हमेशा यही होता है
कभी संयोग, कभी वियोग

– डॉ. दीपक आचार्य
9413306077

योगायोग, संयोग-वियोग आदि जड़-चेतन सभी के लिए वह शाश्वत क्रम है जो कभी मिश्रित अवस्था में आते हैं, कभी क्रम बदल कर तो कभी बीच-बीच में। जिस प्रकार हर क्रिया की अपनी प्रतिक्रिया हुआ करती है उसी प्रकार हर प्रकार के संयोग के साथ वियोग बँधा हुआ है।जहाँ हम संयोग के क्षणों में परम प्रसन्नता का अनुभव करते हुए दिली सुकून और आनंद पाते हैं वहीं हमें यह भी स्पष्ट मान लेना चाहिए कि वियोग का दु:ख भी हमारे लिए तैयार है। संसार और सांसारिक संसाधन सभी कुछ अनित्य हैं और जो अनित्य, क्षणभंगुर है वह स्थायी या शाश्वत भाव कभी प्राप्त नहीं कर सकते।इस सत्य को जो जान लेता है वह दोनों ही अवस्थाओं में मौज में रह सकता है। जो लोग सुख के क्षणों में बौराए हुए रहते हैं उन्हीं को दु:ख के दिनों में अत्यन्त आप्त और दु:खी देखा जाता है। इसके विपरीत जो लोग सुख के दिनों में भी समत्व भाव को पाए रहते हैं और इस सुख का उनके जीवन पर कोई उत्प्रेरक प्रभाव नहीं पड़ता है, असल में वे ही सुख को अनंत गुना व्यापक कर भोगने का सामर्थ्य रखते हैं।

यह सुख धन-दौलत, पद या ऊँचे कद से लेकर किसी भी प्रकार के भोग-विलासी व्यक्ति या संसाधन का हो सकता है। लेकिन जो लोग अपने जीवन में सिर्फ और सिर्फ सुख की कामना करते रहते हैं उन्हें भी सुख तो प्राप्त होता ही है लेकिन दु:ख के दिनों में वे घबरा जाते हैं। जबकि उन लोगों को यह साफ तौर पर मान लेना चाहिए कि जितना सुख प्राप्त हो रहा है उतना ही दु:खों का परिमाण समानुपात में तैयार हो रहा है।

ऐसे में जो लोग सुख और भोगों में आसक्त हो जाते हैं उन लोगों को दु:ख का अहसास भी ‘यादा होता है। इसके विपरीत जो लोग सुख और भोग-विलास को अनासक्त रहकर भोगते हैं उन्हें दु:ख का अहसास दूसरों की अपेक्षा ‘यादा होता है। इसलिए जो लोग या संसाधन हमें प्राप्त होते हैं उनके प्रति अनासक्त रहकर कर्मयोग और व्यवहार धाराओं को अपनाने में ही भला है। हर व्यक्ति या तत्व की आयु निश्चित है। इसकी समाप्ति के उपरान्त एक क्षण के लिए भी कोई इनके वियोग से रोक नहीं सकता।

जीवन में सुख और दु:ख कभी भी एकतरफा नहीं हुआ करते हैं। जहाँ भी दु:ख होगा वह स्थायी नहीं रहेगा, इसका स्थान सुख जरूर लेगा। इसी प्रकार जहाँ सुख का साम्रा’य है वहाँ दु:ख की सत्ता भी जरूर आने वाली होती है। जो लोग सुख और दु:खों को अनासक्त होकर देखने की आदत बना लेते हैं उनके लिए दोनों ही स्थितियाँ बराबर होती हैं और वे किसी भी अवस्था में व्यथित या कुण्ठित नहीं होते हैं।

अपनी आसक्ति किसी व्यक्ति के प्रति हो और वह प्रेम से लेकर सै€स के धरातलों को छूने वाली हो या फिर यह आसक्ति जमीन-जायदाद के प्रति हो, जितने गहरे तक हम भीतर रहने और आनंद पाने का प्रयास करते हैं उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप उतना ही वियोग का दु:ख हमें प्राप्त होगा।

संबंध चाहे कैसे भी हों, हर अवस्था में संबंधों से प्राप्त सुख के अनुपात में दूरियों या वियोग का दु:ख प्राप्त होगा ही, इसमें कोई संशय है ही नहीं। मनुष्य को जो भी सुख प्राप्त होते हैं वे मानवीय सामर्थ्य और मनुष्य के चरम लक्ष्य के लिए मददगार साबित होने वाली सीढ़ियाँ हैं।

अपने आस-पास या चारों तरफ का माहौल जितना अ’छा होता है, ऋतुओं का सुकून जितना अनुकूल हो उतना ही हमारे मन-मस्तिष्क में प्रसन्नता का भाव होता है। यह मुदिता हमें अपने लक्ष्योंं को प्राप्त कराने में सहयोगी होती है। इन अवसरों का लाभ प्राप्त कर अपने आत्मीय आनंद को ऊर्ध्वगामी बनाने का निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए।

ऐसे में हमारे जीवन में जो-जो सुकून प्राप्त होते हैं वे हमें उत्तरोत्तर ऊपर के चक्रों की ओर ले जाते हैं इसलिए हमें जो आनंद या सुकून प्राप्त होता है उसकी ऊर्जा को धीरे-धीरे ऊपर की ओर ले जाकर प्रतिष्ठित करनी चाहिए। इससे आनंद बहुगुणित होने के साथ ही संयोग-वियोग दोनों जंजालों से मुक्त रखकर दैवीय ऊर्जाओं से सम्पन्न बना डालने और जीवन्मुक्ति का आनंद पाने की क्षमता हम पा सकते हैं।

यह आनंद ऊर्ध्वगामी यात्रा की प्रक्रिया को तीव्रतर करता है। लेकिन आमतौर पर लोग तात्कालिक भोग-विलास और सुकून में ऐसे रम जाते हैं कि लक्ष्य की ओर ले जाने वाली सीढ़ियों पर ही अधमरे होकर बार-बार नीचे गिरने लगते हैं और ऐसे में आसक्त मन-मस्तिष्क व्यभिचारी होकर रह जाता है।

ऐसे लोगों के लिए पैसा बनाना, जमा करना, भोग-विलास आदि ही जीवन का मुख्य ध्येय बनकर रह जाते हैं। ऐसे लोगों की जीवनयात्रा संयोग-वियोग के बीच उलझ कर रह जाती है। ऐसे लोगों को जब संयोगजन्य सुखों की प्राप्ति में आंशिक या स्थायी विराम लग जाता है और वियोगजन्य दु:खों की प्राप्ति का दौर आरंभ होने लगता है तब अपार कष्ट होता है और ऐसे में पूरा जीवन बोझ लगने लगता है।

संयोग और वियोग दोनों ही अवस्थाओं में व्यक्ति को अनासक्त रहने का अभ्यास करना चाहिए तभी वह सुख और दु:ख दोनों ही अवस्थाओं से ऊपर उठकर आत्मतत्व की प्राप्ति करने में समर्थ हो सकता है। अपने मन के धरातल पर ऐसा न कर पाएं तो अपने आपको ईश्वर के हवाले कर भगवान की शरणागति स्वीकार कर लें। ईश्वरीय आभामण्डल में प्रवेश करने के बाद प्रारŽधों का क्षय होकर अपने आप अपने सभी प्रकार के कर्मों का संचालन होने लगता है और उस अवस्था में जो आनंद प्राप्त होता है, वही वास्तविक और नित्य है।

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