वे लोग धन्य हैं
जो हमें याद करते हैं

– डॉ. दीपक आचार्य
9413306077

यों तो गलाकाट प्रतिस्पर्धा और जमाने की सबसे तेज रफ्तार दौड़-भाग भरी जिन्दगी में कौन किसको याद करता और रखता है। सारे के सारे लोग किसी न किसी उधेड़बुन में मस्त और मग्न हैं। व्यस्तता हर किसी को इतना सताने लगी है कि न अपनों के लिए फुरसत निकाल पाते हैं न औरों के लिए।
व्यस्तताओं की वजह से कई सारे लोग अस्त-व्यस्त रहने लगे हैं और कई तो बेमौके ही अस्त या पस्त हो चले हैं। हर कोई कहीं न कहीं लगा हुआ है। कोई घर-गृहस्थी में उलझा हुआ है, कोई नौकरी-धंधों में, तो कोई अपना कद बढ़ाने। कई सारे लोग जाने किस-किस प्रकार के मद में रमे हुए हैं।
कोई बड़ा आदमी बन बैठा है, तो कोई बड़े आदमी का दर्जा पाकर खुशी के मारे फूला नहीं समा रहा है, कई सारे लोग जाने कौन-कौन से पद पाकर अपने आपको शहंशाह और विधाता मान बैठे हैं। लेकिन आदमियों की एक प्रजाति ऐसी भी है जिसके लिए अपने कामों से कहीं ‘यादा चिंता दूसरे लोगों के बारे में होती है।
देश के हर क्षेत्र की ही तरह अपने इलाके में भी ऐसे खूब सारे लोग हैं जिनके जीवन का एक ही लक्ष्य है- दूसरों के बारे में निरन्तर सोचना, समझने की कोशिश करना और उनके बारे में चर्चाएं करते हुए अजीब से सुकून की प्राप्ति करना।
इस प्रजाति के लोग अपने क्षेत्र में भी खूब पाए जाते हैं। इस किस्म के लोगों का समूह भी जल्दी ही बन जाया करता है €योंकि सूँघने और पाने की क्षमता पा लेने वाले जीव जल्दी दोस्त बन जाया करते हैं। जमाने भर की जायज-नाजायज चर्चाओं और अनर्गल वैचारिक धुंध से इन्हें जो ऊर्जा और सुकून प्राप्त होता है उसके आगे संसार के सारे सुख गौण हुआ करते हैं। फिर इन्हीं की किस्म के लोगों की हर तरफ कोई कमी नहीं है। भगवान सृष्टि पर जिन लोगों को भेजता है उन्हें जीवन भर चलाये रखने के लिए उन्हीं के विचारों के दूसरे लोग भी साथ ही भेज दिया करता है ताकि ये लोग समूह बनाकर इसी में रमे रहें और आनंद पाते रहें।
जमाना कितना ही आगे बढ़ जाए, मगर इन लोगों के लिए पुरातन धारणाएं और परंपराएं पीछा नहीं छोड़ पाती। पहले जमाने में हर गाँव-कस्बे और शहर में ऐसे निठल्ले, भाँजगड़िये और दलाली लोग हुआ करते थे जिनके पास कोई काम नहीं हुआ करता था और ऐसे में कहीं भी बैठक जमा कर पूरे इलाके भर की चर्चा करते हुए ये खुश हुआ करते थे। इसके साथ ही अपने आस-पास होने वाले हर मामले में टाँग फँसा लेने में माहिर थे।
ऐसे लोग जब कभी मौसमी दि€कतों या दूसरी वजहों से किसी दिन चर्चा से वंचित रह जाया करते थे तब अधमरे और बीमार हो जाया करते थे और तब इनके ईलाज के लिए वैद्य या डॉ€टर की बजाय उन लोगों को बुलाया जाता था जिनके साथ ये रोजाना गपियाने की परंपरा बना चुके होते थे। जमाने की हवा की बजाए दुनिया भर की चर्चाएं ही इनके लिए रामबाण दवाई का काम करती थीं।
आज आदमियों की एक प्रजाति तकरीबन इसी किस्म की है जो समाज के लिए कोई रचनात्मक काम भले न कर पाएं, अपनी ड्यूटी के प्रति वफादार हो न हों, कोई सा काम ईमानदारी से भले न कर पाएँ, मगर रोजाना मिलकर गप्पे हाँकने, औरों के बारे में चर्चाएं करने तथा दूसरों को नुकसान पहुंचाने या छवि खराब करने के सारे हथकण्डों की भावभूमि रचने में इनका कोई सानी नहीं।
इनकी महफिल ठीक वैसी ही है जैसे अमंगल से घिरे लोगों के बीच कभी शुभ कर्मों की चर्चा हो ही नहीं पाती। स्पष्ट शŽदों में कहा जाए तो ये लोग असमय विधुर हो चुके लोगों की तरह सोच और व्यवहार रखते हैं और इनकी सोच में कभी भी किसी का शुभ होना आ ही नहीं सकता। जो खुद बुरा और अमंगलकारी है वो दूसरों के बारे में अच्छी बात सपने में भी नहीं सोच सकता।
फिर भी इन लोगों को धन्य माना जाना चाहिए €योंकि ये लोग हमेशा अपना स्मरण बनाए रखते हैं और दिन-रात में इनका चेतन-अवचेतन हमारी छवि तथा विचारों से भरा रहता है। लगातार अपना स्मरण बने रहने से हो सकता है किसी क्षण अपनी शुद्घ-बुद्घि छवि और विचारों का प्रभाव इनके दिमागी कूड़े-करकट को जला कर भस्म कर देने का सामर्थ्य प्राप्त कर जाए।
असल में यही अपना उन वज्र मूर्खों के प्रति सबसे बड़ा उपकार होगा जो मनुष्य जीवन के मायने और लक्ष्यों से भटक गए हैं और कभी उल्लूओं, श्वानों, गिद्घों, गिरगिटों, सूअरों और लोमड़ों से लेकर तमाम प्रकार के पशुओं के स्वभाव को अपना चुके हैं। फिर भी कुछ न हो सके तो उन लोगों को रमे रहने दें चर्चाओं में वरना फिजूल की चर्चाएं नहीं होंगी तो इनके भीतर की पशुता दूसरे किन्हीं रूपाकारों में समाज के सामने आ सकती है।

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