आयुर्वेद में घी को माना गया है एक नित्य सेवन योग्य रसायन

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डॉ. दीप नारायण पाण्डेय

भोजन में प्रतिदिन घी खाना चाहिये या नहीं? इस प्रश्न का उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि आप किससे पूछ रहे हैं। लम्बे समय तक कहा गया कि वसा का अधिक सेवन मोटापे, मधुमेह, हृदय रोग, और संभवत: कैंसर का कारण बनता है। हाल ही में परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट के प्रतिकूल चयापचयी प्रभावों के प्रमाण मिलने के कारण अधिक वसा व कम कार्बोहाइड्रेट और केटोजेनिक आहार का सुझाव दिया जाने लगा। कुछ विद्वानों का तर्क कि आहार में वसा और कार्बोहाइड्रेट की सापेक्ष मात्रा स्वास्थ्य के लिये उतनी प्रासंगिक नहीं है जितनी कि वसा या कार्बोहाइड्रेट किन स्रोतों से प्राप्त किया जाता है।

आज की चर्चा घी खाने-पीने के सन्दर्भ में आधुनिक वैज्ञानिक शोध, पोषण-वैज्ञानिकों की राय, आयुर्वेद की संहिताओं और अपने अनुभव के बीच व्यापक सर्वसम्मति को ध्यान में रखते हुये वर्तमान में उपलब्ध प्रमाणों का सारांश प्रस्तुत करती है।

घी खाने या न खाने की सलाह पर विज्ञान बड़ा गड्डमड्ड दृश्य प्रस्तुत करता आया है। आइये एक प्रकरण देखते हैं। वर्ष 1977 में एक रिपोर्ट में अमेरिकियों को अपने आहार में कुल वसा और संतृप्त वसा की खपत को कम करने, कार्बोहाइड्रेट का सेवन बढ़ाने और अन्य आहार लक्ष्यों के साथ कम कैलोरी वाले भोजन लेने की सलाह जारी की गयी थी। परिणाम यह रहा कि वर्ष 1970 के दशक में जहाँ अमेरिकी आहार में वसा का अनुपात लगभग 42 प्रतिशत था वह आज घटकर कुल कैलोरी का लगभग 34 प्रतिशत रह गया और आहार में कार्बोहाइड्रेट का अनुपात बहुत हद तक बढ़ गया। लेकिन पचड़ा यह खड़ा हो गया कि इसी समयावधि में मोटापा और मधुमेह की दर में भारी वृद्धि हुई। बात यहाँ तक पहुँच गयी कि लगभग 100 साल पहले फ्लू महामारी के समय के बाद से अमेरिकियों की जीवन-प्रत्याशा में पहली बार राष्ट्रव्यापी कमी हुयी। हालांकि यह पता नहीं लग पाया है कि ये रुझान क्या वसा या कार्बोहाइड्रेट से जुड़े हैं या असंबंधित हैं।

परन्तु हाल में हुई शोध समीक्षाओं और मेटा-विश्लेषणों का निष्कर्ष अब स्पष्ट करता है कि भोजन में वसा व घी की मात्रा कम करने की बज़ाय यदि कार्बोहाइड्रेट की मात्रा को कम किया जाये तो मोटापा व वजन—जो तमाम रोगों की जड़ है—घटाने में मदद मिलती है (देखें, साइंस, 362:764-770, 2018)। दूसरी ओर इंसुलिन संवेदनशीलता वाले व्यक्तियों के लिये कम वसा या कम कार्बोहाइड्रेट वाला भोजन एक जैसा प्रभाव डालता है। लेकिन इंसुलिन प्रतिरोध, ग्लूकोज असहिष्णुता, या इंसुलिन हाइपरसेक्रीशन वाले लोगों में कम कार्बोहाइड्रेट व उच्च वसा वाला भोजन तुलनात्मक रूप से मोटापा अधिक घटा सकता है। कीटोजेनिक भोजन में वसा या घी की अधिक मात्रा, वसा की तुलना में कम प्रोटीन, और अंतत: अत्यल्प कार्बोहाइड्रेट होते हैं। मेटाबोलिक सिंड्रोम में अधिक एडिपोसिटी, परिसंचरण में ट्राइग्लिसराइड्स की उच्च सांद्रता, एच.डी.एल. कोलेस्ट्रॉल का निम्न स्तर, उच्च रक्तचाप, ग्लूकोज-असहिष्णुता, फैटी-लीवर और शरीर के अंगों में दर्द जैसी समस्यायें शामिल हैं। यही इंसुलिन प्रतिरोध के जोखिम भी हैं, जिनके कारण अंतत: मधुमेह और हृदयरोग का जोखिम बढ़ जाता है। भोजन में वसा या घी आदि कम करने के बजाय यदि कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम की जाये तो इन संकेतकों में अधिक प्रभावी ढंग से सुधार लाया जा सकता है।

आइये सबसे भारी शोध की बात करें। वर्ष 2018 में विश्व के 5 महाद्वीपों और 21 देशों में 2003 से 2018 के दौरान की गयी शोध का, विश्व की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रिका लैंसेट में प्रकाशन, अब निर्विवाद सिद्ध करता है कि घी दूध जैसे डेयरी उत्पाद खाने वालों को दिल का रोग कम होता है (लैंसेट, 392: 2288-2297, 2018)। इस शोध में कुल 10567 समग्र घटनाओं और हृदय संबंधी प्रमुख घटनाओं को आँका गया। शोध के निष्कर्ष स्पष्ट करते हैं कि कुल डेयरी का सेवन अर्थात न खाने की तुलना में प्रति दिन 2 सर्विंग्स खाने से समग्र परिणाम, कुल मृत्यु दर, गैर-हृदय रोगों से मृत्यु दर, हृदय रोगों से मृत्यु दर, प्रमुख हृदय रोगों और स्ट्रोक आदि सभी का जोखिम कम पाया गया। घी-दूध आदि खाने का मायोकार्डियल इन्फ्रैक्शन के साथ कोई महत्वपूर्ण संबंध नहीं देखा गया। दूध और दही बिलकुल न लेने की तुलना में अधिक लेने से समग्र परिणामों के जोखिम भी कम हुये। जबकि चीज़-पनीर आदि के सेवन का समग्र परिणामों के साथ कोई सम्बन्ध नहीं पाया गया। अब घी-दूध के पक्ष में इससे बड़ी कौन सी रिसर्च चाहिये।

आयुर्वेद के अनुसार घी नित्य सेवनीय रसायन है। घी के प्रयोग से दीर्घायु, व्याधिक्षमत्व में वृद्धि, अग्नि या पाचन क्रिया की साम्यता, ओजस में वृद्धि, शरीर के सभी ऊतकों या धातुओं का पोषण, याददाश्त में बेहतरी, मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र की मजबूती, संयोजी ऊतकों में चिकनाई बढऩे से शरीर में लोच या लचीलापन, वात और पित्त का प्रशमन होता है। सूत्र तो बहुत हैं पर उन सबका निचोड़ इस सूत्र में समाहित है कि दूध और घी का नित्य सेवन श्रेष्ठतम रसायन है (च.सू.25.40): क्षीरघृताभ्यासो रसायनानां श्रेष्ठम्। घी में गाय का घी श्रेष्ठतम है (च.सू.25.38): गव्यं सर्पि: सर्पिषाम्। महर्षि-वैज्ञानिक अग्निवेश के दिग्गज सहपाठी महर्षि भेल आत्रेय के छ: शिष्यों में से एक थे। उनका कहना कहना है कि दूध घी का नित्य सेवन आयु, बल और वर्ण बढ़ाने वाला होता है (भेलसंहिता, सू.7.13-14, अंश): पिबेत्क्षीरं घृतं नित्यमायुष्यकरणं हितम्।। बलवर्णकरं ह्येतदारोग्यकरणं तथा। प्राचीन भारत के महर्षि-वैज्ञानिक आचार्य सुश्रुत का अध्ययन स्पष्ट करता है कि घी मधुर, सौम्य, मृदु, शीतवीर्य, अल्प-क्लेदकारक, शरीर में स्नेहन करने वाला, एवं उदावर्त, उन्माद, अपस्मार, शूल, ज्वर, आनाह तथा वात व पित्त को शांत करने वाला, पाचक-अग्नि-दीपक है। स्मृति, मति, मेधा, कांति, स्वर, लावण्य, सुकुमारिता, तेज और बल सब को बढ़ाता है। घी आयुवर्धक, वृष्य, वय:स्थापक, पचने में भारी, नेत्रों के लिये हितकर कफ को बढ़ाने वाला, पाप तथा दरिद्रता का नाशक, विषनाशक तथा सूक्ष्म जीवाणुओं का नाशक है (सु.सू.45.96):
घृतं तु मधुरं सौम्यं मृदुशीतवीर्यमनभिष्यन्दिस्नेहनमुदावर्तोन्मादापस्मार-शूलज्वरानाहवातपित्तप्रशमनमग्निदीपनं स्मृतिमतिमेधाकान्तिस्वरलावण्य-सौकुमार्यौजस्तेजोबलकरमायुष्यं वृष्यं मेध्यं वय:स्थापनं गुरु चक्षुष्यं श्लेष्माभिवर्धनं पाप्मालक्ष्मीप्रशमनं विषहरं रक्षोघ्नं च।

भारतीय जनसंख्या में हृदय रोगों की बहुतायत के कारणों में घी खाना नहीं बल्कि व्यायाम की कमी, दिन में सोना, दिन भर आराम से सुखासन में बैठे रहना, मानसिक तनाव, इंसुलिन प्रतिरोध और बिना भूख लगे दिन भर पिष्टान्न, शक्कर, लवण, वसा के मिश्रण से बने तमाम आधुनिक कूड़ा-आहार खूब खाते-पीते रहने की आदत शामिल हैं। वनस्पति से प्राप्त तेल और डालडा, जिनमें 40 प्रतिशत तक ट्रांस फैटी एसिड होता है, का लगातार बढ़ता अनियंत्रित उपयोग भी दिल की समस्याओं का जनक है। घी खाने के संबंध में यहां पर पर्याप्त व्याख्या की गई है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि घी खाने का अधिकार उन्हें ही है जो व्यायाम करते हों। अन्यथा, अनेक बीमारियाँ खड़ी होती हैं। यह सूत्र याद रखना आवश्यक है (च.सू.23.3-5)
संतर्पयति य: स्निग्धैर्मधुरैर्गुरुपिच्छिलै:।
नवान्नैर्नवमद्यैश्च मांसैश्चानूपवारिजै:।।
गोरसैर्गौडिकैश्चान्नै: पैष्टिकैश्चातिमात्रश:।
चेष्टाद्वेषी दिवास्वप्नशय्यासनसुखे रत:।।
रोगास्तस्योपजायन्ते संतर्पणनिमित्तजा:।
यही वह सूत्र है जो उन कारणों को स्पष्ट करता है कि भारत गैर-संचारी रोगों की राजधानी क्यों बनता जा रहा है।
औद्योगिक रूप से उत्पादित ट्रांस वसा हानिकारक हैं और इन्हें भोजन से हटा देना चाहिये। अत्यधिक प्रसंस्कृत कार्बोहाइड्रेट जैसे डबल-रोटी, आलू के चिप्स, कुरकुरे या तमाम और रूप, और चीनी को बिलकुल छोड़ देने में ही स्वास्थ्य की भलाई है। पिज्ज़ादिवर्ग, बर्गरादिवर्ग, कुर्कुरादिवर्ग, फिंगरचिप्सादिवर्ग, मैग्यादिवर्ग, पेस्ट्रीकेक्यादिवर्ग या उष्णकुत्तादिवर्ग को निरंतर खाना और कोकपेप्स्यादिवर्ग को निरंतर पीना खतरनाक है। इन्हें कभी-कभार लेना तो समझ में आता है पर दैनिक जीवन का हिस्सा न बनाने में ही भलाई है। चेष्टाद्वेषियों के लिये इनका निरंतर सेवन बीमारियों को निमंत्रण है। इनकी जगह बिना प्रोसेस्ड कार्बोहाइड्रेट जैसे बिना स्टार्च वाली सब्जियां, साबुत फल, फलियां और घर की रसोई में पकाये हुये अनाज ही भोजन का अंग होने के हकदार हैं। इंसुलिन प्रतिरोध वाले, इंसुलिन के प्रति अतिसंवेदनशीलता वाले या ग्लूकोज असहिष्णुता वाले लोगों को कम कार्बोहाइड्रेट किन्तु उच्च वसा वाले आहार लाभकारी हो सकते हैं। घर में बनाये गये कम कार्बोहाइड्रेट और उच्च वसा वाला आहार लेने वाले को अधिक प्रोटीन के सेवन की आवश्यकता नहीं रहती है। भोजन में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम करने के लिये अत्यधिक प्रसंस्कृत अनाज, स्टार्च वाली सब्जियों, और चीनी को भोजन से हटाते हुये घी, पौधों-वनस्पतियों से प्राप्त गैर-हाइड्रोजनीकृत तेल, सूखे मेवे, नट्स व बीज लेना उचित है।

उदाहरण के लिये घी, भूँजी हल्दी और मोटे आटे की पनपथी रोटी स्वादिष्ट भी होती है और स्वास्थ्यकर भी। बघेलखंड का पारंपरिक फार्मूला ‘भूँजी हल्दी’ ठण्ड की चपेट में आये लोगों में कुपित वात को भी शांत करता है। असमय बुढ़ापा महसूस कर रहे लोगों के लिये घी का मेरे द्वारा विकसित यह योग उपयोगी है। गाय के घी (500 ग्राम) में उड़द (150 ग्राम), मूंग (150 ग्राम), तिल (200), सिंघाड़े का आटा (100 ग्राम) मिलाकर कड़ाही में भूनिये। इसमें मिश्री, खांड़, इक्षु-शर्करा (300 ग्राम), और गाय के घी (50 ग्राम) में हल्के भुने और छोटे टुकड़े किये हुये मखाना (200 ग्राम) और तालमखाना (50 ग्राम) मिलाइये। बाद में द्राक्षा (200 ग्राम), खजूर (200 ग्राम), चिरोंजी (100 ग्राम) व बादाम (200 ग्राम), कालीमिर्च (20 ग्राम), सोंठ (20 ग्राम), पिप्पली (10 ग्राम), दालचीनी (10 ग्राम), जावित्री (3 ग्राम), केशर (3 ग्राम) और इलायची (20 ग्राम) मिला लें। मिश्रण को सुरक्षित रख लीजिये। अपने वैद्य की सलाह से इस मिश्रण का 25 से 35 ग्राम नाश्ते व रात में केशर मिले गुनगुने दूध के साथ आनंद लीजिये। यह वृष्य, वाजीकर, बल्य, शुक्रवर्धक, रसायन और धातु-पुष्टिकर योग है। वैद्य की सलाह जरूर सुनें और मानें।

संहिताओं, शोध और अनुभव का निचोड़ यह है कि उचित और संयमित मात्रा में घी खाने का कोई हानिकारक प्रभाव नहीं बल्कि स्वास्थ्यकारी प्रभाव होता है। जब तक जियें घी खायें, शक्कर छोड़ें और फल खायें, व्यायाम करें, दिन में न सोयें, तनाव-मुक्त रहें।

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