भारतीय गणित की प्राचीनता, ऐतिहासिकता और विशेषताएं

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कुमार गंधर्व मिश्रा

( लेखक गणित के शोधार्थी हैं)

ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि सभ्यताओं के विकास और विस्तार में गणित ने भी अमूर्त रूप से भूमिका निभाई है, वास्तव में किसी सभ्यता के विकास का अंदाजा वहां पर पनपी गणितीय संस्कृति से भी लगाया जा सकता है।
लगभग 3000 ई. पू. की सिंधु घाटी सभ्यता कुछ ऐसा ही दर्शाती है। सिंधु घाटी सभ्यता अपने व्यवस्थित नगरों व संरचना के लिए जानी जाती है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के स्थलों पर खुदाई ने वहाँ उपयोग किए जाने वाले मूलभूत गणित से पर्दा उठाया। उस समय का गणित काफी व्यवाहरिक था। वजन और लम्बाई नापने के लिए प्रयोग में लाये जाने वाले तराजू और अनेक यन्त्र खुदाई में निकले। भवनों के निर्माण हेतु प्रयोग की जाने वाली ईंटें तो कमाल की थीं। इन ईंटों की लम्बाई, चौड़ाई और उंचाई 4, 2 और 1 के अनुपात में थीं। वजन के तराजू भी अलग अलग आकारों के थे, जैसे- घनाकार, बेलनाकार, शंकुाकार इत्यादि, जो उस काल के ज्यामितीय ज्ञान को दर्शाते हैं। इतना ही नहीं, इन वजनों के अनुपात का मानकीकरण भी था। जैसे, 1/16, 1/8, 1/4, 1/2, 1, 2, 3। रेखा मापक यानी स्केल भी बराबर-बराबर दूरियों पर चिन्हित था।
उस समय के स्नानागार, शहर की ज्यामितीय व्यवस्था, नक्काशियों व मुहरों में वृत्ताकार आकारों का उपयोग इत्यादि उनकी विद्वता झलकाती है। आधुनिक गणना के अनुसार सिंधु घाटी सभ्यता के साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप में गणितीय संस्कृति की शुरुआत हो चुकी थी।  गणितीय और वैज्ञानिक विद्वता की झलक वैदिक सभ्यता में भी देखने को मिलती है। लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व संस्कृत व्याकारण के अधिष्ठाता पाणिनि जो मूल रूप से भाषाविज्ञानी थे उन्होंने अपने ग्रंथ में शून्य की धारणा को भी रखा। यहाँ पर शून्य की धारणा का आशय अनुपस्थिति से था। अब से लगभग तेईस सौ वर्ष पूर्व छंदशास्त्री पिंगल ने शब्दांशो के क्रमांतरण और संयोजन पर कार्य किया। उन्होंने अक्षरों को गुरु और लघु की श्रेणियों में बाँटा और उनके क्रम और संयोजन से नए छंद आविष्कृत किये और इसी सम्बंध में मेरु प्रशस्त्र की खोज की, जिसे आज ‘पास्कल्स ट्राएंगलÓ के नाम से जाना जाता है। हल्युध ने 200 ई. में इस पर प्रकाश डाला और इस सन्दर्भ में उन्होंने द्विपद प्रमेय का भी उल्लेख किया। इस प्रकार गणित के क्षेत्र में भारत के कई महत्वपूर्ण योगदान हैं। आईये देखते हैं, गणित के विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय गणितज्ञों ने किस प्रकार योगदान दिया है।
ज्यामिति
भारत की उच्च स्तरीय ज्यामिति वैदिक अनुष्ठानो के ग्रंथो से ही झलकती है। ज्यामिति का उद्भव यज्ञ की वेदी का निर्माण करने के सन्दर्भ में हुआ था। इस तरह का सबसे प्राचीनतम अभिलेख बौधायन का शुल्बसूत्र माना जाता है। यज्ञ के लिए वेदियों के निर्माण का वर्णन करते ये शुल्बसूत्र ज्यामितीय रचनाओं पर आधारित हैं। ‘शुल्बÓ का अर्थ है नापना या नापने की क्रिया। ये शुल्बसूत्र अपने लेखकों के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं। इनमे प्रमुख हैं- बौधायन का शुल्बसूत्र, आपस्तम्ब का शुल्बसूत्र, कात्यायन का शुल्बसूत्र और मानव का शुल्बसूत्र। पाश्चात्य इतिहासकारों के अनुसार इन शुल्बसूत्रों का रचना काल 1200 से 800 ई. पू. माना गया है। शुल्बसूत्र उस काल में भारतीयों की क्षेत्रफल और माप की गहरी समझ और निपुणता को दर्शाते हैं। अपने एक सूत्र में बौधायन ने विकर्ण के वर्ग के नियम बताये हैं –
‘दीर्घचतुरस्त्रस्याक्ष्णया रज्जु: पाश्र्वमानी तिर्यङ्मानी च यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति’
अर्थात् एक आयत का विकर्ण उतना ही क्षेत्र इक्कठा बनाता है जितना कि उसकी लंबाई और चौड़ाई अलग अलग बनाती है। आज के दिनों में दुनिया इसे पाइथागोरस के प्रमेय के रूप में जानती है। साफ है कि भारतीय गणितज्ञ इस अवधारणा से पाइथागोरस के पहले से ही परिचित थे।
इन शुल्बसूत्रों से विभिन्न ज्यामितीय सरंचनाओं की निर्माण विधि का पता चलता है, जैसे दो वर्गों के जोडऩे या घटाने पर किसी खास क्षेत्रफल के नये वर्ग का निर्माण होना, किसी आयत को समान क्षेत्रफल के वर्ग में परिवर्तित करना, किसी वृत्त को लगभग-लगभग समान क्षेत्रफल के वर्ग में तब्दील करना और इसका उल्टा करना, ज्यामितीय तरीके से वर्गमूल ज्ञात करना और सबसे महत्वपूर्ण था श्रीयंत्र का निर्माण करना। श्रीयंत्र अपने आप में ही बेहद जटिल ज्यामितीय रचना है।
श्रीयंत्र जैसी रचना उच्च स्तरीय गणित को दर्शाती है। इस तरह की रचनाओं में कई लकीरों एवं गोलाकार चापों के समूह को एक साथ इतने सूक्ष्म तरीके से उकेरना कोई साधारण घटना नहीं है। रूसी शोधार्थी कुलैचेव (श्रीयंत्र पर इनका पत्र इंडियन जर्नल ऑफ़ हिस्ट्री ऑफ साइंस ने 1984 में प्रकाशित किया था) के अनुसार इस तरह की सूक्ष्म गणना करना नए जमाने के कम्पयूटरों की क्षमता से भी बाहर है। उनके अनुसार श्रीयंत्र के केंद्र में बने ज्यामितीय रचना (14 कोण का वह बहुभुज जो 9 त्रिभुजों के प्रतिच्छेदन से निर्मित हुआ है।), इतनी उत्तम बनी हुई है कि हस्तनिर्मित लगता ही नहीं है, चूँकि इसके लिए कई प्रतिच्छेदित बिन्दुओं का सुपर-पोजीशन करने की आवश्यकता है।

ब्रह्मगुप्त (598 ई. ) का ब्राह्म स्फुट सिद्धांत
ब्राह्म स्फुट सिद्धांत (628 ई.) के 24 अध्याय और 1022 श्लोकों में ब्रह्मगुप्त ने ज्योतिष और गणित से सम्बंधित जानकारी दी है। इस ग्रन्थ के 12 वेंअध्याय, गणिताध्याय में क्षेत्र व्यवहार (त्रिभुज, चतुर्भुज आदि के क्षेत्रफल), छाया व्यवहार (दीप स्तम्भ और उसकी छाया से सम्बंधित प्रश्न) का भी वर्णन किया है। ब्रह्मगुप्त ने चक्रीय चतुर्भुज के गुणों पर प्रकाश डाला। उन्होंने चक्रीय चतुर्भुज के क्षेत्रफल और विकर्णो को प्राप्त करने के लिए सूत्र दिए।
‘भुजयोगार्धचृतष्टयभुजोनघातात् पदं सूक्ष्मम्’
यदि किसी चक्रीय चतुर्भुज के बाजुओं की लम्बाई ए, बी, सी और डी है, दोनो विकर्णो की लम्बाई डी1, डी2 है और अर्ध परिधि है एस है तो
पश्चिम में यह सूत्र डब्लू स्नेल ने वर्ष 1619 में प्राप्त किया था। अगर किसी एक बाजु को हटा दिया जाये या डी को सी से मिला दिया जाये ताकि सी = 0 हो जाये तो क्षेत्रफल का सूत्र हेरोन के सूत्र (त्रिभुज का क्षेत्रफल ज्ञात करने के लिए) के बराबर हो जायेगा। 1530 ई. में इस तरह के सूत्रों का सुस्पष्ट प्रमाण ज्येष्ठदेव (केरल के गणित विद्यालय) द्वारा रचित युक्तिभाषा में पाया जाता है। अत: अगर हजारों वर्षों तक चक्रीय चतुर्भुज के विकर्णो का सूत्र दुनिया के किसी दूसरे कोने में नहीं ज्ञात था तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण घटना/विषय है।

त्रिकोणमिति
यह कहना गलत नहीं होगा कि त्रिकोणमिति के अध्ययन ने बीजगणित और ज्यामिति को एक साथ जोड़ा। 300 ई. के दौरान सूर्य सिद्धांत में त्रिकोणमिति का वर्णन मिलता है। सभ्यताओं के शुरुआत से ही मनुष्य में खगोलीय पिंडो (ग्रहों, तारों, चद्रमा और सूर्य) की गति और चाल को लेकर उत्सुकता रही। इन खगोलीय पिंडो की गति के रूप को जानने के क्रम में ही भारत और ग्रीस (यूनान) में त्रिकोणमिति का उद्भव हुआ। भारत में खगोलशास्त्र और त्रिकोणमिति शुरू से ही एक दूसरे के अभिन्न अंग रहे। इस तरह की गणना का उपयोग त्योहार, मुहर्त, फसल- कटाई आदि का उपयुक्त समय व दिन ज्ञात करने के लिए किया जाता था।
त्रिकोणमिति पर भारतीयों और ग्रीकों के दृष्टिकोण में अंतर रहा। ग्रीक त्रिकोणमिति वृत्त के जीवा और उनके कोणों के संबंधों पर आधारित थी। भारतीय त्रिकोणमिति ‘ज्याया जीवाÓ (आज की भाषा में) पर आधारित थी। निश्चित तौर पर भारतीयों की विधि को पूरे संसार में स्वीकारा गया क्योंकि गणना करने के लिए यह काफी सरल है।
इसी प्रकार भारतीयों द्वारा समकोण त्रिभुजों का उपयोग कर तीन आयामी प्रक्षेपण से गोलीय त्रिकोणमिति या स्फेरिकल त्रिकोणमिति का अध्ययन भी काफी सराहा जाता है। त्रिकोणमिति से जुड़े अध्ययन आर्यभट के आर्यभटीय (जन्म 476 ई.) में मिलते हैं। उसके पश्चात् वराहमिहिर (जन्म 505 ई.) के पञ्चसिद्धान्तिका (575 ई. ) में और ब्रह्मगुप्त के ब्राह्म स्फुट सिद्धांत में भी मिलते हैं। आर्यभटीय की रचना आर्यभट ने 499 ई. में की थी।

साइन, कोसाइन का भारतीय सम्बन्ध
इसमें कोई दोराय नहीं है कि यूरोप में भारतीय गणित के बहुत सारे पहलुओं का प्रचार-प्रसार अरबवासियों ने किया। भारतीय ग्रन्थ जब अरब पहुंचे तो अरबी अनुवादकों को एक भारतीय शब्द ‘जीवा’ से कठिनाई हुई। अरबी लिपि में इ, उ जैसे स्वर-अक्षर नहीं है। इस वजह से अरबी अनुवादकों ने ‘जीवा’ को जब बनाकर अपना लिया। जब ये अनुवादित ग्रन्थ यूरोप पहुंचे तो यूरोपीय अनुवादकों ने जब शब्द को जेब की तरह समझा। जेब शब्द यानि कि कमीज में कुछ रखने के लिए कोई खास जगह। उस समय अरबी लोगों की कुरते की जेब छाती के पास रहती थी। लैटिन भाषा में छाती को ‘सिनुस’ कहा गया। इसी ‘सिनुस’ शब्द से ‘साइन’ शब्द प्रचलन में आया। इसी तरह ‘कोज्या’ ‘कोसाइन’ बना।
अधिकांश अभिलेखों में वृत्त का चतुर्थ खंड 24 बराबर हिस्सों में बाँटा गया है। इसी तरह देखा गया कि आर्यभट ने 3ए45′ के अंतर पर ज्यासारणियाँ विकसित कीं।
वृत्त के चौथाई हिस्से को 24 से भी अधिक हिस्सों में बांटने और उनका मान ज्ञात करने की विधि भास्कराचार्य (जन्म 1114 ई. ) अर्थात् भास्कर द्वितीय द्वारा रचित सिद्धांतशिरोमणि (1150 ई. ) के ज्योतपत्ती में वर्णित है। भास्कर द्वितीय दो कोणों के मान के अंतर का ज्या यानि साइन ज्ञात करने की विधि बतलाते हैं। ‘जीवे॒ परस्पर न्या॒यÓ में तो भास्कर 1ए के अंतर पर साइन (ज्या) ज्ञात करने का सूत्र देते हैं।
ब्रह्मगुप्त ने अपने खंडखाद्यक: में ज्या (साइन) और कोज्या (कोसाइन) के फलन (फंक्शन) के सम्बंध में द्वितीय कोटि प्रक्षेपण का प्रयोग किया है। आधुनिक भाषा में हम इसे सेकेंड आर्डर इंटरपोलेशन कहते हैं। अत: हम देखते हैं कि किस प्रकार हमारे गणितज्ञों ने त्रिकोणमिती से जुड़े कई पहलुओं को उजागर किया जिनका प्रयोग आज भी होता है। ऐसे और भी कई उदाहरण और उपपत्तियां भरे पड़े हैं। दिल्ली, राजस्थान और अन्य स्थानों पर जंतर मंतर का निर्माण भी भारत में त्रिकोणमिति के वैभव को दर्शाता है। जंतर मंतर पर विभिन्न यन्त्र निर्मित किये गए जो त्रिकोणमिति के सिद्धांतो पर ही आधारित है। भारत के सदियों पुराने त्रिकोणमिति और खगोलशास्त्र के विज्ञान को 1975 में सम्मान मिला जब अंतरिक्ष में भारत ने अपना पहला उपग्रह आर्यभट को समर्पित किया।

अंकगणित
प्रख्यात गणितज्ञ लाप्लैस ने कहा थारू ‘किसी भी संख्या को सिर्फ दस संकेतों (हर संकेत का अपना मान और स्थान है) के एक समुच्चय से व्यक्त कर देने की इतनी सरल भारतीय प्रणाली को शायद ही उतनी सराहना मिलती है, जितनी मिलनी चाहिए। इसकी सरलता इसमें है कि इसने गणना और अंकगणित को सार्थक आविष्कारों में सबसे आगे रखा। इसकी महत्ता तब समझ आती है जब यह एहसास होता है कि प्राचीनकाल के दो महान मानव आर्कीमिडिज और अपोलोनियस भी इसे ढूंढ नहीं पाए।’
दश संकेतो का प्रयोग कर दश स्थानों को मान देने की प्रणाली भारतीयों की देन है। भारतीय अंको के उद्भव का अनुमान ब्राह्मी लिपि से लगाया जाता है, जो कि 300 ई. की अशोक स्तंभों के शिलालेखों पे देखा जा सकता है। आज उपयोग किया जा रहा शून्य का चिन्ह भारत की ही देन है, बक्षाली पांडुलिपि और ग्वालियर के एक मंदिर की दीवालों पे उभरे (876 ई.) शून्य के चिन्ह इस बात के प्रमाण हैं। ऑक्सफोर्ड विश्विद्यालय द्वारा बक्षाली पांडुलिपि पर आये 2017 में हाल के शोध के प्रमाण इन्हें और भी 100 वर्ष पुराना मानते हैं यानि कि तीसरी और चौथी शताब्दी के बीच ।
बक्षाली पांडुलिपि और ग्वालियर के मंदिर की दीवालों पर उभरे गोलाकार चिह्न ही आज के शून्य के चिह्न हैं। भारत के अलावा और भी कई सभ्यताओं जैसे माया, बेबीलोनियन में शून्य का ‘स्थानधारक’ की तरह उपयोग देखने को मिलता है, पर जो खास बात भारत को अलग करती है वो है शून्य का संख्या की तरह उपयोग। अर्थात शून्य को मान की अवधारणा देना। इस प्रकार 1 से लेकर 9 तक (और शून्य 0 को लेते हुए ) का सहारा लेते हुए हर प्राकृतिक संख्या को एक बहुपद की तरह दर्शाना काफी आसान हो जाता है।
इस बहुपदीय सरंचना से अंकगणितीय संक्रियाएँ करना जैसे, जोड़, घटाव, गुणा, भाग, वर्गमूल ज्ञात करना काफी आसान होजाता है। ब्रह्मगुप्त ने ब्राह्म स्फुट सिद्धांत में ऋणात्मक संख्याओं का उपयोग किया है। इसी प्रकार भास्कर ने अपनी ‘लीलावतीÓ में ऋणात्मक संख्याओं को अंक रेखा पर बायीं दिशा में दर्शाया है। भारतीय अंक पद्धति ने गणना को काफी सरल बना दिया जिससे व्यापार, विज्ञान, आर्थिक गतिविधि को काफी बल मिला और सभ्यताओं का विकास भी हुआ।

बीजगणित
अज्ञात राशियों के साथ गणना करने की अवधारणा ही बीजगणित जन्म देती है। पृथदुक स्वामी (830 – 890 ई.) ने इसे बीजगणित का नाम दिया। ब्राह्म स्फुट सिद्धांत में ऋणात्मक व घनात्मक अवधारणा संबंधी नियम भरे पड़े थे । इन्ही नियमो ने बीजगणित में मूलभूत नियम की भूमिका निभायी। शुल्बसूत्रों और बक्षाली की पांडुलिपि में भी बीजगणित का कुछ स्वरुप दिखाई देता है। भारत में आर्यभट के समय से बीजगणित एक स्वतंत्र शाखा के रूप में देखा जा सकता है। आर्यभट ने आर्यभटीय की रचना की। इस ग्रंथ में कुल 121 श्लोक हैं जो चार अध्यायों में विभाजित हैं – गीतिकापाद – 13 श्लोक, गणितपाद – 33 श्लोक, कालक्रियापाद – 25 श्लोक, गोलपाद – 50 श्लोक। इनमें गणितपाद में आर्यभट ने अंकगणित एवं बीजगणित पर प्रकाश डाला है।
आर्यभट अज्ञात राशियों के लिए ‘गुलिका’ शब्द का प्रयोग करते हैं। आर्यभट ने श्रेणी के पदों के योग के भी सूत्र दिए हैं। उन्होंने अनिर्धार्य समीकरण (कुट्टकार विधि) भी हल किये। आज इस तरह के समीकरणों को हल करने का श्रेय डायोफेंटस को मिलता है। भास्कराचार्य ने भी लीलावती में श्रेणी और समीकरण संबंधित अनेक सूत्र दिए हैं। कई उदाहरण तो आज की नंबर थ्योरी की नींव डालते हैं।
ब्रह्मगुप्त एक महान गणितज्ञ थे। उन्होंने ब्राह्म स्फुट सिद्धांत को 24 अध्यायों में रचा। इस ग्रंथ का 12 वां (गणिताध्याय) और 18 वां अध्याय (कुट्टकाध्याय ) गणित से सम्बंधित है। 103 श्लोकों से भरा यह कुट्टकाध्याय बीजगणित पर केन्द्रित है। चक्रीय चतुर्भुज और उसके विकर्णो के बारे में तो हम चर्चा कर ही चुके है। ब्रह्मगुप्त के सबसे महत्पूर्ण योगदानों में से एक है एक खास तरह के द्विघातीय समीकरण का हल विशेषकर पेल समीकरण का हल।
आज इस समीकरण को पेल समीकरण के नाम से जाना जाता है, यद्यपि पेल का जन्म इसके 1000 वर्ष बाद हुआ था और उनका इस समीकरण से कोई लेना देना नहीं था। ब्रह्मगुप्त की प्रमेयिका द्विचर सरंचना के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हुई। इस विधि का प्रयोग उपरोक्त समीकरण के हल ज्ञात करने के लिए ज्येष्ठदेव और भास्कराचार्य द्वारा खूब किया गया जो कि ‘चक्रावल विधि’ के नाम से प्रचलित हुआ। ब्रह्मगुप्त द्वारा दिए गए विधि का प्रयोग गणित के राजकुमार कहे जाने वाले ‘गॉस’ ने भी खूब किया।
द्विघात समीकरण के सन्दर्भ में श्रीधराचार्य (जन्म 8वीं शताब्दी) का सूत्र सदाबहार है। भास्कराचार्य ने वर्ग समीकरणों के हल के लिए श्रीधराचार्य के नियम को उधृत किया है। महावीराचार्य (9 वीं शताब्दी) ने गणित सार-संग्रह की रचना की। बीजगणित से सम्बंधित अनेक उदाहरणों में उनका प्रकृति प्रेम उजागर होता है। जैसे, पक्षी, पर्वत, फूलों और उनकी संख्या पर आधारित पहेलियाँ देना। महावीर ने अपनी पहेलियों द्वारा उच्च घातांको वाले समीकरण, प्रतिस्थापन विधि की भी व्याख्या की है। जैसे, ‘हाथियों के झुण्ड में से, उनकी संख्या के 2/3 भाग के वर्गमूल का 9 गुना प्रमाण और शेष भाग के 3/5 भाग के वर्ग मूल का 6 गुना प्रमाण और अंत में शेष 24 हाथी वन में ऐसे देखे गए जिनके विशाल गंड मंडल से मद झर रहा था। हाथियों की संख्या ज्ञात करो।’
अपनी बीजगणितीय क्षमता का उदाहरण देते हुए महावीर ने समकोण त्रिभुज के निर्माण के नियम दिए है। भास्कराचार्य ने 1150 ई. में सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथ की रचना की। सिद्धांत शिरोमणि के चार भाग हैं – लीलावती, बीजगणित, गोलाध्याय, और ग्रह-गणित। इन सबमें लीलावती भास्कर की सबसे लोकप्रिय रचना साबित हुई। लीलावती में भास्कर ने गणितीय प्रश्नों को काव्यात्मक शैली में प्रयोग किया है। विभिन्न अलंकारों का सुंदर प्रयोग इसे और भी पठनीय बनाता है। भास्कराचार्य ने तीन और चार घाट वाले समीकरणों पे भी प्रकाश डाला है। बीजगणित के वर्गप्रकृति नामक अध्याय में भास्कराचार्य ने ब्रह्मगुप्त से सम्बंधित विधियों के उदाहरण दिए हैं, जिनमें अनंत हल प्राप्त किये जा सकते हैं। भास्कराचार्य का चक्रवाल विधि काफी प्रसिद्ध हुआ। प्रसिद्ध गणितज्ञ आंद्रे वाइल्स ने भी इस विधि को प्राप्त करना काफी असाधारण बतलाया है।

अन्य महत्वपूर्ण योगदान
प्रसिद्ध जैन गणितज्ञ महावीराचार्य ने क्रमांतरण और संयोजन की विधियों पर भी कार्य किया । श्रेणियों पर भी महावीर ने काम किया। लघुत्तम समापवत्र्य की अवधारणा भी महावीर के गणित सार संग्रह में मिलती है। पूर्ववर्ती गणितज्ञों की अपेक्षा में आर्यभट ने पाई का मान दशमलव के बाद चार अंको तक ज्ञात किया।
केरल के गणित विद्यालयों ने भारतीय गणित को और भी उंचाई तक पहुँचाया। इन गणित विद्यालयों ने माधव जैसे गणितज्ञ के कार्य को उजागर किया। माधव यानी माधवाचार्य (1340 ई. 1425 ई.) ने कलन (कैलकुलस), त्रिकोणमिति और अनंत श्रेणी के विस्तार में अतुलनीय योगदान दिये। ज्येष्ठदेव की युक्तिभाषा, नीलकंठ सोमयाजी के तंत्र समग्रह, पुटूमन सोमयाजी के कर्ण पद्धति में माधव के कार्य का उल्लेख मिलता है। माधव ने गणित को त्रिकोणमिति से सम्बंधित कई विस्तार दिए। उनकी कई श्रेणियों का प्रयोग विभिन्न कोणों के ज्या (साइन) और कोज्या (कोसाइन) का मान ज्ञात करने के लिए किया जाता था, जो कि बिल्कुल सटीक परिणाम देतीं। इस तरह का पैनापन यूरोप में नहीं आया था। समीकरण ख को आज ग्रेगरी श्रेणी से जाना जाता है, जबकी माधव ने ग्रेगरी से 300 वर्ष पहले ही ऐसे समीकरणों को दुनिया के सामने लाया था। माधव ने इस सुंदर सूत्र की भी खोज की – यह सूत्र प्रसिद्ध गणितज्ञ लेबनीज ने भी बाद में खोजा। युक्तिभासा में माधव के कार्य को लेकर पता चलता है कि समाकलन की अवधारणा योग या संकलन-फल की सीमा (लिमिट) से सम्बंधित थी, जो आज के आधुनिक अवकलन विधि (विस्तार और पदों का एक एक कर अवकलन करना) से मेल खाती है। माधव के गणितीय कार्य यह दर्शाते हैं कि न्यूटन और लेबनिज से तीन शताब्दी पहले ही भारत कलन और गणितीय विश्लेषण में गहराई और परिपक्वत्ता हासिल कर चुका था।

आधुनिक भारतीय गणितज्ञ
उन्नीसवीं सदी के अंत में भारत के महान गणित सितारे का जन्म हुआ – श्रीनिवास रामानुजन (1887-1920 ई.)। रामानुजन का जीवन और उनका संघर्ष किसी से छुपा हुआ नहीं है। रामानुजम का महान गणितज्ञ हार्डी के नाम पत्र जिसमें उनके 120 प्रमेयों का भी उल्लेख था, ने हार्डी को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने रामानुजन को तुरंत ही इंग्लैंड बुलवा लिया। रामानुजन ने हार्डी के साथ अपनी गणितीय प्रतिभा को और भी निखारा। नंबर थ्योरी में अतुलनीय योगदान के लिए रामानुजन को रॉयल सोसाइटी ऑफ लन्दन का फेलो (अध्येता) चुना गया। पहली बार कोई भारतीय रॉयल सोसाइटी ऑफ लन्दन का सदस्य चुना गया था। रामानुजन के खास परिणामो में रामानुजन- रोजर्स फंक्शन हैं।
रामानुजन की एक श्रेणी है जिसका अभिसरण (कन्वर्जेंस) बहुत ही तेज गति से होता है। इसका उपयोग मशीन कंप्यूटिंग द्वारा कई अरब अंको तक पाई का मान निकालने के लिए किया गया। रामानुजन का टाउ फलन भी काफी चर्चित रहा। रामानुजन ने नंबर थ्योरी, गणितीय विश्लेष्ण, हाईपर जियोमेट्रिक श्रेणी, गामा फलन/फंक्शन, माड्यूलर फॉर्म आदि पे काफी काम किया। उनके खोये हुए महत्वपूर्ण पत्रों में उल्लिखित प्रमेयों की संख्या 4000 बतायी गई है। नंबर थ्योरी में ‘पार्टीसंसÓ (किसी घनात्मक पूर्णांक को अन्य घनात्मक पूर्णांक के योग की तरह दर्शाना) पर उनके कार्य ने भी काफी गणितज्ञों को आकर्षित किया।
रामानुजन की उपलब्धियों को आगे बढ़ाते हुए हरीश चंद्र 1973 में रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लन्दनÓ के अध्येता चुने गए। इनके बाद एम. एस. नरसिम्हा (1988), सी. सेशाद्री (1988), श्रीनिवास वर्धन (1998) और एम. एस. रघुनाथन (2000) को भी गणित में योगदान के लिए रॉयल सोसाइटी का अध्येता चुना गया। प्रख्यात सांख्यिकीविद सी. आर. राव को भी सांख्यिकी में योगदान के लिए रॉयल सोसाइटी का अध्येता चुना गया। आधुनिक काल में इनके अलावा और भी गणितज्ञ हुए हैं, जिन्होंने गणित में अपने योगदान का लोहा मनवाया और कई प्रसिद्ध सोसाइटी के अध्येता बने और पुरस्कृत भी हुए। गणित के क्षेत्र में भारत की धमक और चमक भी बढ़ी है। वर्ष 2010 में भारत में आयोजित हुई आई. सी. एम. गणितज्ञों का अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन इस बात का प्रमाण है। 100 वर्षों के इतिहास में पहली बार इस तरह के सम्मलेन का आयोजन भारत में हुआ था। आई. सी. एम. में एक वक्ता के लिए चयन होना बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है और 1970 से हर बार किसी न किसी भारतीय गणितज्ञ (जो भारत में ही रह कर शोध कर रहे हैं) को एक वक्ता के तौर पर हमेशा आमंत्रित किया गया है। यह सौभाग्य बहुत सारे यूरोपीय और चीन जैसे देशों को भी प्राप्त नहीं हो पाया है।
गणित का नोबेल पुरस्कार माने जाने वाला फील्ड्स मेडल पुरस्कार वर्ष 2014 में भारतीय मूल के अमरीकी गणितज्ञ मंजूल भार्गव को प्रदान किया गया। मंजूल भार्गव का भारतीय शास्त्रीय संगीत से बचपन से काफी लगाव रहा है। वे अपने व्याख्यानों के दौरान गणित और संगीत के संबंधो को भी दर्शाते हैं। वे महान तबला वादक उस्ताद जाकिर खान के शिष्य हैं। भार्गव बताते हैं कि जब वह बचपन में छुट्टियों में भारत आते तो उन्हें किस्से-कहानियाँ, संस्कृत श्लोक, संगीत सुनने का काफी अवसर मिलता था। इनसे वे काफी प्रभावित हुए और उनके अध्ययन में भी इन सांस्कृतिक जड़ों का प्रभाव पड़ा। उनका भाषा विज्ञान में भी शोध पत्र है। अपने व्याख्यानों में मंजूल भार्गव भी प्राचीन भारतीय गणितज्ञों के योगदान पर अक्सर प्रकाश डाला करते हैं।
इस प्रकार भारतीय गणितज्ञों का योगदान अतुलनीय है और सचमुच उनके कार्य हमारे समाज,देश और पूरे विश्व के लिए एक धरोहर की तरह हैं जिन पर हम गर्व कर सकते हैं।

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