Categories
इतिहास के पन्नों से डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

संविधान सभा की बहस से संबंधित तथ्य

आज देश अपना ७६ वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। २६ जनवरी १९५० भारतीय संविधान के लागू होने की तिथि है। उस दिन हमारे सनातन राष्ट्र भारतवर्ष ने अपने गणतंत्र का दिशा पथ निर्धारित किया था। सदियों तक लाखों करोड़ों बलिदान देने के पश्चात जिस गणतंत्र के राष्ट्रपथ पर देश ने चलने का निर्णय लिया था, सचमुच वह बहुत ही त्याग, तपस्या और बलिदान के पश्चात मिले हुए क्षण थे। जिन्हें देखने के लिए लोगों की आंखें तरस गई थीं।

९ दिसंबर १९४६ को भारत के संविधान के निर्माण के लिए संविधान सभा की पहली बैठक हुई। इस सभा की अध्यक्षता डॉ सच्चिदानंद सिन्हा द्वारा की गई थी जबकि दो दिन बाद अर्थात ११ दिसंबर को संविधान सभा का स्थाई अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद को बनाया गया। २६ नवंबर १९४९ तक २ वर्ष ११ माह और १८ दिन में संविधान बनकर तैयार हुआ। इस दौरान कुल मिलाकर संविधान सभा ने १६५ दिन अपनी विशेष बैठकें की। इन बैठकों के माध्यम से संविधान सभा के सदस्यों ने संविधान की एक-एक धारा पर खुलकर अपने विचार व्यक्त किये। १०१ दिनों तक प्रत्येक खंड पर जमकर चर्चा हुई। संविधान देश के लिए किस प्रकार उपयोगी हो सकता है, किस धारा में कितना संशोधन अभी अपेक्षित है ? किस वर्ग का अभी तक शोषण होता रहा है और अब उसे किस प्रकार का संवैधानिक संरक्षण प्रदान कर अपना विकास करने के समुचित अवसर प्रदान किए जाएंगे ? इत्यादि बिंदुओं और धाराओं पर विस्तृत चर्चा हुई।

संविधान सभा में सदस्यों ने कुल मिलाकर लगभग ३६ लाख शब्द बोले थे। संविधान सभा में डॉ भीमराव अंबेडकर ने प्रत्येक धारा पर अपने विचार व्यक्त करने में कीर्तिमान स्थापित किया। उन्होंने संविधान निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। विश्व के अन्य देशों के संवैधानिक प्राविधानों का उन्होंने विस्तृत अध्ययन किया था। यही कारण था कि संविधान सभा के वह एकमात्र ऐसे सदस्य थे, जिन्होंने सबसे अधिक शब्द बोले थे। वह संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। यद्यपि उनका कार्य संविधान सभा द्वारा पारित किए गए प्रस्तावों या धाराओं का संग्रह करना और प्रस्तावित धाराओं का लेखन करना मात्र था, परंतु उन्होंने संविधान सभा में होने वाली चर्चाओं में भी जिस प्रकार बढ़ चढ़कर भाग लिया, उससे उनकी बौद्धिक प्रतिभा का सभी लोगों ने लोहा माना।

भारतवर्ष प्राचीन काल से ही लोगों के मौलिक अधिकारों का समर्थक और संस्थापक – उद्घोषक देश रहा है। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जितनी भारत के आर्ष ग्रन्थों में उपलब्ध है, उतनी संसार के अन्य ग्रन्थों में कहीं पर भी उपलब्ध नहीं है। इतना अवश्य है कि भारत ने प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का संरक्षण दूसरे व्यक्ति के कर्तव्य निर्वाह की पवित्र भावना के माध्यम से करवाया। लोगों को समझाया कि यदि आप अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना सीख जाएंगे तो आपके अधिकारों की सुरक्षा अपने आप हो जाएगी। भारत के इस मौलिक विचार का हनन और दोहन मुस्लिम और ब्रिटिश काल में जमकर किया गया। जिससे लोगों के मौलिक अधिकारों को समाप्त कर दिया गया। राजशाही की तानाशाही ने जमकर लोगों का शोषण किया।

परिणामस्वरूप जब देश को स्वाधीनता प्राप्त हुई तो संविधान सभा में मौलिक अधिकारों पर १६ दिनों तक बहस कराई गई। इससे संविधान सभा के सदस्यों को मौलिक अधिकारों की स्थिति, स्थापना और उनके परिणामों पर चर्चा करने का पूरा अवसर प्राप्त हुआ। संविधान सभा की सामूहिक इच्छा थी कि अब जितनी चर्चा कर ली जाएगी, उतना ही भविष्य में इसका लाभ मिलेगा। संविधान सभा विचारों के ठोस धरातल पर खड़े होकर राष्ट्र के सुदूर भविष्य के लिए महत्वपूर्ण कार्य कर रही थी। उसकी इच्छा थी कि भविष्य में वह दुर्दिन दोबारा लौटकर न आएं, जब लोगों के संवैधानिक मौलिक अधिकारों का हनन हो । इसके लिए संविधान को प्रत्येक दृष्टिकोण से न केवल लचीला बनाने का विचार किया गया अपितु उसे उन प्रावधानों के प्रति कठोर बनाने का भी प्रयास किया गया, जिनसे देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होना संभावित था।

भारतीय संविधान सभा ने निर्णय लिया कि राज्य को लोक कल्याणकारी बनाए रखने के लिए कुछ नीति निर्देशक तत्वों का समायोजन भी किया जाए। वास्तव में ये नीति निर्देशक तत्व देश की सरकारों के पथ प्रदर्शक तत्व कहे जा सकते हैं। इनका उद्देश्य लोकशाही को लोकतंत्र के पवित्र पथ पर डाले रखकर उसे जन भावनाओं के अनुकूल बनाए रखना था। इतना सुंदर और उदार बनाना था कि भविष्य में लोक कल्याण के अपने पवित्र उद्देश्य से वह इधर-उधर होने के बारे में सोच भी न पाए। राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों पर संविधान सभा ने ६ दिनों तक चर्चा की थी। एक-एक सदस्य ने अपने विचार व्यक्त किये और संविधान के प्रति सभी देशवासियों की श्रद्धा समान रूप से बनी रहे, इसके लिए संविधान को सर्वप्रिय बनाए रखने के दृष्टिकोण से प्रेरित होकर संविधान सभा ने भरसक प्रयास किया। देश का कोई भी वर्ग या संप्रदाय संविधान नाम की पवित्र पुस्तक से शासित और अनुशासित होने में अपने आप को गौरवान्वित अनुभव करे, इसके लिए प्रत्येक वर्ग और संप्रदाय की भावनाओं का सम्मान करने का यथासंभव प्रयास किया गया। देश के नागरिकों की नागरिकता की अवधारणा पर भी संविधान सभा में प्रतिष्ठित सदस्यों ने खुलकर अपने विचार व्यक्त किए थे। इस पर भी पर्याप्त समय दिया गया था।

जिन सदस्यों को प्रारूप समिति का सदस्य बनाया गया था, संविधान सभा में उनकी विशेष जिम्मेदारी थी। उन्हें प्रारूप समिति का सदस्य ही इसलिए बनाया गया था कि वह संविधानों के विषय में अन्य सदस्यों की अपेक्षा कुछ अधिक जानकारी रखते थे। उनकी बौद्धिक प्रतिभा की इसी विशिष्टता का सम्मान करते हुए उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वह संविधान सभा में अन्य सदस्यों की अपेक्षा अधिक तार्किक और ठोस विचार प्रस्तुत करेंगे। यही कारण था कि प्रारूप समिति के सदस्य अन्य सदस्यों की अपेक्षा कुछ अधिक देर तक अपना सकारात्मक चिंतन संविधान की धाराओं पर खुलकर प्रस्तुत करते थे। अन्य सदस्यों के विचारों पर प्रारूप समिति के सदस्य अपनी प्रतिक्रिया देते थे। उन विचारों का तार्किक आधार पर सुधार करने का प्रयास करते थे और सुधरे हुए सुथरे विचारों को लिखने का कार्य भी करते थे। संविधान सभा में कुल १५ महिला सदस्य थीं। उनमें से भी केवल १० ने ही संविधान सभा की सक्रिय बहस में भाग लिया था। इनमें अम्मू स्वामीनाथन, एनी मैस्करीन, दक्षिणायनी वेलायुधन, बेगम एजाज़ रसूल, दुर्गाबाई देशमुख, हंसा जीवराज मेहता, कमला चौधरी, लीला रॉय, मालती चौधरी, पूर्णिमा बनर्जी के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।।बेगम एजाज़ रसूल संविधान सभा की एकमात्र ऐसी मुस्लिम महिला थीं, जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की वकालत की थी। संविधान सभा की कुल बैठकों में होने वाली चर्चाओं के कुल दो प्रतिशत भाग में ही महिलाओं की सहभागिता रही थी। स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस की सदस्य जी दुर्गाबाई ने महिला सदस्यों में सबसे अधिक शब्द बोलने का कीर्तिमान स्थापित किया था। संविधान सभा में नामित रियासतों के सदस्यों की तुलना में प्रान्तों के सदस्यों ने बहस में अधिक सक्रिय भाग लिया था। जहां प्रांतीय सदस्यों ने लगभग ८५ प्रतिशत चर्चाओं में अपना बहुमूल्य योगदान दिया, वहीं रियासतों के सदस्यों ने लगभग ६ प्रतिशत चर्चाओं में ही अपना योगदान दिया।

यहां पर यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि देश की स्वाधीनता के समय राज्य और रियासत में एक मौलिक अंतर था। वास्तव में यह मौलिक अंतर राज्य और रियासत के शासन प्राधिकार और स्थिति के आधार पर था। रियासतें स्थानीय शासकों द्वारा शासित स्वतंत्र इकाइयां थीं। वहीं राज्य ब्रिटिश शासन के अधीन थे। रियासतें ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं थीं। ज्ञात रहे कि देश की स्वाधीनता के समय २० रियासतें ऐसी थीं, जो आकार में ब्रिटेन और फ्रांस से भी बड़ी थीं अर्थात ब्रिटेन और फ्रांस से २० गुणा भारत आजादी के समय स्वाधीन था।

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं। )

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
betnano giriş
meritking giriş
hititbet giriş
meybet
meybet
orisbet giriş
orisbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
milanobet giriş
hiltonbet giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
hiltonbet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
hititbet
hititbet
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino
vdcasino
hititbet
hititbet
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet giriş
betmarino
betmarino
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
norabahis giriş
celtabet giriş
celtabet giriş
pokerklas giriş
pokerklas giriş
meybet
meybet
hititbet giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino
vdcasino
meritbet giriş
meritbet giriş
vaycasino giriş
piabellacasino giriş
piabellacasino giriş
norabahis giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
pokerklas
pokerklas
norabahis giriş
vdcasino
vdcasino
pokerklas
pokerklas
hititbet giriş
Pokerklas giriş
pokerklas
pokerklas
hititbet
hititbet
betnano giriş
betasus giriş
pokerklas