अब भी समय है चेत जाएं

ये आह कहीं का न छोड़ेगी

 

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

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dr.deepakaacharya@gmail.com

 

उत्तराखण्ड आपदा को हुए आखिर सोलहवाँ भी बीत गया। आज इतने दिनों बाद भी देशवासी अपने ही देश में लावारिश से भूख-प्यास और अधमरी अवस्था में जाने किन-किन पहाड़ों पर किस तरह एक-एक क्षण काट रहे हैं।

इसका अंदाज वे लोग नहीं लगा सकते जो इंसान को खिलौना और कठपुतलियाँ या कि अपनी कुर्सियों को बनाने या कि घर भरने के औजार समझते रहे हैं।

जो लोग एसी चैम्बरों या रिसोर्ट्स में बैठे रहने को ही जिन्दगी समझ बैठे हैं या एसी वाहनों, वायुयानों में सफर के आदी हैं,जिनके लिए देश या देशवासियों का वजूद कुछ मायने नहीं रखता अपने मुफतिया आनंद और भोग-विलास के सामने, वे क्या जाने इंसान का दर्द।

संवेदनाओं की इतनी भयानक और भीषणतम मृत्यु का जो दौर हाल के दिनों में हमने देखा और सुना है, वैसा सदियों में कभी नहीं हुआ। शंकर के आँगन में प्रलय का यह महाताण्डव और वह भी दैव भूमि में।

आखिर श्रद्धालुओं का क्या दोष था। वे सारे के सारे श्रद्धा और भक्ति में सराबोर थे और भगवान के दर्शन ही इन्हें अभीप्सित थे। प्रलय होना दैवीय या प्राकृतिक आपदा माना जा सकता है लेकिन इस ताण्डव के बाद जो कुछ हो रहा है वह दिल दहला देने वाला है।

हर मोर्चे पर हम अपनी महानता के जयघोष लगाते रहे हैं लेकिन उत्तराखण्डीय महाप्रलय ने हमारे सारे गर्व और गौरव को चूर-चूर करके रख दिया है।

यही नहीं तो जो हम सुन-देख रहे हैं उसने तो शर्म की सारी दीवारें ढहा कर बेशर्मी की हद ही कर दी है। इस आपदा ने हमारे प्रबन्धों, मानवीय संवेदनाओं, त्वरित राहत और बचाव से लेकर जनजीवन को संकटों से मुक्त कराने की हमारी जिजीविषा तक को चुनौती दे डाली है।

यह तो ठीक था कि सेना के जवानों ने हौसला बनाए रखा वरना औरों के भरोसे तो इतना भी नहीं हो पाता जितना हुआ है। इस त्रासदी में दैवदूत बनकर आए हमारे कई जवान शहीद हो गए। उन सभी के लिए हमारी श्रद्धांजलि आसमान में गूंजनी चाहिए। हमारे वीर जवानों की सभी ने सराहना की और माना कि जो कुछ हुआ है वह सेना की बदौलत ही हो पाया है वरना ….।

दैव और प्रकृति तभी रूठती है जब पाप का बोझ बढ़ जाता है। आखिर दैव भूमि पर धर्म और दूसरे कर्मों के बहाने जो कुछ हो रहा था उसी का नतीजा था कि सब कुछ बह चला। इसके बाद भी हम लोगों ने अब तक कोई सब नहीं लिया है।

हमें न ईश्वर का भय है, न प्रकृति का। हम अपने अहंकार तथा स्वार्थों में इतने बेखौफ, स्वच्छन्द और उन्मुक्त हो चले हैं कि अब भी जो कुछ बोल रहे हैं, कर रहे हैं और सोच रहे हैं उनमें कहीं कोई साम्यता या निर्मलता नज़र नहीं आ रही है।

अब भी हमें यह अक्ल नहीं आ पायी है कि जो कुछ कहें, जो कुछ करें वह सब सत्य से भरा हुआ, मानवीय संवेदनाओं से भरापूरा, निरपेक्ष और सर्वजन हिताय तथा निष्काम भावना से होना चाहिए।

आखिर क्यों हम सत्य को छिपाना चाहते हैं, आ
खिर इसके पीछे हमारी मंशा क्या है? शायद वह ईश्वर ही जानता है। दैव भूमि पर सत्यासत्य का विवेक खोकर आखिर हम ईश्वर और प्रकृति को और अधिक कुपित होने का मौका क्यों देना चाह रहे हैं।

यह बात आज हमें भले ही समझ में नहीं आएगी। लोेगों का दर्द, पीड़ाएं और मृ

 

त्युतुल्य स्थितियां, मारे गए लोगों के शवों की क्षत-विक्षत हालत और श्मशान से भी बदतर हालातों को हम तभी जान पाएंगे जब खुद हमें ऎसे हालातों से रूबरू होना पड़े।

ईश्वर करे हम ऎसी आपदा से बचे रहें अन्यथा धर्म और सत्य से जरा सा भी विचलन हमें किन स्थितियों में पहुंचा सकता है, यह या तो भगवान केदार जानते हैं, या फिर माँ गंगा।

शिशुपाल की तरह पाप पर पाप न करते जाएं, अपने आपको सुधारें अन्यथा हमारी कथनी और करनी में यही सब चलता रहा तो फिर तो होने वाला है उसे भुगतने के लिए तैयार रहें।

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