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इतिहास के पन्नों से

संवेदनाशून्य व्यवस्था के चलते हो रहा है हिंदू इतिहास का अपमान और तिरस्कार : दरभंगा का किला जो कि लालकिले से भी ऊंचा था आज हो चुका है बेहाल

दरभंगा के महाराज कामेश्वर सिंह किसी पहचान के मोहताज नहीं थे. ब्रिटिश शासन काल में भी महाराज काफी लोकप्रिय थे. यही कारण है कि तब अंग्रेजी शासन में भी महाराज के रियासत को देखते उन्हें ब्रिटिश हुकूमत की ओर से महाराजाधिराज की उपाधि दी गई थी. तभी से महाराजा को महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कहने की परंपरा शुरू हुई. जो आज भी उन्हीं नामों से प्रसिद्ध है. महाराजा कुल के बीसवें महाराज के रूप में कामेश्वर सिंह ने अपनी अलग पहचान बनाई. कई ऐसे काम किए जिन्हें न सिर्फ आज भी लोग याद करते है बल्कि आगे भी उन्हें याद करते रहेंगे.   (प्रहलाद कुमार)

जब देश अंग्रेजों की गुलामी से आजादी के लिए लड़ाई लड़ रहा था. उसी समय में महाराज ने 85 एकड़ जमीन पर एक आलीशान किला के निर्माण किया था. इस किले के निर्माण के लिए ब्रिटिश फर्म के ठेकेदार बैग कैगटीम को जिम्मेदारी दी गई थी. 90 फ़ीट ऊंचे इस लाल किले का निर्माण 1934 के भूकंप के बाद शुरू हुआ था जो सालों तक चलता रहा. किले के तीन तरफ लगभग 90 फ़ीट ऊंची यह दीवार तैयार हो गई लेकिन किले के पश्चिम इलाके में यह दीवार नहीं बन सकी. क्योंकि तब पश्चिम इलाके में रहने वाले कुछ लोगों ने ऊंची दीवार के कारण धूप की रोशनी घरों में नहीं आने की शिकायत की और मामले को अदालत ले गए. तब अदालत ने इस पर रोक लगा दी थी, तभी से इसे दरभंगा का लालकिला कहा जाता है.

जानकार बताते है कि दिल्ली के लाल किला से कई फ़ीट ऊंचा होने के बावजूद दरभंगा के लालकिले की पहचान फीकी है इसके पीछे कई कारण हैं. इसमें सरकार द्वारा ध्यान न देना प्रमुख कारण माना जा रहा है. पर्यटन के लिए इसे अगर समय के साथ विकसित किया जाता, किले का समय-समय पर मरम्मत का काम किया जाता तो पर्यटन के हिसाब से दरभंगा में विकास के नए रास्ते भी खुलते. लेकिन सरकार की नजरअंदाजी और इसके प्रचार की कमी के कारण दरभंगा का लाल किला अब अपना वजूद को खोने लगा है.

1988 में आए भूकंप के समय की दरभंगा का यह लालकिला कई जगहों से दरक गया, लेकिन तब इसकी मरम्मत का  कोई काम नहीं हुआ. फिर 2015 के तेज भूकंप में कई जगहों पर न सिर्फ छतिग्रस्त हुआ बल्कि किले के ऊपरी हिस्से का मलबा सड़को पर भी गिर था. किले की मरम्मत नहीं होने से किला लगातार जर्जर हाल होता जा रहा है. जगह-जगह दीवाल पर बड़े-बड़े पेड़ निकल आए हैं. कई जगहों पर 10 से 20 फ़ीट तक ऊंची दीवारों में दरार साफ दिखाई दे रही है. दीवार की ऊपरी सतह पर बने बड़े-बड़े गुंबज टूट रहे हैं. दीवार के दक्षिण इलाके में 90 फ़ीट की दीवार घट कर 20-25 फ़ीट ही रह गई है.

दरभंगा लालकिला से बिल्कुल शहर की एक मुख्य सड़क है. जहां से वाहनों का रोजाना आवागमन होता है. लेकिन किले के क्षतिग्रस्त होने के कारण यहां से गुजनेवाले लोगों के मन में हमेशा एक अनहोनी का डर लगा रहता है. किले की इस हालत को देखते हुए दरभंगा नगर निगम ने रास्ते से आने जाने पर रोक लगा दी थी. समय के साथ बोर्ड गायब हो गया फिर सड़क शुरू हो गई. लेकिन किले की मरम्मत का काम कभी शुरू नहीं हुआ.

किले के चारों तरफ सड़क है और सड़क के किनारे पूरी बस्ती बसी है. किले के पास बसे इन परिवारों के अंदर भी हमेशा एक अनजान डर बना रहता है और इस डर के साये में वे वर्षो से जी रहे हैं. दरभंगा लाल किले के अंदर न सिर्फ महाराज का निवास था बल्कि 11 देवी देवताओं के छोटे-बड़े मंदिर भी हैं. राज परिवार पर शोध करने वाली कुमुद सिंह की माने तो किला निर्माण के पीछे महाराज के दो उद्देश्य थे. पहला अगर देश आजाद नहीं हुआ तो उन्हें किले की बदौलत रूलिंग स्टेट का दर्जा मिल जाएगा. दूसरा अगर आजादी मिली तो उनके कुल देवी देवताओं का स्थान सुरक्षित हो जाएगा.

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