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यज्ञ चिकित्सा का है चमत्कारी ज्ञान विज्ञान

 

पूनम नेगी

वर्तमान समय में जिस तरह से समूची दुनिया प्रदूषण की चौतरफा मार बेतरह कराह रही है; हवा-जल-मिट्टी सब विषैले हो रहे हैं; मांसाहार, फास्ट फूड, शराब, धूम्रपान के बढ़ते उपयोग के साथ अनियमित और आलस्यपूर्ण तथा तनाव-अवसाद ग्रस्त जीवनशैली के कारण समाज का बड़ा वर्ग गंभीर बीमारियों के चंगुल में फंसता जा रहा है। इनमें सबसे खतरनाक है कैंसर। गौरतलब हो कैंसर ऐसी ही एक भयावह बीमारी है, जिसके इलाज की पूर्ण गारंटी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के पास भी नहीं है। कैंसर की प्राकृतिक चिकित्सा का सर्वोतम रूप है हमारा पुरातन यज्ञ विज्ञान। यह जानना रोचक हो सकता है कि अमेरिका, जर्मनी, कनाडा, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैड जैसे अनेक विकसित देशों में हमारे वैदिक यज्ञ विज्ञान पर हुए विस्तृत शोध-परिणाम खासे उत्साहित करने वाले हैं। कुछ समय पूर्व तक जिस यज्ञ प्रक्रिया को केवल हिंदू धर्म का धार्मिक कर्मकांड माना जाता था, विश्वव्यापी शोधों के परिणामों के आधार पर उसे यज्ञपैथी के रूप में एक अनूठी चिकित्सा पद्धति की मान्यता मिलना हम भारतीयों के लिए गर्व का विषय है। इन आधुनिक शोधों और अध्ययनों से साबित हुआ है कि अग्निहोत्र मानव स्वास्थ्य के साथ ही वायु, धरती और जल में होने वाले विकारों को दूर कर सकारात्मक बदलाव लाता है।

प्राचीन भारत के स्वस्थ, सुखी और समुन्नत समाज का मूल कारण इसी यज्ञ-विद्या का विस्तार था। वैदिक वांग्मय के उल्लेख बताते हैं कि प्राचीन भारत में घर-घर में अग्निहोत्र हुआ करता था। उस समय का सामाजिक नियम था कि प्रत्येक गृहस्वामी प्रात: और संध्याकाल दैनिक क्रियाओं द्वारा शुद्ध होकर अग्निहोत्र अवश्य करता था ताकि प्रात: और सायंकाल मल-मूत्र आदि के विसर्जन से दूषित वायुमंडल यज्ञ ऊर्जा से पुन: शुद्ध हो जाए। यज्ञ किये बिना लोग आहार तक ग्रहण नहीं करते थे, यज्ञ के बिना कोई मंगल कार्य नहीं पूरा होता था। भारतीयों का सुदृढ़ विश्वास था कि यज्ञ चिकित्सा में वे सभी आधार मौजूद हैं जिनसे शारीरिक व्याधियों और मानसिक बीमारियों-विकृतियों का सफल उपचार हो सकता है। यही कारण है कि प्राचीनकाल में यज्ञ को भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति का मूल आधार माना जाता था।

आधुनिकतम शोधों के आधार पर वर्तमान चिकित्सा विज्ञानियों ने यह तथ्य प्रतिपादित किया है कि कैंसर के बारे में सर्वाधिक महत्वपूर्ण जानकारी यह है कि कैंसर वास्तव में मनुष्य पर किसी बाहरी विषाणु, जीवाणु या कीट के आक्रमण से जनित कोई रोग न होकर अपितु स्वयं मनुष्य के शरीर में कोशिकाओं का असामान्य प्रसार है। इसका अर्थ यह हुआ कि कैंसर मनुष्य शरीर की आंतरिक अनियमितताओं के परिणामस्वरूप ही उत्पन्न होता है।

यज्ञ चिकित्सा (यज्ञोपैथी) वैदिक कालीन चिकित्सा पद्धति हैं, जिसमे रोग-विशेष जड़ी बूटियों को यज्ञाग्नि में अर्पित कर उससे उत्पन्न यज्ञ के धुएं को श्वास के द्वारा शरीर में ग्रहण किया जाता है। इस प्रक्रिया में यज्ञाहुतियों में प्रयुक्त समिधा के विशिष्ट औषधीय घटक रोगी को स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते हैं। इस चिकित्सा पद्धति में यज्ञाग्नि और समिधा के साथ मंत्रध्वनि का भी विशेष महत्व होता है। प्रयोगों में पाया गया है कि हवन के द्वारा उत्पन्न यज्ञ ऊर्जा विचार एवं भावना के तल पर तो सकारात्मक प्रभाव डालती ही है, इसके चिकित्सीय नतीजे भी खासे उत्साहित करने वाले हैं। अथर्ववेद कहता है – सप्रेद्धो अग्नि जिह्वाभिरुदेतु ह्यदयादधि। अर्थात जो हवन करते हैं उनके हृदय में परमात्मा का तेज प्रकाशित होता है। ऋग्वेद (3/10/3) के अनुसार यज्ञ अग्नि में दी गयी औषधियां हमें शक्ति एवं बल प्रदान कराती हैं तथा यज्ञ से दीर्घायु की प्राप्ति एवं रोगों से मुक्ति होती है। अथर्ववेद (3/11/1-8) में कहा गया है कि यज्ञीय जीवन का मूल सूत्र ‘इदं न मम’ अर्थात यह जीवन मेरा नहीं अपितु परमात्मा का है; भारत का विश्व को प्रदत्त सर्वोपरि दर्शन है। यज्ञ की प्रक्रिया सुसंस्कारिता संवर्धन, सामाजिक संतुलन, सूक्ष्म शक्ति के प्रादुर्भाव, पापों के प्रायश्चित, पर्यावरण शुद्धि, पर्जन्य वर्षा से प्राणशक्ति की अभिवृद्धि और रोग मुक्ति- बलवर्धन इत्यादि के द्वारा प्रकृति का संतुलन बनाने का कार्य करती है।

प्रख्यात अनुसन्धान जरनल एस्ट्रोबायोलॉजी में सन 2011 में एक शोध प्रकाशित हुआ था। इसके अनुसार 21 साल के अनुसन्धान में पाया गया कि सौर चुंबकीय तूफान की सक्रियता मनुष्य की जैविक घड़ी को प्रभावित करती है। इसके संतुलन के लिए सूर्य से मानव जीवन का तादात्म्य बेहद जरूरी है। इसलिए भारतीय ऋषियों ने यज्ञ के विज्ञान में सूर्य ऊर्जा के उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए दैनिक अग्निहोत्र के लिए सूर्योदय और सूर्यास्त का समय निर्धारित किया था। सुबह और शाम यज्ञ करने से सूर्य शक्ति से तादात्म्य होता है और जैविक घड़ी सुनियोजित रूप से संचालित होती है।

वनौषधियों के पंचांग को कूटकर खाने में उसे अधिक मात्रा में निगलना कठिन पड़ता हैं। इससे तो गोली या वटी के सेवन में कम कठिनाई होती है। इसी तरह सूखी गोली से अधिक सुविधाजनक और प्रभावी क्वाथ अर्क, आसव और अरिष्ट के सेवन को माना जाता है। मगर सर्वाधिक प्रभावशाली वायुभूत औषधि को माना जाता है। नाक से सूंघी हुई औषधि शरीर के भीतर घुसी विजातीय तथा जहरीले पदार्थों को बाहर निकाल देती है। हवन में स्वास्थ्य संवर्धन और रोग निवारण की जो अद्भुत शक्ति है, उसका कारण पदार्थों को वायुभूत बना कर उसका लाभ लेना ही है। निसंदेह प्राण वायु यानी आक्सीजन एक दवा ही है। प्रात:काल जब वायु में आक्सीजन की मात्रा अधिक होती है, टहलने जाना आरोग्यवर्धक माना जाता है। वायु में लाभदायक तत्व मिले हो तो उसकी उपयोगिता का लाभ स्वत: ही मिलेगा। हवन द्वारा यही प्रयोजन पूरा किया जाता है। उपयोग औषधियों को वायुभूत बनाया जाए और उसका लाभ उस वातावरण के संपर्क में आने वालों को मिलें, आरोग्य की दृष्टि से हवन का यह लाभ बहुत ही महत्वपूर्ण है। अग्निहोत्र उपचार एक प्रकार की समूह चिकित्सा है, जिससे एक ही प्रकृति की विकृति वाले विभिन्न रोगी लाभान्वित हो सकते हैं। यह सुनिश्चित रूप में त्वरित लाभ पहुँचाने वाली, सबसे सुगम एवं सस्ती उपचार पद्धति है।

शांतिकुंज, हरिद्वार से संबद्ध ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान एवं देव संस्कृति विश्वविद्यालय में यज्ञ चिकित्सा पर काम कर रहे डा. विरल पटेल बताते हैं कि निर्धारित नियमों के साथ रोग के लिए परीक्षित हवन सामग्री के साथ यज्ञ चिकित्सा करने वाले अनेक रोगियों पर इसका आशातीत लाभ देखा गया है। यज्ञ चिकित्सा से न सिर्फ कैंसर अपितु क्षयरोग, मानसिक स्वास्थ्य, वातरोग, थाइराइड, और मिरगी आदि रोगों के निवारण में सकारात्मक प्रभाव मापा गया है। इस अनुसंधान के तहत कई प्रकार के रोग निवारक एवं शामक समिश्रण बनाये गये हैं जिनका हजारों रोगियों पर सफल परीक्षण किया जा चुका है। यज्ञ चिकित्सा की प्रक्रिया के बारे में विशेष जानकारी देते हुए वे बताते हैं कि कैंसर, क्षय, डायबिटीज, थायराइड आदि में स्वास्थ्य लाभ और जीवनी शक्ति के संवद्र्धन के लिए हवन कुंड की प्रज्ज्वलित अग्नि में सूर्य गायत्री की न्यूनतम 24 मंत्राहुतियां समर्पित की जाती हैं तथा मानसिक रोगों में चंद्र गायत्री मंत्र से। मंत्राहुति के बाद रोगियों को यज्ञशाला में कम से कम 45 मिनट तक रहना चाहिए। इस दौरान 15 मिनट के लिए प्राणाकर्षण प्राणायाम एवं ध्यान करें। भावना करें कि यज्ञ उर्जा, मंत्र शक्ति और औषधीय धुआं हमारे शरीर में प्रविष्ट हो हमें निरोगी बना रही है। यज्ञ का सर्वोत्तम समय सूर्योदय और सूर्यास्त का है। समिधा के बारे ध्यान रखना चाहिए कि वह आम की लकड़ी की हो; देसी गाय के गोबर से बने उपले (कंडे) भी समिधा में प्रयुक्त कर सकते हैं। हवन में प्रयुक्त घी सिर्फ देसी गाय का होना अनिवार्य है। इस हवन में कैमिकल युक्त कपूर का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है। यज्ञ चिकित्सा के दौरान सात्विक आहार-विहार का पालन भी अनिवार्य है। डा. पटेल के अनुसार यज्ञ चिकित्सा का एक चिकित्सीय सेशन 40 दिनों का है, लेकिन चिकित्सा के पूर्ण प्रभाव को देखने के लिए रोगी को कम से कम छह महीने तक इसे करना चाहिए।

कैंसरनाशक हवन सामग्री की बाबत वे बताते हैं कि इसमें गुलर के फूल, अशोक की छाल, अर्जुन की छाल, लोध, माजूफल, दारुहल्दी, हल्दी, खोपरा, तिल, जौ, चिकनी सुपारी, शतावर, काकजंघा, मोचरस, खस, मजीष्ठ, अनारदाना, सफेद चन्दन, लाल चन्दन, गंधाविरोजा, नारवी, जामुन के पत्ते, धाय के पत्ते आदि सभी वस्तुओं को निर्धारित अनुपात में लेकर कूट-पीसकर दरदरा चूर्ण बनाया जाता है। फिर इसमें दस गुना देशी खांड (शक्कर) और एक भाग केसर मिला कर दिन में दो बार हवन करने से कैसर संबंधी रोगों का नाश होता है। यज्ञ ऊर्जा यानी यज्ञ थेरेपी जो कि एक बहुत ही महत्तवपूर्ण शक्ति है, के बारे में डा. पटेल एक रोचक जानकारी देते हुए बताते हैं कि ऊर्जा का नियंत्रण यज्ञ कुंडों के आकार द्वारा किया जाता है और ज्यामितीय सिद्धांतों के अनुसार ही इन कुंडों का स्वरूप बनाया जाता है। ऐसा करने से उत्सर्जित ज्वाला एवं ऊर्जा का प्रभाव सारे वातावरण पर उचित अनुपात में पड़ता है और विभिन्न औषधियां जलकर अलग-अलग ऊर्जा का स्वरूप देती हैं।

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में छात्र कल्याण विभाग प्रमुख 76 वर्षीय श्री अगमवीर सिंह को डेढ़ वर्ष पहले बायोप्सी में छाती पर उभरी सिस्ट में कैंसर सेल्स की पुष्टि हुई थी। वे पंचगव्य चिकित्सा के साथ बीते एक साल से अधिक समय से नियमित यज्ञ कर रहे हैं। इसके साथ ही खान पान में अपेक्षित सावधानी बरतने से उनकी सेहत में काफी सुधार है। वे सामान्य दिनचर्या के साथ सहज जीवन जी रहे हैं।

इस आलेख की लेखिका के पिता श्री बैजनाथ सिंह (77 वर्षीय) को नवम्बर 2019 में फेफड़ों में कैंसर की पुष्टि हुई थी। एलोपैथिक चिकित्सकों ने रोग के फैलाव के मद्देनजर स्थिति को अत्यंत गंभीर बताया। तब अधिक आयु और अत्यधिक कमजोरी के कारण ब्लड रिपोर्ट ठीक न आने से कीमोथेरेपी कराने की स्थिति नहीं बन सकी। तब वैकल्पिक चिकित्सा के रूप में वाराणसी के कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट की दवा के साथ कैंसररोधी हवन सामग्री से यज्ञ किया गया। यद्यपि रोग की गंभीरता के कारण तीन बार फेफड़ों से पानी निकाला गया, मगर दो महीने की इस चिकित्सा को इस मायने में संतोषजनक कहा जा सकता है कि ब्लड रिपोर्ट पहले से बेहतर हुई है तथा भूख और कमजोरी के स्तर में भी पहले से सुधार आया है। चिकित्सकों का कहना है कि इन वैकल्पिक चिकित्सीय प्रयोगों को साथ में रखते हुए आधुनिकतम तकनीक से कीमो और इम्यूनोथेरेपी से सकारात्मक परिणाम की संभावना देखी जा सकती है।

इंदौर की 66 वर्षीय महिला जानकी गुप्ता को चार साल पहले गले के कैंसर की पुष्टि हुई थी। उन्होंने इंदौर के ‘काउ युरीन रिसर्च सेंटर’ से उपचार कराने के साथ पूरी आस्था से कैंसररोधी हवन सामग्री से प्रात: और सायंकाल छह माह तक नियमित अग्निहोत्र किया। इसके परिणामों से वे अत्यंत उत्साहित हैं तथा सामान्य दिनचर्या के साथ जीवन व्यतीत कर रही हैं।

लखनऊ के जानकीपुरम निवासी 54 वर्षीय प्रदीप शर्मा तो यज्ञ चिकित्सा को किसी संजीवनी से कम नहीं मानते। वे बताते हैं कि सात साल पहले ब्रेन ट्यूमर में कैंसर सेल्स की मौजूदगी का पता चलने पर एक बारगी उनका समूचा परिवार सकते में आ गया था। वे ही परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे तथा बच्चे छोटे और वृद्ध मां-बाप का दायित्व भी उन्हीं के कंधों पर था। आमदनी भी बस किसी तरह गुजर-बसर लायक थी। तब गायत्री पविार के एक कार्यकर्ता के कहने पर उन्होंने शांतिकुंज से कैंसररोधी हवन सामग्री से हवन और उसके काढ़े के साथ गिलोय और गोमूत्र अर्क का प्रयोग किया। तीन महीने बाद जव पुन: सिटी स्कैन कराया तो रिपोर्ट देख परिवार में सभी की आंखें खुशी से छलक उठीं। लगभग आठ माह की इस सस्ती और सुलभ चिकित्सा ने उन्हें पूरी तरह निरोगी कर दिया था।

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