राजनीतिक दलों की मतभिन्नता देश के लिए एक अभिशाप

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डॉ राकेश कुमार आर्य
लोकतंत्र मतभिन्नता की अनुमति इसलिए देता है कि अंत में सब पक्षों में मतैक्यता हो जाये। किसी भी विषय में गुणावगुण पर सब पक्ष खुलकर बहस करें और फिर किसी एक सर्वमान्य निष्कर्ष पर पहुंच कर एक मत हो जाएं। भारतवर्ष के संविधान ने लोगों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इसलिए प्रदान की है कि देश के मीडिया जगत में भी राष्ट्रीय मुद्दों पर खुलकर बहस हो और सब सकारात्मक दिशा में सोचते-सोचते किसी एक ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचें जिसे राष्ट्रहित में सब को अपनाने में कोई कष्ट ना हो।
यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि हम भारतवासी लोकतंत्र की इस मूल भावना का सम्मान नहीं कर पाए हैं और हमने अभी तक के आचरण से यह सिद्ध कर दिया है कि हम मतभिन्नता को बनाए रखने को ही लोकतंत्र की मूल भावना मान बैठे हैं। हम इसी मूल भावना के लिए जीते हैं और इसी के लिए मरते हैं। जिसका परिणाम यह आया है कि देश में सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियां बढ़ती जा रही है। लोग जाति, संप्रदाय, लिंग, क्षेत्र, भाषा आदि की भिन्नताओं को मिटाने के लिए नहीं, अपितु बढ़ाने के लिए बहस कर रहे हैं। यह नकारात्मक चिंतन हमें यहां तक ले आया है कि देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल ने कर्नाटक के चुनावों के दृष्टिगत वहां की सामाजिक विसंगतियों को और भी बढ़ावा देते हुए ‘लिंगायत’ को एक अलग धर्म की मान्यता देने की घोषणा कर दी है।
एक धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म का इतना बुरा उपयोग करने का उदाहरण अन्यत्र ढूँढना कठिन है। देश का संविधान पंथनिरपेक्षता की घोषणा करता है, और भारत की राजनीति पन्थसापेक्षता की घोषणा कर रही हैं। संविधान की पवित्रता की सौगंध उठाने वाली पार्टियां कांग्रेस के इस कदम का इसलिए समर्थन कर रही है कि उन्हें भाजपा को हराना है और भाजपा कांग्रेस के इस कदम का अपेक्षित तीव्र विरोध इसलिए नहीं कर पाई है कि उसे भी सत्ता चाहिए। यह सत्ता की चाह ही है जो देश के राजनीतिक दलों को सच को सच नहीं कहने देती। इनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति सच को छुपा कर उसे या उसे नजरअंदाज कर जनता को भ्रमित करने का प्रयास करती हैं।
पिछले दिनों तीन तलाक संबंधी विधेयक को हमारे देश की लोकसभा में पारित कर दिया था, जो आज तक राज्यसभा में उलझा पड़ा है। ऐसा क्यों? अच्छा होता कि हमारे राजनीतिक दल इस विधेयक पर मुस्लिम समाज की जड़ता को समाप्त कर ‘आधी आबादी’ के हित में खुले दिल से सोचते और ‘आधी आबादी’ की आजादी की चिंता करते हुए उसे सभ्यसमाज की मुख्यधारा से जोडऩे का कार्य करते। पर यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि इन राजनीतिक दलों ने मुस्लिम समाज की जड़ता को बढ़ावा देते हुए ‘आधी आबादी’ की आजादी की कोई चिंता नहीं की और उसे भेड़ बकरी मानकर यूं ही उपेक्षित कर दिया, जैसे कि उसमें जीवात्मा ही ना हो। जो लोग प्रगतिशीलता की डींगे हांकते हैं, उनकी नाक के तले चौदहवीं शताब्दी की सोच देश में पल रही है और वह चुप हैं। मतभिन्नता उनके आड़े आ रही है और वह सोच रहे हैं कि आडे वक्त में यह मत भिन्नता उन्हें वोट दिलाएगी। इसलिए उन्होंने यह मान लिया है कि ‘आधी आबादी’ की आजादी का तर्क और उसे अधिकार संपन्न करने की मानवीय कसौटी भाड़ में जाए- उन्हें सर्वप्रथम अपना वर्तमान बचाना है। राजनीति का सच भी यही है कि यह सदा वर्तमान को देखती है और राष्ट्रनीति सदा देश के उज्जवल भविष्य को देखती है।
देश में अच्छा राजनीतिक और सामाजिक परिवेश निर्मित करने की आवश्यकता है। इसके लिए हमें मतभिन्नता को हर स्थिति परिस्थिति में मतैक्यता में परिवर्तित करना ही होगा। ‘रामायण’ के ‘अयोध्याकांड’ में रावण बड़े पते की बात कह रहा है। राम की सेना के लंका पहुंचने पर रावण अपने मंत्रियों की बैठक आहूत करता है। जिसके सामने वह कहता है कि जहां एकमत होकर शास्त्र की दृष्टि से मंत्री लोग निर्णय करें- वह मंत्र उत्तम है। जिसमें बहुत तर्क और मतभेद के पीछे अंत में सब मंत्रियों का एक मत हो जाए- वह मंत्र मध्यम है। भिन्नमति रखकर जिसमे अंत तक भिन्नमत ही रखें- वह मंत्र अधम है।
रावण जैसा राक्षस भी यह कह रहा है कि जब भिन्नमत रखकर अंत तक भिन्नमत ही रखा जाता है तो वह कार्य योजना (मंत्र) अधम होती है। इस दृष्टि से तो भारत की सारी राजनीति अधम गति में धंसी पड़ी है। क्योंकि यहां हर राजनीतिक दल अपनी जिस मान्यता पर खड़ा हो जाता है उस पर अंत तक खड़ा रहता है। उसे आप चाहे लाख तर्क दें कि जे.एन.यू. में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा देने वाले राष्ट्रद्रोही हैं, यदि उसने उन्हें राष्ट्रद्रोही नहीं मानना है तो मानेंगे ही नहीं। हम ऐसी ही प्रवृत्ति को टीवी चैनलों पर होने वाली चर्चाओं में देखते हैं ,जहां एक पार्टी का प्रवक्ता यदि किसी बिंदु पर या मुद्दे पर पूरब को चलना आरंभ कर देता है और दूसरा पश्चिम को तो दोनों अंत में अपनी-अपनी दिशा में जाते जाते बहुत दूर निकल जाते हैं। इस प्रकार चर्चा के अंत में पता चलता है कि जिन्हें मतैक्यता के शून्य बिंदु पर लाने की आशा के साथ यह चर्चा आरंभ की गई थी- वे तो अपनी अपनी विपरीत दिशा में जाते-जाते कहीं अनंत में ही विलीन हो गए हैं।
इस प्रकार की मतभिन्नता ने देश में खेमेबंदी की राजनीति को जन्म दिया है। इसी खेमेबंदी की भेंट तीन तलाक वाला विधेयक चढ़ गया है। हमारी राजनीति असहाय और बेबस हुई खड़ी है। वह दुष्टता का और अधमता का उपचार करने में स्वयं को असहाय अनुभव कर रही है। लोकतंत्र की चादर को तार-तार कर अपने-अपने ढंग से राजनीतिक दल उसे ओढ़े खड़े हैं। स्पष्ट है कि तार-तार हुई चादर इन्हें सही ढंग से ढंक नहीं पा रही है और यह सारे के सारे नंगे दिखाई दे रहे हैं। परंतु फिर भी स्वयं को बड़ा शर्मदार और देशसेवक सिद्ध कर रहे हैं। ऐसी निर्लज्ज राजनीति देश का कभी भी कल्याण नहीं कर सकती। राजनीति को राष्ट्रनीति बनाने की आवश्यकता है। जिसके लिए आवश्यकता है कि देश के जनप्रतिनिधियों को राजनीतिक प्रशिक्षण दिया जाए। इनके लिए आदर्श आचार संहिता लागू की जाए, इसके लिए अपेक्षित किया जाए कि संसद या विधानमंडलों का समय अनर्गल बहस में या मतभिन्नता के बढ़ाने में नष्ट न करके राष्ट्र निर्माण की सकारात्मक सोच को अर्थात मतैक्यता को स्थापित करने में व्यय करें। तभी यह सनातन राष्ट्र, ‘विश्वगुरु’ बन सकता है और तभी भारत में गांधी जी का ‘रामराज्य’ स्थापित करने का सपना साकार रूप ले सकता है।

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