भारत-चीन संबंध- चुनौतियाँ और उभरते मुद्दे

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प्रस्तुति – श्रीनिवास आर्य

हाल ही में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए थे, जहाँ उन्होंने तमिलनाडु के महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) में भारतीय प्रधानमंत्री के साथ एक अनौपचारिक वार्त्ता में हिस्सा लिया। उल्लेखनीय है कि इस प्रकार की अनौपचारिक वार्त्ताओं की शुरुआत वर्ष 2018 में हुई थी और ये दोनों प्रतिनिधियों को द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक महत्त्व के अतिव्यापी मुद्दों पर चर्चा जारी रखने का अवसर प्रदान करती हैं।

हालिया अनौपचारिक शिखर सम्मेलन

भारत और चीन के मध्य यह दूसरा अनौपचारिक शिखर सम्मेलन तमिलनाडु के महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) में आयोजित किया गया था।
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व वर्ष 2018 में पहला अनौपचारिक शिखर सम्मेलन चीन के शहर वुहान में संपन्न हुआ था।
विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान के अनुसार, इस अनौपचारिक सम्मेलन में दोनों नेताओं ने वैश्विक और क्षेत्रीय महत्त्व के अतिव्यापी, दीर्घकालिक और रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा की।
महाबलीपुरम और उसका महत्त्व

भारत ने मामल्लपुरम को भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ (Soft Power) के प्रतीक के रूप में चुना।
मामल्लपुरम या महाबलीपुरम पूर्ववर्ती पल्लव वंश, जिसने दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में 275 CE से 897 CE तक शासन किया,के काल का एक महत्त्वपूर्ण शहर है।
यह दुनिया भर में अपनी वास्तुकला के लिये काफी प्रसिद्ध है।
उल्लेखनीय है कि महाबलीपुरम पुरातन काल में काफी प्रसिद्ध बंदरगाह था और सिल्क रूट का हिस्सा होने के कारण भारत का यह क्षेत्र (महाबलीपुरम) चीन और कई अन्य क्षेत्रों के साथ व्यापार करता था।
भारत चीन संबंधों का विकास

ध्यातव्य है कि हज़ारों वर्षों तक तिब्बत ने एक ऐसे क्षेत्र के रूप में काम किया जिसने भारत और चीन को भौगोलिक रूप से अलग और शांत रखा, परंतु जब वर्ष 1950 में चीन ने तिब्बत पर आक्रमण कर वहाँ कब्ज़ा कर लिया तब भारत और चीन आपस में सीमा साझा करने लगे और पड़ोसी देश बन गए।
20वीं सदी के मध्य तक भारत और चीन के बीच संबंध न्यूनतम थे एवं कुछ व्यापारियों, तीर्थयात्रियों और विद्वानों के आवागमन तक ही सीमित थे।
दोनों देशों के मध्य व्यापक तौर पर बातचीत की शुरुआत भारत की स्वतंत्रता (1947) और चीन की कम्युनिस्ट क्रांति (1949) के बाद हुई।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू एक स्वतंत्र तिब्बत के पक्ष में थे, नेहरू जी के इस विचार ने शुरुआती दौर में भारत और चीन के संबंधों को कमज़ोर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उल्लेखनीय है कि भारत और तिब्बत के मध्य आध्यात्मिक संबंध चीन के लिये चिंता का विषय था।
वर्ष 1954 में नेहरू और झोउ एनलाई ने “हिंदी-चीनी-भाई-भाई” के नारे के साथ पंचशील संधि पर हस्ताक्षर किये, ताकि क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिये कार्ययोजना तैयार की जा सके।
वर्ष 1959 में तिब्बती लोगों के आध्यात्मिक और लौकिक प्रमुख दलाई लामा तथा उनके साथ अन्य कई तिब्बती शरणार्थी हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में बस गए। इसके पश्चात् चीन ने भारत पर तिब्बत और पूरे हिमालयी क्षेत्र में विस्तारवाद और साम्राज्यवाद के प्रसार का आरोप लगा दिया।
चीन ने भारत के मानचित्र में प्रदर्शित 104,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र पर दावा प्रस्तुत किया और दोनों देश के मध्य अंतर्राष्ट्रीय सीमा के संशोधन की मांग की।
वर्ष 1962 में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने लद्दाख और तत्कालीन नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी में मैकमोहन रेखा के पार भारत पर आक्रमण कर दिया, जिसके बाद दोनों देश के मध्य युद्ध शुरू हो गया एवं संबंध और अधिक खराब स्थिति में पहुँच गए।
वर्ष 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की ऐतिहासिक यात्रा ने दोनों देशों के मध्य द्विपक्षीय संबंधों में सुधार के एक नए चरण की शुरुआत की और जिसके माध्यम से भारत और चीन के संबंध पुनः सामान्य होने लगे।
विभिन्न क्षेत्रों पर भारत-चीन संबंध

राजनीतिक संबंध
भारत ने 1 अप्रैल, 1950 को चीन के साथ अपने राजनयिक संबंध स्थापित किये थे और इसी के साथ भारत पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने वाला पहला गैर-समाजवादी देश बन गया था। वर्ष 1962 में भारत और चीन के मध्य सीमा संघर्ष की शुरुआत दोनों देशों के संबंधों के लिये एक गहरा झटका था। परंतु वर्ष 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की ऐतिहासिक यात्रा ने दोनों देशों के मध्य संबंधों को सुधारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यदि वर्तमान संदर्भ में बात करें तो दोनों देशों के प्रतिनिधियों के मध्य समय-समय पर द्विपक्षीय वार्त्ताओं के साथ-साथ अनौपचारिक सम्मेलनों का आयोजन भी किया जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि दोनों देश अपने दीर्घकालिक हितों को लेकर सजग हैं।

वाणिज्यिक और आर्थिक संबंध
भारत और चीन ने वर्ष 1984 में एक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसके तहत उन्हें मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) का दर्जा प्रदान किया गया। इसके पश्चात् वर्ष 1994 में दोनों देशों ने दोहरे कराधान से बचने के लिये भी एक समझौते पर हस्ताक्षर किये। भारत और चीन के बीच व्यापार और आर्थिक संबंधों में पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी देखी गई है। वर्ष 2000 की शुरुआत में दोनों देशों के बीच 3 बिलियन डॉलर का व्यापार था, जो कि वर्ष 2017 में बढ़कर 84.5 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया।

सांस्कृतिक संबंध
भारत और चीन के मध्य सांस्कृतिक आदान-प्रदान की शुरुआत कई शताब्दियों पहले हुई थी। कुछ ऐसे भी साक्ष्य मौजूद हैं जो भारत की प्राचीन वैदिक सभ्यता और चीन की शांग-झोउ सभ्यता के मध्य 1500-1000 ई.पू. के आस-पास वैचारिक और भाषायी आदान-प्रदान को दर्शाते हैं। पहली, दूसरी और तीसरी शताब्दी के दौरान कई बौद्ध तीर्थयात्रियों और विद्वानों ने ऐतिहासिक ‘रेशम मार्ग’ के माध्यम से चीन की यात्रा की। इसी तरह कई चीनी यात्री जैसे- इत्सिंग, फाह्यान और ह्वेनसांग आदि भी भारत की यात्रा पर आए। इसके अलावा शैक्षणिक आदान-प्रदान हेतु वर्ष 2003 में पेकिंग विश्वविद्यालय में भारतीय अध्ययन केंद्र की भी स्थापना की गई थी। चीन में भी योग तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है। उल्लेखनीय है कि 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में नामित करने हेतु संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के सह-प्रायोजकों में चीन भी एक था। भारतीय फिल्में भी चीन में काफी लोकप्रिय हैं और वहाँ काफी अच्छी कमाई करती हैं।

शैक्षिक संबंध
भारत और चीन ने वर्ष 2006 में एजुकेशन एक्सचेंज प्रोग्राम (EEP) पर हस्ताक्षर किये, ज्ञातव्य है कि यह दोनों देशों के बीच शैक्षिक सहयोग को बढ़ाने हेतु किया गया एक समझौता है। इस समझौते के तहत भारत और चीन एक-दूसरे के देश में उच्च शिक्षा के मान्यता प्राप्त संस्थानों के 25 छात्रों को सरकारी छात्रवृत्ति प्रदान करते हैं। दोनों पक्षों के बीच शिक्षा क्षेत्र में सहयोग के परिणामस्वरूप चीन में भारतीय छात्रों की संख्या में वृद्धि हुई है। आँकड़ों के अनुसार, शैक्षणिक वर्ष 2016-17 के दौरान चीन के विभिन्न विश्वविद्यालयों में कुल 18171 भारतीय छात्र विभिन्न विषयों में अध्ययनरत थे।
भारत-चीन संबंध- चिंताएँ

तिब्बत और दलाई लामा

उल्लेखनीय है कि चीन अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता को लेकर सदैव ही काफी संवेदनशील रहा है। तिब्बत पर भारत का शुरुआती पक्ष और भारत द्वारा दलाई लामा को शरण देना ऐतिहासिक रूप से चीन के लिये चिंता का विषय रहा है।
वर्ष 1950 में चीन ने तिब्बत पर आक्रमण कर वहाँ अपनी सत्ता स्थापित कर ली थी और पंडित नेहरू ने उस समय तिब्बत की स्वतंत्रता का पक्ष लिया था।
चीन दलाई लामा (जिनका तिब्बतियों पर गहरा प्रभाव है) को अलगाववादी मानता है।
तिब्बती शरणार्थियों के पुनर्वास में भारत की भूमिका को लेकर चीन का रवैया हमेशा से आलोचनात्मक रहा है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय निकायों और मानवाधिकार समूहों ने भारत के इस कदम की प्रशंसा की है।
सीमा विवाद

भारत और चीन के मध्य अक्साई चिन तथा अरुणाचल प्रदेश में सीमा विवाद भी है। दोनों ही देश दोनों क्षेत्रों पर अपना-अपना दावा प्रस्तुत करते हैं, ज्ञातव्य है कि वर्तमान में अक्साई चिन, चीन के पास है, जबकि अरुणाचल प्रदेश भारत के पास।
मई 2015 में जब भारतीय प्रधानमंत्री ने चीन का दौरा किया था, तो उनका एक मुख्य उद्देश्य चीन के शीर्ष नेतृत्व को वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के स्पष्टीकरण पर चर्चा करने के लिये आमंत्रित करना भी था।
जल विवाद

भारत और चीन के बीच जल विवाद मुख्य रूप से ब्रह्मपुत्र नदी से संबंधित है जो दोनों देशों से होकर बहती है।
बीते कुछ वर्षों में कई बार ऐसी खबरें सामने आती रही हैं कि चीन, तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी के जल प्रवाह को रोकने के उद्देश्य से बांध का निर्माण कर रहा है और यदि ऐसा होता है तो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में जल की आपूर्ति बाधित हो सकती है, यही दोनों पक्षों के मध्य विवाद का एक बड़ा कारण बना हुआ है।
दक्षिण चीन सागर का मुद्दा

चीन, दक्षिण चीन सागर के 90 प्रतिशत हिस्से को अपना मानता है। यह एक ऐसा समुद्री क्षेत्र जहाँ प्राकृतिक तेल और गैस प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।
चीन, ताइवान और वियतनाम स्प्राटल द्वीपसमूह पर अपनी दावेदारी जताते रहे हैं। विदित हो कि स्प्राटल, दक्षिण चीन सागर का दूसरा सबसे बड़ा द्वीपसमूह है।
उल्लेखनीय है कि भारत वियतनाम के अनुरोध पर दक्षिण चीन सागर में तेल का अन्वेषण करता है और चीन हमेशा से भारत के इस कदम की आलोचना करता रहा है।
भारत और चीन- सहयोग क्षेत्र

दोनों देशों के मध्य प्रतिद्वंद्विता के बावजूद उन्होंने सांस्कृतिक स्तर पर काफी अच्छा सहयोग किया है, उल्लेखनीय है कि भारत में जन्मा बौद्ध धर्म चीन में काफी लोकप्रिय है।
दोनों ही देश दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं के समूह ब्रिक्स (BRICS) का हिस्सा हैं। ध्यातव्य है कि वर्ष 2014 में ब्रिक्स नेताओं ने न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना के लिये एक समझौते पर हस्ताक्षर किये। न्यू डेवलपमेंट बैंक का मुख्यालय शंघाई (चीन) में है और इसके वर्तमान अध्यक्ष के वी कामथ (एक भारतीय) हैं।
ज्ञातव्य है कि भारत चीन समर्थित एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक का संस्थापक सदस्य भी था।
भारत की विदेश नीति और चीन

भारत ने चीन से निपटने के लिये दोतरफा नीति अपनाई है। इस नीति के तहत एक ओर भारत चीन के साथ आर्थिक संबंधों को बनाए रखने और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर कूटनीतिक सहयोग को बढ़ाने के लिये ब्रिक्स, एससीओ (SCO) तथा रूस-भारत-चीन त्रिपक्षीय जैसे मंचों से लगातार जुड़ा हुआ है। इसके अलावा भारत ने अपनी सैन्य और निवारक क्षमताओं को बढ़ाने के प्रयासों को नीति के दूसरे पक्ष के रूप में कायम रखा है।

व्यापार घाटा- एक बड़ी चिंता

बीते दो दशकों में भारत और चीन के बीच व्यापार काफी तेज़ी से बढ़ा है और इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहाँ एक ओर वर्ष 2000 में चीन के साथ भारत का कुल व्यापार सिर्फ 3 बिलियन डॉलर था, वहीं वर्ष 2008 में यह बढ़कर 51.8 बिलियन डॉलर पहुँच गया। इस प्रकार चीन अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए भारत के साथ व्यापार करने वाला सबसे बड़ा साझेदार बन गया। विदेश मंत्रालय द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 में दोनों देशों का कुल व्यापार 95.54 बिलियन डॉलर का था, परंतु इसमें भारत द्वारा कुल निर्यात मात्र 18.84 बिलियन डॉलर का था अर्थात् चीन ने भारत से जितना सामान खरीदा उससे पाँच गुना सामान बेचा। उल्लेखनीय है कि भारत का सबसे अधिक व्यापार घाटा भी चीन के साथ ही है, वर्ष 2018 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 57.86 बिलियन डॉलर का था।

धारा 370 और चीन

कश्मीर को लेकर चीन का कहना है कि इस विषय को संयुक्त राष्ट्र चार्टर, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के रेज़ोल्यूशन और द्विपक्षीय समझौते के आधार पर सुलझाया जाना चाहिये। कुछ ही महीनों पूर्व जब जम्मू-कश्मीर की विशेषाधिकार संबंधी धारा 370 को निरस्त किया गया था, तब चीन का कहना था कि भारत ने चीन की संप्रभुता संबंधी चिंताओं का उल्लंघन किया है। चीन की प्रतिक्रिया से स्पष्ट है कि वह लद्दाख पर अपने दावे को दोहरा रहा था। इसके अतिरिक्त हाल ही में चीन ने कश्मीर और धारा 370 का विषय संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी उठाया था और कहा था कि हम जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर अपनी नज़र बनाए हुए हैं।

चीन का हॉन्गकॉन्ग संकट और भारत

भारत का रुख चीन की हॉन्गकॉन्ग नीति के प्रति उदासीन रहा है। भारत ने कभी भी प्रदर्शनकारियों का समर्थन नहीं किया है, जबकि अन्य देश खुलकर हॉन्गकॉन्ग के लोगों का समर्थन करते रहे हैं। चीन के साथ भारत पहले से उपस्थित मतभेदों को बढ़ाना नहीं चाहता है किंतु चीन का रुख कश्मीर जैसे विभिन्न मुद्दों पर भारत विरोधी ही रहा है तथा वह हमेशा पाकिस्तान के समर्थन में खड़ा रहा है। एक ओर चीन कश्मीर मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करना चाहता है, वहीं स्वयं उईगर तथा हॉन्गकॉन्ग के मामले में अमानवीय रुख अख्तियार करता है। भारत को भी चीन के रुख के अनुसार ही अपनी नीति का निर्माण करना चाहिये। यदि चीन कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ खड़ा होता है तो भारत को भी हॉन्गकॉन्ग का खुलकर समर्थन करना चाहिये।
वन बेल्ट वन रोड (OBOR) और भारत

वन बेल्ट वन रोड (OBOR) पहल चीन द्वारा प्रस्तावित एक महत्त्वाकांक्षी आधारभूत ढाँचा विकास एवं संपर्क परियोजना है जिसका लक्ष्य चीन को सड़क, रेल एवं जलमार्गों के माध्यम से यूरोप, अफ्रीका और एशिया से जोड़ना है, परंतु भारत अब तक इस पहल में शामिल नहीं हुआ है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि चीन की OBOR पहल में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) को भी शामिल कर लिया गया है। चूँकि CPEC गलियारा पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुज़र रहा है जिसे भारत अपना हिस्सा मानता है। अतः OBOR में शामिल होने का मतलब है कि भारत द्वारा इस क्षेत्र पर पाकिस्तान के अधिकार को सहमति प्रदान कर देना, जो भारत की संप्रभुता के लिये खतरा है। इसके अलावा OBOR वास्तव में चीन द्वारा परियोजना निर्यात (Project Export) का माध्यम है जिसके ज़रिये वह अपने विशाल विदेशी मुद्रा भंडार का प्रयोग बंदरगाहों के विकास, औद्योगिक केंद्रों एवं विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) के विकास के लिये कर वैश्विक शक्ति के रूप में उभरना चाहता है, जो कि दीर्घकाल में भारत के हित में नहीं होगा।
(साभार)

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