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भारतीय संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकार अधिकार और कर्तव्य

 

भारतीय संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों एवं कर्तव्यों का विवरण अध्याय 2 , 3 , 4, और 4 A में मिलता है।
अध्याय 2 में भारतीय नागरिकता किसको प्राप्त होगी ?- इसके संबंध में प्रावधान किया गया है। 26 जनवरी 1950 कोजब भारतीय संविधान लागू हुआ तब किस-किस को नागरिकता की मान्यता देनी थी ? पाक से जो लोग भारत आए उन नागरिकों के नागरिकता के संबंध में क्या अधिकार होंगे ? – यह विवरण भी इसी अध्याय में दिया गया है। जो लोग उस समय भारत से पाकिस्तान के लिए प्रस्थान कर उनकी यहां रह गई संपत्ति पर उनके कैसे अधिकार होंगे ? इसके अतिरिक्त ऐसे भारतीय नागरिकों के अधिकार जो भारतवर्ष की स्वतंत्रता के समय प्रवासी थे अथवा संविधान के लागू होने के समय प्रवासी थे, तथा ऐसे व्यक्तियों के मौलिक अधिकार जिन्होंने स्वेच्छा से विदेशी नागरिकता प्राप्त कर ली हो सहित हमारी संसद को नागरिकता के विषय में किस प्रकार के अधिकार प्राप्त हैं ? – ये सभी विषय अध्याय 2 की विषय वस्तु हैं।


अध्याय 3 में नागरिकों के जिन मौलिक अधिकारों का उल्लेख मिलता है उनमें समता का अधिकार जैसे कानून के समक्ष सब बराबर हैं। भारत का संविधान व्यवस्था करता है कि देश के नागरिकों के मध्य राज्य धर्म, जाति व लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा। रोजगार के समान अवसर सभी नागरिकों को प्राप्त होंगे। धर्म ,जाति या लिंग के आधार पर किसी भी व्यक्ति के रोजगार के अवसरों को छीना नहीं जाएगा अर्थात राज्य ऐसी व्यवस्था करेगा कि प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार उपलब्ध हो । भारत का संविधान यह भी व्यवस्था करता है कि छुआछूत को एक अभिशाप के रूप में लेकर उसको मिटाना चाहिए ।इसी प्रकार स्वतंत्रता का अधिकार भी है, जिसमें बोलने का अधिकार ,जीवन और निजी सुरक्षा का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, गिरफ्तारी एवं निरोध के कतिपय मामलों के अधिकार ,शोषण के विरुद्ध अधिकार, मनुष्य से जोर दबाव से अर्थात बलपूर्वक मेहनत मजदूरी कराने से रोकने संबंधी अधिकार, फैक्ट्रीज में बच्चों को मजदूरी से रोकने के प्रावधान, इसके अलावा धर्म की स्वतंत्रता ,धर्म व्यवसाय की स्वतंत्रता समान रूप से प्राप्त होगी। सामाजिक , शैक्षणिक,एवम् आर्थिक विकास के अधिकार होंगे ।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में जिस आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक न्याय की भावना का उल्लेख किया गया है, समानता के इस अधिकार के माध्यम से उसी भावना का सम्मान रखा गया है।

कतिपय वैधानिक स्थिति को विशेष संरक्षण देते हुए संवैधानिक अनुतोष का अधिकार भी इसमें दिया हुआ।
संविधान में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के संबंध में विशेष उल्लेख है। राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि सर्व कल्याणकारी या लोकहितकारी राज्य की स्थापना के संविधानिक संकल्प को पूर्ण करने के लिए राज्य को क्या करना चाहिए ? नागरिकों के प्रति राज्य के क्या उत्तरदायित्व हैं और नागरिकों के क्या अधिकार हैं, उनको भी समझ लेना चाहिए।
इसके अनुसार सभी नागरिकों को सामाजिक और धार्मिक अनुष्ठान करने में राज्य सहायक हो। कहने का अभिप्राय है कि राज्य को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि किसी भी धर्म, संप्रदाय या वर्ग के व्यक्ति को अपनी सामाजिक और धार्मिक परंपराओं के निर्वाह में किसी प्रकार की बाधा अनुभव नहीं होनी चाहिए।
राज्य के लोकहितकारी संकल्प की पूर्ति के लिए संविधान में व्यवस्था की गई है कि समान न्याय और मुफ्त कानूनी सहायता राज्य द्वारा प्रदान की जाए।ग्राम पंचायत का संगठन हो, जिससे ग्रामों का विकास संभव हो। मातृत्व अनुतोष के लिए राज्य कार्य करें। न्यूनतम मजदूरी आदि के बारे में राज्यों द्वारा कानून बनाया जाए। सहकारी समितियों का राज्य विकास करें। शैक्षणिक संस्थाएं 6 वर्ष तक की आयु के बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करें। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े व कमजोर वर्गों के लिए शैक्षणिक संस्थाएं बनाई जाने में राज्य सहयोग कर कानून बनाए। जन स्वास्थ्य के सुधार के विषय में राज्य कार्य करें। कृषि पशुपालन के संबंध में राज्य व्यवस्था करें। पर्यावरण जंगलात और जंगली पशुओं की सुरक्षा के विषय में राज्य व्यवस्था बनाए।
राष्ट्रीय प्राचीन धरोहरों की सुरक्षा के संबंध में राज्य अपने उत्तरदायित्व को पूर्ण करें।
यह सारे प्राविधान भारतीय संविधान को लोक के अनुकूल बनाते हैं और देश में ‘लोक’ का ‘तंत्र’ स्थापित करने में सहायक सिद्ध होते हैं। वास्तव में भारतीय संविधान की इस अनूठी विशेषता ने लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्था का सच्चा स्वरूप स्थापित करने का अपना संकल्प व्यक्त किया है। यह अलग बात है कि देश के संविधान के इस प्रावधान को देश की राजनीति यथार्थ में लागू नहीं करवा पाई।


हमारे संविधान का यह भी प्रावधान है कि न्यायपालिका कार्यपालिका में राज्य अंतर बनाकर के रखे । अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा का प्रसारण राज्य द्वारा किया जाना चाहिए। अध्याय 4Aमें नागरिकों के कर्तव्य दिए हुए हैं । ये संशोधन करके बाद में जोड़े गए हैं। इनके पालन से देश के नागरिक राष्ट्रीय सोच को विकसित करने में सफल होते हैं। जिन सामूहिक बिंदुओं को हमने अपने सम्मान का प्रतीक माना है उन सबके प्रति सम्मान का भाव प्रकट करना हमारा संवैधानिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है।
जैसे संविधान, संस्थाएं, राष्ट्रीय ध्वज ,राष्ट्रगान का सम्मान करना। राष्ट्र की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखना। भारत की संप्रभुता ,एकता और अखंडता की सुरक्षा करना । इसके प्रति देश के सभी नागरिकों को समान भाव से कार्य करना चाहिए।
राष्ट्र की सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी तथा राज्य द्वारा या राष्ट्र द्वारा बुलाए जाने पर अपने कर्तव्य की पूर्णता करें।
हमारा देश प्राचीन काल से ही नारियों के प्रति सम्मान का भाव व्यक्त करता आया है। कुछ लोगों ने निहित स्वार्थ में मध्यकालीन इतिहास में कुछ ऐसी विकृतियां पैदा कीं जिनसे महिलाओं के अधिकारों का हनन हुआ । भारत के प्राचीन आदर्श समाज की स्थापना के दृष्टिगत भारतीय संविधान में महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षा करने का भी प्रावधान किया गया है।
नागरिकों के मौलिक कर्तव्य के माध्यम से यह भी स्पष्ट किया गया है कि देश के नागरिक परस्पर सामंजस्य व भाईचारा बढ़ाएं। भाषा ,क्षेत्र आदि पर नागरिक भेदभाव न करें। हमारी भारत की सामासिक संस्कृति व सभ्यता को संरक्षित करें। जिसमें देश के सभी नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं और उन सबको कानून के समक्ष समानता प्रदान की गई है।
भारतीय नैसर्गिक पर्यावरण, जंगल आदि की सुरक्षा नागरिक करें ।नदियां, पहाड़ ,जंगल, जंगली जानवर आदि की सुरक्षा नागरिक करें। जन संपत्ति की रक्षा करना। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में अपना कर्तव्य समर्पण भाव से पूरा करें।
वास्तव में भारतीय संविधान में कर्तव्यों और अधिकारों की जो स्थापना की गई है उसका उद्देश्य केवल यह है कि भारत प्राचीन काल से ही कर्तव्यपरायण समाज का समर्थक रहा है । क्योंकि कर्तव्यपरायण समाज ही सबके अधिकारों की सुरक्षा की पूर्ण गारंटी है ।
इस सबके बाद जरा सा विचार करें कि हम अधिकारों की तो मांग करते हैं परंतु अपने कर्तव्यों के प्रति कितने सजग हैं ?,हमारा कितना समर्पण भाव राष्ट्र के प्रति है?महत्वपूर्ण यह है जिस राष्ट्र से ,जिस भारत माता की गोद में पैदा हुए, जिसकी भूमि का अन्न खाया और जल पिया उसके लिए हमने क्या किया?
यदि इस पर हम विचार करें तो वेद की उस व्यवस्था को हमें स्वीकार करना चाहिए जिसमें स्पष्ट किया गया है कि यह भूमि हमारी माता है और हम इसके पुत्र हैं। जैसे माता के प्रति उसके पुत्रों का कर्तव्य हमारे समाज में देखा जाता है वैसा ही व्यवहार हम अपने भारत माता के साथ करें । यदि यह आदर्श स्थिति हम समाज में स्थापित करने में सफल हुए तो भारतीय संविधान की मूल आत्मा का सम्मान करना भी हम सीख लेंगे।

 

देवेंद्र सिंह आर्य

चेयरमैन : उगता भारत

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