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इतिहास के पन्नों से

फ्रांस के खुफिया दस्तावेज और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत का सच!

विनय सुल्तान

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत इतिहास की सबसे उलझाऊ गुत्थियों में से एक है. इतिहास के इस एक वाकये पर इतनी सारी कॉन्स्पिरेसी थ्योरी हैं कि कोई एक सिरा पकड़ पाना मुश्किल है. अक्सर नए-नए दावे आते रहते हैं. अब एक फ्रेंच इतिहासकार ने दावा किया है कि नेताजी जहाज दुर्घटना में नहीं मरे थे.

फ्रेंच इतिहासकार जे.बी.पी. मोरे ने फ्रांस की खुफिया सेवा के एक पुराने दस्तावेज के हवाले से ये दावा किया है. मोरे के मुताबिक नेशनल आर्काइव्ज ऑफ़ फ्रांस में मिले 11 दिसंबर, 1947 के एक दस्तावेज में नेताजी के जिंदा होने की बात कही गई है.

इकॉनोमिक टाइम को दिए बयान में मोरे ने कहा, “इस दस्तावेज में ये नहीं कहा गया है कि वो ताइवान में हुई प्लेन दुर्घटना में मारे गए थे. इसके उलट इसमें लिखा गया है कि फिलहाल बोस का पता-ठिकाना अज्ञात है. इसका मतलब है कि फ्रेंच खुफिया एजेंसिया इस बात से कोई इत्तेफ़ाक नहीं रखती थीं कि बोस 18 अगस्त, 1945 को ताइवान में मारे गए.”

वो अपने दावे को साफ़ करते हुए कहते हैं, “खुफिया एजेंसी के दस्तावेज के हिसाब से बोस भारत-चीन सीमा से फरार होने में कामयाब रहे थे. वहां से वो कहां गए, इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं है. लेकिन ये दस्तावेज कम से कम ये तो बताता ही है कि बोस 1947 के दिसंबर तक जिंदा थे.

बोस की मौत की गुत्थी सुलझाने के लिए सरकार तीन बार इस मामले की जांच करवा चुकी है. दुर्घटना के करीब 11 साल बाद 1956 में 3 सदस्यों वाली शाहनवाज कमिटी बनाई गई थी. इसने अपनी रिपोर्ट में नेताजी के विमान हदासे में मारे जाने की बात कही थी. 1970 में इंदिरा सरकार ने पंजाब हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस जी.डी. खोसला को इस मामले को सुलझाने का जिम्मा सौंपा. खोसला कमीशन ने भी शाहनवाज कमिटी के निष्कर्षों की पुष्टि की.

पिछली मई में सुभाष चंद्र बोस की मौत के कारणों पर डाली गई आरटीआई के जवाब में भी गृह मंत्रालय ने नेताजी के विमान हादसे में मारे जाने की बात कबूली है. हालांकि ज्यादातर लोग इस बात से बहुत इत्तफ़ाक नहीं रखते हैं. 1999 के मुखर्जी कमीशन की रिपोर्ट में नेता जी के ताइहोके एयरपोर्ट पर विमान दुर्घटना में मारे जाने की बात को स्वीकार किया था. उस समय इस बात पर बहुत बहस हुई थी. मुखर्जी कमीशन की रिपोर्ट पर उपजे विवाद के बाद सरकार ने इस कमीशन की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते डाल दिया था.

सुभाष चंद्र बोस की मौत पर एक मजबूत थ्योरी ये है कि उनकी मौत विमान हादसे के बहुत बाद में सोवियत रूस में हुई. हाल ही में गृह मंत्रालय ने उनकी मौत से जुड़े 37 दस्तावेजों को सार्वजानिक किया है. इस दस्तावेजों के हिसाब से आजादी के बाद करीब 20 साल तक नेहरू के कहने पर भारतीय खुफिया एजेंसी ने उनके परिवार वालों पर निगरानी रखी. यह तथ्य कई मायनों में चौंका देने वाला है. ये वही नेहरू थे जो 18 अगस्त 1945 को नेताजी की मौत की खबर सुन कर जार-जार रोए थे. जब आजाद हिन्द फ़ौज के सिपाहियों पर लाल किले में मुकदमा चला, तो 25 साल में पहली बार नेहरू ने बैरिस्टर की वर्दी पहन कर आजाद हिन्द फ़ौज के जवानों के पक्ष में जिरह की थी.
सुभाष चंद्र बोस की मौत पर ‘इंडियाज बिगेस्ट कवरअप’ लिखने वाले अनुज धर ने बीबीसी को दिए अपने इंटरव्यू में बताया था कि जब उन्होंने 2006 में प्रधानमंत्री कार्यालय से नेताजी के मौत से जुड़ी फाइलों को सार्वजानिक करने की मांग की थी, तब फाइलों को संवेदनशील कह कर उनकी मांग को टाल दिया गया था।

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