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भारत में शहीद दिवस कथा -अशोक “प्रवृद्ध”

विविध संस्कृतियों से समाहित विश्व में सर्वाधिक समृद्ध संस्कृति वाला देश भारत का इतिहास भी अत्यंत गौरवशाली रहा है। अनादिकाल से ही यह देश उन वीरों की कर्मभूमि भी रही है, जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना इस देश के कल्याण के लिए कार्य किए हैं, और अपने देश के लिए प्राणों की बलि देने से भी कभी पीछे नहीं हटे। भारत की स्वाधीनता, कल्याण और प्रगति के लिए लड़ने और अपने प्राणों की बलि दे देने वालों को श्रद्धांजलि देने के लिए भारत में शहीद दिवस मनाये जाने की परिपाटी है। ऐसे शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए सम्पूर्ण भारत में प्रतिवर्ष 30 जनवरी को शहीद दिवस मनाया जाता है, जो मोहनदास करमचंद गाँधी को समर्पित है। भारत में शहीद दिवस की भी अपनी कथा है। वस्तुतः शहीद दिवस भारत में मनाये जाने वाले महत्त्वपूर्ण दिवसों में से एक है। भारत विश्व के उन पन्द्रह देशों में शामिल है, जहाँ प्रतिवर्ष अपने स्वाधीनता सेनानियों को श्रद्धांजलि देने के लिए शहीद दिवस मनाया जाता है। भारत में राष्ट्र के अन्य दूसरे शहीदों को सम्मान देने के लिए एक से अधिक शहीद दिवस मनाया जाता है। शहीद दिवस को राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोदय दिवस भी कहा जाता है। 30 जनवरी के अतिरिक्त रानी लक्ष्मीबाई के जन्म दिवस 19 नवंबर को मध्य प्रदेश के झांसी आदि क्षेत्रों में शहीद दिवस के रूप में मनाते हुए वर्ष 1857 की क्रांति के दौरान अपने जीवन का बलिदान करने वाले लोगों को सम्मान दिया जाता है। रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से लोहा लेते हुए अपने प्राण गंवाकर भारत की प्रथम वनिता की उपाधि पाई थी। उधर झारखण्ड के गुमला जिले के मुरुनगुर वर्तमान मुरगू, सिसई, बसिया, कोलेबिरा, सिमडेगा आदि खड़िया जनजाति बहुल क्षेत्रों में झारखण्ड के महान स्वाधीनता सेनानी तेऽबलंगा अर्थात तेलंगा खड़िया के स्मरण में 23 अप्रैल को शहीद दिवस मनाया जाता है। 23 अप्रैल 1880 को प्रथम स्वधीनता संग्राम 1857 के पूर्व ही गुमला के आस – पास स्वाधीनता की ज्योति जगाने वाले तेऽबलंगा खड़िया अर्थात तेलंगा खड़िया को उनके शिष्यों सहित अंग्रेजी सेना ने धोखे से मार दिया था, जब तेलंगा सिसई के समीप एक बगीचे में जुड़ी पंचैत के प्रतीक सफ़ेद रंग के झंडे को नमन व प्रार्थना कर रहे थे, घेर लिया। प्रार्थना समाप्त करने पर अपने को दुश्मनों से घिरता देख तेलंगा गरज उठे – हिम्मत है तो सामने आकर लड़ो। खड़िया गीतों के अनुसार तेलंगा की उस दहाड़ से समूचा इलाका थर्रा गया था। युद्ध कौशल से प्रशिक्षित जुड़ी पंचैत के सदस्यों से सीधी टक्कर लेने की हिम्मत दुश्मनों में नहीं थी। अंग्रेजों के दलाल सिसई प्रखंड के बरगाँव गाँव निवासी जमींदार बोधन सिंह ने झाडि़यों में छिपकर तेलंगा की पीठ पर गोली चला दी। गोली लगने पर वे गिर पड़े, परंतु बेहोश तेलंगा के पास आने की भी हिम्मत दुश्मनों में नहीं थी। तेलंगा के पुत्र बलंगा और तेऽबलंगा के शिष्यों ने तेऽबलंगा के शव को गुमला के सोसो नीमटोली ले गए और वहीं तेऽबलंगा के शव को दफना दिया गया। बलंगा ने अपने पिता के कब्र पर एक स्मारक बनवाया जिसे आज भी “तेऽबलंगा तोपा टाँड़” अर्थात ‘तेलंगा तोपा टांड’ के नाम से याद किया जाता है।तेऽबलंगा खडिया लोक गीतों और लोक कथाओं में आज भी जीवित हैं। और प्रतिवर्ष 23 अप्रैल को शहीद दिवस के मनाते हुए तेलंगा खड़िया को स्मरण, नमन किया जाता है।

स्वाधीनता सेनानी भारत के तीन सपूतों भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान को श्रद्धांजलि देने के लिए 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया जाता है। 23 मार्च 1931 की मध्यरात्रि को ब्रिटिश शासकों के द्वारा भारत के तीन सपूतों भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर को फाँसी पर लटका दिया गया था।

उल्लेखनीय है कि पंजाब के शेर के नाम से प्रसिद्ध लाला लाजपत राय की पुण्यतिथि को मनाने के लिए उड़ीसा में शहीद दिवस 17 नवंबर के दिन मनाया जाता है। लाला लाजपत राय ब्रिटिश राज से भारत की स्वाधीनता के लिए संग्राम करने वाले एक महान नेता और स्वतंत्रता सेनानी थे, और उनसे भयभीत ब्रिटिश शासकों ने उन पर लाठी चार्ज के बहाने उन्हें अंदरूनी चोट पहुंचाई थी, जिससे बाद में उनकी मृत्यु हो गई थी । सरदार भगतसिंह ने अपने साथियों- राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद, सुखदेव और जय गोपाल के साथ मिलकर लाला लाजपत राय पर लाठी चार्ज के खिलाफ आन्दोलन छेड़ दी। 8 अप्रैल 1929 के दिन चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में पब्लिक सेफ्टी और ट्रेड डिस्प्यूट बिल के विरोध में केन्द्रीय असेंबली में बम फेंका गया। जैसे ही बिल संबंधी घोषणा की गई तभी भगतसिंह ने इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए केन्द्रीय असेंबली में बम फेंका। इसके पश्चात आक्रोशित आंग्ल शासकों के द्वारा क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने का दौर चला। कांतिकारियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ और उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई। न्यायालयीय आदेश के अनुसार भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च, 1931 को सुबह आठ बजे फाँसी लगाई जानी थी, लेकिन भगतसिंह और अन्य क्रांतिकारियों की बढ़ती लोकप्रियता और 24 मार्च को होने वाले विद्रोह के कारण 23 मार्च, 1931 की मध्यरात्रि को को ही लाहौर के जेल में भारत के तीन सपूतों- भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी लगा दी गई और शव रिश्तेदारों को न देकर रातों रात ले जाकर सतलुज नदी के किनारे जला दिए गए। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में उनके योगदान और बलिदान को स्मरण कर उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए शहीद दिवस भारत में 23 मार्च को मनाया जाता है, और उन्हें नमन किया जाता है। भगत सिंह के शरीर का दाह संस्कार सतलुज नदी के किनारे हुआ था। वर्तमान में भारत-पाकिस्तान सीमा में हुसैनवाला में अवस्थित राष्ट्रीय शहीद स्मारक पर एक बहुत बड़े शहीदी मेले का आयोजन उनके जन्म स्थान फ़िरोज़पुर में किया जाता है। यह पूरी कार्रवाई भारतीय क्रांतिकारियों की अंग्रेज़ी हुकूमत को हिला देने वाली घटना की वजह से हुई थी। शहीद दिवस के रूप में जाना जाने वाला यह दिन यूं तो भारतीय इतिहास के लिए काला दिन माना जाता है, परन्तु स्वतंत्रता संग्राम में स्वयं को देश की वेदी पर चढ़ाने वाले यह नायक हमारे आदर्श हैं। इन तीनों वीरों की बलिदानियत को श्रद्धांजलि देने के लिए शहीद दिवस मनाया जान सर्वथा सार्थक है। उधर 22 लोगों की मृत्यु को याद करने के लिए भारत के जम्मू और कश्मीर में शहीद दिवस 13 जुलाई को भी मनाया जाता है। 13 जुलाई 1931 को कश्मीर के महाराजा हरिसिंह के समीप प्रदर्शन के दौरान रॉयल सैनिकों द्वारा उनको मार दिया गया था। मोहनदास करमचंद गाँधी की याद में भी प्रतिवर्ष 30 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि पर शहीद दिवस मनाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। अहिंसा परमो धर्मः वाले श्लोक से सम्बन्धित महाभारत के अनुशासन पर्व, अध्याय 116 व 117 – दानधर्मपर्व, वनपर्व, अध्याय 198 ,पौलोम पर्व – अध्याय 11, आश्वमेधिक पर्व- अध्याय 43/19 आदि में अंकित पूर्ण श्लोक -अहिंसा परमो धर्म: धर्म हिंसा तथैव च। में से आधे श्लोक- अहिंसा परमोधर्मः का पाठ पढ़ाकर राष्ट्र को अधूरा संदेश देने वाले महात्मा गाँधी को मृत्यु हिंसा के द्वारा प्राप्त हुई। 30 जनवरी 1948 को शाम की प्रार्थना के दौरान सूर्यास्त के पहले महात्मा गाँधी पर हमला किया गया था, औरउनकी हत्या कर दी गई थी। इसीलिए इस दिन बापू की पुण्य तिथि पर शहीद दिवस मनाया जाता है और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। यह दिवस भारत में उन लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए भी मनाया जाता है, जो भारत की आजादी, कल्याण और प्रगति के लिए लड़े और अपने प्राणों की बलि दे दी। 30 जनवरी के दिन पूर्वाह्न के ग्यारह बजे दो मिनट का मौन रखा जाता है, दिल्ली के राजघाट पर मोहनदास करमचंद गाँधी के स्मारक को पुष्पों से सुसज्जित किया जाता है। और फिर देश के गणमान्य व्यक्ति दिल्ली के राजघाट पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। भारत के राष्ट्रपति सहित उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री और सेवा प्रमुखों के साथ राजघाट पर बापू की समाधि पर फूलों की माला चढ़ाते हैं। शहीदों को सम्मान देने के लिए अंतर-सेवा टुकड़ी और सैन्य बलों के जवानों द्वारा इसके बाद एक सम्मानीय सलामी दी जाती है। इस दिन सर्वधर्म प्रार्थना सभाएं आयोजित की जाती हैं और बापू के प्रिय भजन गाए जाते हैं। शाम के समय उनका स्मारक मोमबत्तियों से प्रकाशित किया जाता है। और उनको बलिदान को प्राप्त कराने वाले को गालियों से नवाजा जाता है।

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