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इतिहास के पन्नों से भयानक राजनीतिक षडयंत्र

इतिहास पर गांधीवाद की छाया , अध्याय – 15 ( 2), सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण पर भी आया था गांधीजी का विरोध

 

सरदार वल्लभ भाई पटेल के विशेष प्रयासों से पण्डित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर के जीर्णोद्धार का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया था । यह बहुत बड़ी बात थी कि सरदार वल्लभभाई पटेल गांधीवादी पण्डित जवाहरलाल नेहरू को भी इस बात के लिए तैयार कर लिया था कि सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण हो। नेहरू सरकार के इस ऐतिहासिक निर्णय की जानकारी जब सरकार के पिता ( राष्ट्रपिता नहीं ) गाँधीजी को हुई तो उन्होंने अपना विशेषाधिकार प्रयोग किया और इस महान ऐतिहासिक कार्य में अड़ंगा डाल दिया । गांधीजी ने अपनी संविधानेत्तर शक्तियों का प्रयोग करते हुए और राष्ट्र की आत्मा के साथ खिलवाड़ करते हुए सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया ।


यह तथ्य तब और भी अधिक दुखदायी बन जाता है जब गाँधीजी के विषय में हमें पता चलता है कि उन्होंने 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला था। उनके लिए सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य तो सरकारी खजाने से किया जाना एक ‘पाप’ था , जबकि एक मस्जिदों का पुनर्निर्माण सरकारी खर्चे से किया जाना पूर्णतया ‘पुण्य’ कार्य था।
बाद में कांग्रेसी सरकारों के लिए भारत में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा यही हो गई कि मन्दिरों का विनाश करो और मस्जिदों का उद्धार करो। सरकारी खर्चे से मस्जिद बनाई जा सकती है , लेकिन मंदिर नहीं ।यह देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुरूप माना गया। स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात का इतिहास गांधीवाद की इसी छाया से विनिर्मित हुआ है।

“पाकिस्तान को दो 55 करोड रुपए”

देश के विभाजन के समय पाकिस्तान से आए हिन्दुओं को भारी त्रासदी का सामना करना पड़ा था। उनकी करुणा भरी कथाओं को सुन या जानकर आज भी लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। परंतु ‘महात्मा’ का हृदय उनके करुण क्रंदन को सुनकर और देख कर भी नहीं पसीजा था । वैसे एक महात्मा से यह अपेक्षा की जाती है कि वह बहुत ही सहज हृदय से द्रवित होकर लोगों के प्रति करुणा से भर उठता है । हमें पता चलता है कि पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में शरण ली तो गान्धीजी ने उन हिन्दुओं को मस्जिदों से बाहर निकल जाने का आदेश दिया , क्योंकि किसी ‘काफिर’ के मस्जिद में जाने से उनकी पवित्रता भंग होने का खतरा ‘महात्मा जी’ को था । उन लोगों ने दिसम्बर की ठिठुरती हुई रातों में अपना समय कैसे काटा होगा ? यह केवल वही जानते होंगे ।
22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबेटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। जब पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया तो नेहरू सरकार ने यह सराहनीय निर्णय लिया कि अब पाकिस्तान को उसके 55 करोड रुपए नहीं दिए जाएंगे । इस पर गांधीजी की आत्मा ‘कराह’ उठी । मजहब के नाम पर देश के विभाजन के दोषी पाकिस्तान के शासकों ने गांधी पर पता नहीं कैसा जादू फेर रखा था कि उनके लाख पापों के उपरान्त भी वह उन्हें क्षमा करने को तैयार रहते थे । जबकि हिन्दू समाज को वह सदा दण्डित करने की बात सोचते थे । यही कारण था कि जब गांधी जी को सरकार के इस निर्णय की जानकारी हुई तो वे उसी समय पाकिस्तान को ₹55 करोड़ दिलवाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने के उद्देश्य से प्रेरित होकर आमरण अनशन पर बैठ गए। उनके आमरण अनशन से नेहरू सरकार दबाव में आ गई और यह राशि पाकिस्तान को दे दी गयी।
कांग्रेस के लोग आज भी पाकिस्तान के गीत गाते मिल जाते हैं । सचमुच सावधान रहने की आवश्यकता है। चाल , चरित्र और चेहरा तो पढ़ना ही है साथ ही इनका इतिहास भी पढ़ना है , तभी देश बच पाएगा। देश के नए इतिहास में इन तथ्यों का उल्लेख किया जाना बहुत आवश्यक है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक उगता भारत

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