जाता है। हमारे सम्मुख ऋषि दयानन्द और अनेक वेद विश्वासी महापुरुषो के जीवन चरित हैं। इनका जीवन भी हमारे लिये आदर्श एवं अनुकरणीय होता है। अतः अपने भीतर वेद व वैदिक ग्रन्थों के स्वाध्याय के प्रति रूचि को उत्पन्न कर हम अपने जीवन के लक्ष्य मोक्ष व उसकी प्राप्ति के साधनों को जान सकते हैं और साधना के द्वारा साध्य लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त भी कर सकते हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि मोक्ष प्राप्ति में कितना समय व कितने जन्म लगेंगे, परन्तु सत्य संकल्प कर लेने और उसके अनुसार साधनायुक्त जीवन व्यतीत करने से हमें कालान्तर में लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। यदि किसी कारण लक्ष्य की प्राप्ति न भी हो तो भी हमारी आत्मा की उन्नति होकर हम अधिकांश दुःखों से बच सकते हैं और लक्ष्य के निकट पहुंच सकते हैं। ऐसा होना भी आत्मा की एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती है।

ऋषि दयानन्द ने जन्म, मरण, स्वर्ग, नरक तथा मुक्ति आदि का स्वरूप परिभाषित किया है। जन्म क्या होता है इसे बताते हुए वह आर्योद्देश्यरत्नमाला लघु पुस्तक में लिखते हैं कि जिसमें किसी शरीर के साथ संयुक्त होके जीव कर्म करने में समर्थ होता है, उसको‘जन्म’ कहते हैं। मरण के विषय में उनका कहना है कि जिस शरीर को प्राप्त होकर जीव क्रिया करता है, उस शरीर और जीव का किसी काल में जो वियोग हो जाना है, उसको‘मरण’ कहते हैं। जब मनुष्य योनि व अन्य किसी भी योनि में जन्म होता है तो उसमें आत्मा का शरीर से संयोग होता है, आत्मा उत्पन्न नहीं होता है। जीव का स्वरूप बताते हुए ऋषि दयानन्द कहते हैं कि जो चेतन, अल्पज्ञ, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान गुणवाला तथा नित्य है, वह‘जीव’ कहाता है। जीव आत्मा को कहा जाता है परन्तु जीव का प्रयोग बोलचाल में बहुत कम होता है। जीव और आत्मा एक ही सत्ता व पदार्थ के नाम हैं। यह हमें ज्ञात होना चाहिये। जीव के जो गुण, कर्म व स्वरूप आदि बतायें गये हैं वह सभी हमारी आत्मा में घटते हैं। अतः हमें आत्मा व जीव को इसी स्वरूप में जानना चाहिये।

जीव अनादि व नित्य स्वरूप वाला है। यह न कभी उत्पन्न हुआ है और न कभी नाश वा अभाव को प्राप्त होता है। अतः सदा सर्वदा इसका अस्तित्व बना रहता है। अनादि काल पूर्व यह जैसा था वैसा ही आज भी है और अनन्त काल बाद भी यह जैसा आज है, वैसा ही रहेगा। इस जीवात्मा को भोग व अपवर्ग=मोक्ष प्राप्ति के लिये परमात्मा जन्म व मरण के चक्र में घुमाते हैं। जीवन जीने व मोक्ष रूपी कल्याण को प्राप्त करने के लिये ही परमात्मा को सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों को वेदों का ज्ञान दिया था। वेद में ईश्वर, जीव व प्रकृति की सत्ताओं सहित इनके गुण, कर्म व स्वभाव पर प्रकाश डाला गया है। मनुष्य के कर्तव्यों, व्यवहार व आचरण का विस्तृत ज्ञान भी वेदों से मिलता है। ऋषि दयानन्द ने कहा है कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। इस कारण वह वेदों के अध्ययन व अध्यापन को सभी मनुष्यों के लिए अनिवार्य करते हैं और ऐसा करना मनुष्य का परम धर्म बताते हैं। वेदों से ही हमें ईश्वर, जीव व प्रकृति के अनादित्व, अमरत्व, नित्यत्व, भाव तत्व होने तथा इनके गुण, कर्म व स्वभाव का ज्ञान प्राप्त हुआ है जो सर्वथा सत्य, निभ्र्रान्त व सृष्टि में विद्यमान दृष्टिगोचर होता है।

मुक्ति क्या होती है, इस पर भी ध्यान देते हैं। ऋषि दयानन्द के अनुसार मुक्ति अर्थात् जिससे सब बुरे कामों और जन्म-मरणादि दुःख सागर से छूटकर, सुखरूप परमेश्वर को प्राप्त होके सुख में ही रहना है, वह‘मुक्ति’ कहलाती है। वेद एवं ऋषियों का यह भी मानना है कि मुक्ति एक जन्म में नहीं होती। इसके लिये हमें अपने सभी पाप व अशुभ कर्मों का भोग कर उन्हें निष्क्रिय व निष्प्रभावी करना होता है। इसके साथ ही ईश्वरोपासना, देवयज्ञ अग्निहोत्र आदि पंचमहायज्ञों एवं सभी परोपकार, दान आदि सत्कर्मों को करके ईश्वर का साक्षात्कार करना होता है। इस कार्य में अनेकानेक जन्म लग जाते हैं। इससे भी पुनर्जन्म व आवागमन का सिद्धान्त सत्य सिद्ध होता है। यदि हम पुनर्जन्म को स्वीकार करेंगे तभी मुक्ति का सिद्धान्त भी सत्य होगा। मुक्ति का सिद्धान्त क्योंकि तर्क एवं युक्तियों से पोषित है, अतः यह असत्य व अन्यथा नहीं हो सकता। अतः मनुष्य को जन्म-मरण चक्र, अवागमन व पुनर्जन्म के सिद्धान्त में विश्वास रखते हुए वेद आदि ऋषियों के बनायें सत्शास्त्रों में भी विश्वास रखना चाहिये। ऐसा करके ही हम ईश्वर व जीवात्मा आदि को जानकर जीवन के उद्देश्य दुःखों की निवृत्ति व सुख व आनन्द की प्राप्ति, जो सदा बनी रहे, प्राप्त हो सकते हैं।

पुनर्जन्म की चर्चा करने पर मुख्य आपित्त यह की जाती है कि यदि पुनर्जन्म सत्य है तो हमें पूर्वजन्म की स्मृति क्यों नहीं है। इसके अनेक कारण व उत्तर हैं। जीवात्मा एकदेशी, ससीम तथा अल्पज्ञ है। इसका पुरानी बातों को भूलने का स्वभाव होता है। हम किसी से बात कर रहे हों। पांच मिनट वार्ता करने के बाद हम अपनी कही बातों को शब्दशः दोहरा नहीं सकते। इसका कारण विस्मृति का होना होता है। हमने एक दिन, दो दिन व तीन दिन पहले कब क्या खाया, किससे मिले, किस रंग के कौन कौन से वस्त्र पहने तथा क्या क्या विचार किया वह भी हमें स्मरण नहीं रहता। विचार करते हुए हमारे मन में अनेक विचार आते हैं। कुछ बातें हमें अच्छी लगती हैं। कुछ ही देर बाद जब हम किसी विशेष अच्छी व उपयोगी बात को स्मरण करते हैं तो अनेक प्रयत्न करने पर भी वह बात स्मरण नहीं आती। कुछ बातों का स्मरण होता भी है परन्तु हम जिस विशेष बात को स्मरण करने का प्रयत्न करते हैं वह हमारे मन में स्मरण नहीं आती। ऐसा हमारा निजी अनुभव है। ऐसा हमें लेखों के शीर्षक निर्धारित करते हुए प्रायः होता है। यदि उसी समय हम उसे नोट कर लें तब वह बात उसे देख कर स्मरण आ जाती है। इससे सिद्ध होता है कि मनुष्य की साथ साथ ही भूलने की प्रवृत्ति होती है। मनुष्य के दो जन्मों के बीच एक मृत्यु भी आती है। मृत्यु में हमारा पुराना शरीर छूट जाता है। पुराने शरीर के इन्द्रियों के सभी गोलक व अवयव नष्ट हो जाते हैं। आत्मा पर, जो कि अत्यन्त सूक्ष्म है, उस पर हमारे पूर्वजन्म व इस जन्म के कर्मों के संस्कार अंकित रहते हैं। उनकी स्मृति देश काल व परिस्थितयों के अनुरूप ही हुआ करती है। जिस प्रकार वृक्ष व फल फूल का बीज उपयुक्त भूमि, जल व सूर्य के प्रकाश में ही उद्बुध होता व उगता है उसी प्रकार से आत्मा पर अंकित संस्कार उपयुक्त पृष्ठ भूमि में ही किंही किंही को स्मरण होते हैं। विस्मृति का होना उस घटना का घटित न होना नहीं कहा जा सकता। हमारा पूर्वजन्म हमें विस्मृति होने के कारण स्मरण नहीं रहता है। अतः हमें आत्मा को अनादि व नित्य मानने सहित इसके निरन्तर जन्मों को भी मानना चाहिये। प्रलयावस्था में जीवात्मा के जन्म व मरण का क्रम रुका रहता है तथा शेष कालों में इसका जन्म व मरण का चक्र निरन्तर चलता रहता है।

पूर्वजन्म का स्मरण न होने का एक कारण यह भी होता है कि मन को एक समय में एक ही विषय का ज्ञान होता है। वह दो विषयों को एक साथ नहीं जान सकता। मन को सदैव वर्तमान की बातों का ज्ञान रहता है। मनुष्य का जिस कार्य में मन लगा होता है उसी का ज्ञान उसको होता है। उसके सामने से बारात भी निकल जाये तो उसे पता नहीं चलता। ऐसे उदाहरण हमने अनेक प्रवचनों में सुने हैं। इस कारण अतीत की बातें उसकी स्मृति व व्यवहार में नहीं होती हैं। ऐसा कहा जाता है कि सिद्ध योगी अपने मन को एकाग्र करके पूर्व घटित पुनर्जन्म आदि की बातों को जान सकते हैं। परन्तु यह ऐसा विषय है कि यह कुछ सिद्ध योगियों के लिये ही सम्भव हो सकता है। साधारण जन इस विषय में सफल नहीं हो सकते। हमारा कर्तव्य है कि हम ईश्वर, वेद, ऋषियों व उनके ग्रन्थों का विश्वास करें और पुनर्जन्म को सत्य स्वीकार करें। यदि हम पुनर्जन्म को स्वीकार नहीं करेंगे तो ईश्वर व आत्मा का अनादि व नित्य होने का सिद्धान्त भी टिक नहीं पायेगा। जिस प्रकार ईश्वर, जीव व प्रकृति का अनादि, नित्य तथा अमर होना सत्य है उसी प्रकार से पुनर्जन्म का सिद्धान्त भी सर्वथा सत्य एवं सन्देह से रहित है। इसके लिये ऋषि दयानन्द का जन्म विषयक प्रवचन जो उन्होंने दिनांक 17-7-1875 को पुणे में दिया था, उसका अध्ययन करना चाहिये। ऋषि दयानन्द ने इस जीवन में जो महान कार्य किये व ऋषित्व प्राप्त किया, उसे एक जन्म में प्राप्त करना किसी के लिए भी सम्भव नहीं होता। यदि पूर्वजन्म न होता तो सभी के गुण, कर्म व स्वभाव व योग्यता एक समान होती और उनकी आकृति, स्मृति तथा योग्यता आदि में किंचित भी भेद न होता। जन्म आदि की सबकी परिस्थितियां भी सबकी समान होती। अतः पुनर्जन्म का सिद्धान्त सत्य एवं निभ्र्रान्त सिद्धान्त है। पुनर्जन्म का कारण हमारे पूर्वजन्म के कर्म होते हैं जिनका भोग एवं अपवर्ग के लिये हमारा मनुष्य जन्म होता है। जो इसे नहीं मानते उन्हें अपनी अविद्या दूर करनी चाहिये। इसी में सबका हित है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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