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इतिहास के पन्नों से

जब नेताजी ने कहा था कि चरण स्पर्श करना या शीश झुकाना गुलामी का प्रतीक है, इसलिए केवल जय हिंद बोलो…

  • डॉ राकेश कुमार आर्य

आज मैं बिहार के सासाराम जिले में प्रवास पर हूं। यहां पर तिलौथू हाउस में श्रीमान रणजीत सिन्हा जी के यहां रुका हुआ हूं। यहां पर कई प्रकार की विशेष जानकारी प्राप्त हुई। श्रीमान सिंह जी के एक संबंधी आजाद हिंद फौज की लेफ्टिनेंट लेफ्टिनेंट भारती ‘आशा’ सहाय चौधरी के सुपुत्र हैं । श्रीमती आशा सहाय चौधरी सौभाग्य से अभी हम सब के बीच हैं। वे 95 वर्ष की हैं। कुछ समय पूर्व जब उनसे प्रधानमंत्री मोदी स्वयं आकर मिले थे तो उन्होंने खड़े होकर प्रधानमंत्री को सैल्यूट किया था, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आप मुझे सेल्यूट क्यों कर रही हैं ? मैं तो बहुत छोटा हूं । तब उन्होंने कहा था कि मैं नरेंद्र मोदी को नहीं, देश के प्रधानमंत्री को सैल्यूट कर रही हूं।

उनका जन्म 1928 में कोबे, जापान में हुआ था। उनके पिता आनंद मोहन सहाय आज़ाद हिंद सरकार के मंत्रिमंडल में मंत्री थे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उनको अपना राजनीतिक सलाहकार नियुक्त किया था। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के साथ भी उनके घनिष्ठ संबंध थे। उन्होंने इंडियन नेशनल आर्मी के संस्थापक रासबिहारी बोस के साथ भी काम किया था। जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंडमान पहुंचे थे तो इस द्वीप पर नेताजी के बाद दूसरे व्यक्ति वही थे, जिन्होंने अपना कदम रखा था।

श्रीमती आशा सहाय 15 वर्ष की अवस्था में अपनी माता सती सेन सहाय के साथ नेताजी से मिली थी उसे समय उनकी माता ने उन्हें संकेत किया कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस सामने खड़े हैं आप उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लीजिए। तब नेताजी ने कहा था कि अभी इस प्रकार की परंपराओं को पूरी तरह छोड़ दीजिए। क्योंकि चरण स्पर्श करना या किसी के सामने शीश झुकाना गुलामी का प्रतीक है। इसलिए जय हिंद कहकर गौरव के साथ सीना चौड़ा करके मस्तक ऊंचा रखते हुए केवल सेल्यूट कीजिए। मुझे श्रीमती आशा सहाय के सुपुत्र के मुंह से इस प्रसंग को सुनकर बड़ी प्रसन्नता हो रही थी। मुझे पहली बार पता चला कि जय हिंद के अभिवादन में शीश झुकाने की परंपरा क्यों नहीं है ?

15 वर्ष की अवस्था में ही इस वीरांगना ने नेताजी से उनकी आजाद हिंद फौज में सम्मिलित होने का निवेदन कर दिया था। उस पर नेताजी ने कहा था कि अभी आप थोड़ा और बड़ी हो जाओ। तब आपको सेना में सम्मिलित किया जाएगा। उसके 2 वर्ष पश्चात वह पुनः नेताजी के पास गईं और आजाद हिंद फौज में सम्मिलित होने का अपना पुराना आग्रह दोहरा दिया। नेताजी ने उनका एग्री स्वीकार करते हुए अपने अधिकारियों को संकेत किया कि उन्हें उचित प्रशिक्षण दिया जाए। उसके पश्चात उन्हें आजाद हिंद फौज की रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट का लेफ्टिनेंट नियुक्त किया गया। सती देशबंधु चित्तरंजन दास की भतीजी थीं और उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया था। उन्होंने बैंकॉक में प्रशिक्षण लिया और जापानी आत्मसमर्पण के बाद उन्हें जेल में डाल दिया गया। अप्रैल 1946 में वह अपने पिता से फिर मिलीं और वे आशा के चाचा सत्यदेव सहाय के साथ भारत लौट आईं । 1943 और 1947 के बीच जापानी भाषा में लिखी गई उनकी डायरी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तिगत विवरणों में से एक है।

फोटो में उनके सुपुत्र मुझे उनकी इस डायरी के संस्मरणों के आधार पर लिखी हुई पुस्तक भेंट कर रहे हैं । मुझे बताया गया कि आज उनकी श्रवण शक्ति बहुत कमजोर हो गई है, परंतु यदि उनके कान के पास कोई आजाद हिंद फौज या नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम ले दे तो उनके चेहरे पर एक अलग ही प्रकार का ओज और तेज बिखर जाता है।

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