भारतीय विज्ञान की पहुंच वर्तमान विज्ञान से कम नहीं

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गुरूदत्त

विज्ञान और विज्ञान से हमारा अभिप्राय है भारतीय विज्ञान और पाश्चात्य विज्ञान। इसका अर्थ प्राचीन विज्ञान और अर्वाचीन विज्ञान भी है।

क्या प्राचीन काल में भी किसी प्रकार का विज्ञान था? अन्य देशों की बात तो हम नहीं जानते, किन्तु भारतवर्ष में विज्ञान नाम प्रचलित था और उसमें बहुत उन्नति भी हुई थी। भगवद्गीता में, जो महाभारत का एक अंश ही है, विज्ञान शब्द का उल्लेख है और वहां इसकी रूप-रेखा भी वर्णित है।

वहां ज्ञान और विज्ञान की बहुत ही संक्षिप्त परिभाषा इस प्रकार दी गई है – ब्रह्म के समग्र स्वरूप को जानने के लिये ज्ञान-विज्ञान को जानना चाहिये। वह मैं बताता हूं। इसे (अर्थात् ज्ञान और विज्ञान को) जान लेने के उपरान्त अन्य कुछ जानने योग्य नहीं रह जाता। प्रकृति अष्टधा है जिसमें आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी-ये पंच महाभूत हैं। इनके साथ मन, अहंकार और बुद्धि हैं। यह अपरा (जो दूर नहीं अर्थात् प्रत्यक्ष ही है अर्थात् जड़) कहलाती है। इसके अतिरिक्त जीव (जीवात्मा) है। इन दोनों से सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है। धारण किये जाने का अभिप्राय है कि इनके संयोग बना है। इन दोनों (जड़ प्रकृति और जीवात्मा) से जगत बन गया समझना चाहिये। इनके अतिरिक्त परमात्मा जगत को उत्पन्न और इसका पालन करने वाला है। यह ही सब कुछ इस जगत में है। इसकी सामान्य और विशेष जानकारी को ज्ञान और विज्ञान कहा गया है।

विशेष ज्ञान से अभिप्राय है जगत के मूल का ज्ञान। यह जगत कहां से उत्पन्न हुआ? जिससे इसकी उत्पत्ति हुई उसका स्वरूप, उसके लक्षण और उसका स्वभाव क्या है? प्रकृति के आठ रूपों को अपरा कहा है। इससे स्पष्ट है कि यह जगत का मूल नहीं है। मूल तो वह ही हो सकता है जो परे अर्थात् इससे सूक्ष्म है। प्रश्न है कि वह सूक्ष्म क्या है और उसका उक्त कथन में क्यों वर्णन नहीं किया? वहां जीवात्मा और परमात्मा का कथन तो है परन्तु प्रकृति का कथन क्यों नहीं?

इसमें कारण यह प्रतीत होता है कि इस चराचर दृश्य-जगत का प्रकृति, जो पूर्वोक्त आठ रूपों की मूल है, स्वयं भाग नहीं है। प्रकृति अपने मूल रूप में जगत का अंग नहीं। इस पर भी वह जगत के पदार्थों के निर्माण में कारण है। जगत में प्रकृति, पूर्व में कहे आठ रूपों में ही पाई जाती है।

अत: ज्ञान और विज्ञान से अभिप्राय है जगत का सामान्य ज्ञान और विशेष ज्ञान। सामान्य ज्ञान तो वह है जो दृश्य पदार्थों का ज्ञान है और इनमें अदृश्य, अप्रत्यक्ष दूसरे शब्दों में अव्यक्त पदार्थों के ज्ञान को विज्ञान के नाम से प्रकट किया है। अप्रत्यक्ष अर्थात् अव्यक्त के अर्थ हम आगे यथास्थान लिखेंगे। यहां हमारा इतना बताने से ही अभिप्राय है कि ज्ञान और विज्ञान इस जगत के पदार्थों की सामान्य और विशेष जानकारी को कहते हैं।

स्वाभाविक रूप में प्रकृति के आठ रूप ही प्रत्यक्ष के अन्तर्गत आते हैं। इनके गुण, कर्म और स्वभाव का वर्णन ही ज्ञान है। साथ ही इन आठ रूपों के निर्माण करने की परमात्मा की क्रिया को भी ज्ञान में सम्मिलित किया है। जीवात्मा जब तक शरीर में रहता हुआ जगत में क्रियाशील रहता है, वह भी ज्ञान के क्षेत्र में माना जाता है। प्राणी के रूप में उसका कार्य, ज्ञान में आता है। परन्तु ज्यों ही वह शरीर से पृथक होता है, तब उसका वर्णन विज्ञान में आयेगा। इसी प्रकार परमात्मा का निर्मल, शुद्ध, बुद्ध, नित्य स्वरूप और स्वभाव, विज्ञान में वर्णन किया गया है। संक्षेप में दृश्य-जगत का गुण, कर्म, स्वभाव, इसमें सहयोग देने वाले पदार्थों के सहयोग की विधि ज्ञान के अन्तर्गत ली जाती है, परन्तु कार्य जगत के मूल पदार्थों के गुण, कर्म और स्वभाव, कार्य जगत से पृथक, विज्ञान में वर्णित हैं। ज्ञान का विस्तृत वर्णन सांख्य और वैशेषिक दर्शनों में है और मूल तत्वों का वर्णन विशेष रूप में ब्रह्मसूत्रों (वेदान्त दर्शन) में दिया गया है।

वर्तमान विज्ञान का क्षेत्र भी अति विशाल है। उसके भी कुछ एक अंशों को लेकर उनके समानान्तर भारतीय विज्ञान के अंशों को रखकर तुलनात्मक वर्णन हम करेंगे।

एक बात यहां स्पष्ट करनी आवश्यक है। हम दोनों, अर्थात् भारतीय ज्ञान- विज्ञान और पाश्चात्य विज्ञान में विरोध नहीं देखते। जहां कहीं भी विरोध प्रकट हो रहा है वह वैज्ञानिकों और भारतीय तत्वदर्शियों में भ्रांति के कारण है। सत्य तो एक ही है और जहां तक ज्ञान-विज्ञान का सम्बन्ध है, वह सत्य का निरूपण ही है। इस कारण जो सत्य, ज्ञान और विज्ञान है, वे दो हो ही नहीं सकते।

इस पर भी यह स्पष्ट ही है कि कुछ किसी में छूट गया है। उस छूट गये अंश में वह ज्ञान विज्ञान अधूरा है। इस विषय में भी हम अपना मत यहां लिखने का यत्न करेंगे।

हमने ऊपर भारतीय ज्ञान-विज्ञान की रूप रेखा लिखी है। इसी प्रकार पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान की भी संक्षिप्त रूप रेखा लिख दें तो उपयुक्त होगा। पाश्चात्य विज्ञान, जिसे आधुनिक विज्ञान भी कहा जाता है, वह साइंस के नाम से विख्यात है। साइंस शब्द के मूल अर्थ ज्ञान ही हैं। इस शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन के शब्द से है जिसका अर्थ ज्ञान है।

साइंस के ज्ञाता साइंस के लक्षण इस प्रकार करते हैं- लेटिन भाषा के शब्द ‘साँयंशिया’ का अर्थ ज्ञान है। इस शब्द का वर्तमान काल में प्रयोग कुछ ऐसे ज्ञान पर होता है जिसका क्षेत्र इतना विस्तृत है कि कोई भी व्यक्ति उसके एक अंश से अधिक को समझ नहीं सकाता। साथ ही सांइस विषयक ज्ञान नानाविध है। यह अन्तर अणु विषयों से लेकर मानसिक क्रियाओं तक फैला हुआ है। ‘थर्मोडायनैमिक'(अणुओं के चलन) के गणित के नियमों से लेकर वंशों के आर्थिक सम्बन्धों तक, नक्षत्रों के मरण-जन्म से लेकर पक्षियों के स्थानान्तरण तक, अति क्षुद्रबीन में देखे जाने वाले ‘वायरसों’ (एक प्रकार के अति सूक्ष्म जीव) से लेकर महान् ‘गेलेक्टिक नेबुलाओं (आकाश गंगा तथा हिरण्यगर्भों) तक, संस्कृृतियों और रवेदार कणों के उत्थान और पतन से लेकर अणुओं और ब्रह्माण्डों के निर्माण और विघटन तक फैला हुआ है। इसमें प्राणियों के कार्य के ज्ञान और विचार करने के नियमों और उनमें विघ्न बाधाओं का ज्ञान भी सम्मिलित है।

साइंस के इन लक्षणों से भारतीय ज्ञान-विज्ञान की तुलना की जा सकती है। यदि कुछ भी ध्यान से देखा जाये तो पता चलेगा कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान का लक्षण यद्यपि संक्षिप्त है, तो भी वह अधिक व्यापक है और उसमें वर्तमान विज्ञान के लक्षणों की भांति अस्पष्टता नहीं। यदि यह कहा जाये कि केवल मात्र पाठकों को भयभीत करने के लिए किसी रेगिस्तान के रेत के कणों की गणना आरम्भ कर देने के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं। जो कुछ साइंस की व्याख्या में ऊपर लिखा गया है वह एक शब्द में लिखा जा सकता है। वह है कार्य जगत। कार्य जगत की व्याख्या ही साइंस है। कार्य जगत दृश्यमान् जगत है।

यही बात गीता में कुछ व्याख्या से कही गई है। वह अधिक अर्थयुक्त और व्यापक अर्थ रखती है। परा और अपरा के ज्ञान-विज्ञान को साइंस कहते हैं। ‘साइंसÓ में इतनी कमी है कि वह कार्य जगत के मूल तक पहुंची प्रतीत नहीं होती। वह कार्य जगत के गुंजल में ही अभी तक उलझी हुई है। वर्तमान वैज्ञानिक मूल के विषय में कुछ न जानते हुए भी अपने ज्ञान को पूर्ण मानते हैं। जब से वर्तमान विज्ञान का आविर्भाव हुआ है, तब से ही वह कार्य जगत के मूल तत्व की अवहेलना करता हुआ भी अपने ज्ञान को पूर्ण मानता आया है। वर्तमान विज्ञान का जन्मदाता अरस्तु यह मानता था कि प्रकृति ही सब कुछ है और यह शून्य से उत्पन्न हुई है।

भाग्य की विडम्बना है कि वर्तमान विज्ञान अरस्तु के काल से बहुत उन्नत हो जाने पर भी, अभी तक कार्य जगत के मूल में शून्य के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं पा सका। अरस्तु के पद चिन्हों पर चलता हुआ वर्तमान विज्ञान वृक्ष, पक्षी, प्राणी, नदी, नाले और पहाड़, सागर तथा सूर्य, चन्द्र से अपनी खोज आरम्भ करता है और सत्य की ओर जा रहा है। इसके विपरीत ऐसा प्रतीत होता है कि किसी न किसी प्रकार भारतीय वैज्ञानिक उस मूल सत्य को देख पाया है और उससे पग पग पर निरीक्षण करता हुआ कार्य जगत की ओर अग्रसर हुआ है।

भारतीय वैज्ञानिक अपने लक्ष्य की ओर पहुंचे अथवा नहीं, वह हम इस पुस्तिका के अन्त में बताने का यत्न करेंगे। किन्तु इतना तो स्पष्ट है कि वर्तमान काल के वैज्ञानिक कार्य जगत के मूल तक नहीं पहुंचे। वे अभी यह भी नहीं जान सके कि इस सब प्रपंच का अन्तिम मूल क्या है और यह जगत क्यों बना है?

वर्तमान वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐटम के कभी बनने वाले टुकड़ों का संयुक्त द्रव्यमान टूटने वाले ऐटम के द्रव्यमान से कम होता है। उस समय वह अंश ताप और प्रकाश में बदलता सा दृष्टिगोचर होता है और यह माना जाता है कि वह द्रव्यमान प्रकाश और ताप में परिवर्तित हो जाता है। अत: यह कार्य जगत ताप और प्रकाश के अतिरिक्त कुछ नहीं। यह है गली का वह अवरूद्ध छोर जहां पहुंचकर आज का वैज्ञानिक हताश हो बैठा है। आगे जाने का इसमें न तो साहस है और नही इच्छा।

साइंस शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन शब्द साइंशिया शब्द में लगाई जाती है। इस व्युत्पत्ति को ढूंढने वाले, कदाचित भाषा के इतिहास को नहीं जानते। इसी कारण वे लैटिन से पूर्व की ओर उन्मुख नहीं हो सके। वैदिक भाषा के जानने वाले यह मानते हैं कि वैदिक भाषा सबसे पुरानी भाषा है। वैदिक भाषा में एक शब्द है सांख्य। उसका अर्थ है ज्ञान। हमारा यह विचारित मत है कि लैटिन भाषा का साइंशिया और वर्तमान अंग्रेजी का साइंस दोनों शब्द सांख्य से ही निकले हैं। हमारा विचार है कि जहां तक विशुद्ध विज्ञान का सम्बन्ध है, भारतीय विज्ञान की पहुंच वर्तमान विज्ञान से कम नहीं रही। यदि कहा जाए कि भारतीय विज्ञान वर्तमान विज्ञान से अधिक गहराई तक पहुंचा हुआ है तो अधिक सत्य होगा।

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