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आज का चिंतन

वेदवाणी: सरस्वती में मिलने वाली पांच नदियां

💐वेद का गूढ़ ज्ञान *💐 🌺पंञ्च नद्यु: सरस्वतीमपि यन्ति सस्त्रोतम:। सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्सरित्‌।। **यजुर्वेद* 34/11 🌹 *भावार्थ:* इस मंत्र में किसी भौतिक नदी का वर्णन नहीं है। यहां सरस्वती नदी का अभिप्राय जीवात्मा से है। पांच नदियां पांच ज्ञानेन्द्रियों की सूचक हैं। पांच विषयों रूप,रस,शब्द, स्पर्श और गंध में से एक-एक उनका स्त्रोत है। अपने अपने विषय के प्रवाह के साथ यह सरस्वती नदी अर्थात आत्मा को प्राप्त होती हैं। आत्मा इन विषयों को ग्रहण करता और भोगता भी है। सरस्वती शब्द का अर्थ है प्रवाह वाली। शरीर आते-जाते रहते हैं, आत्मा का प्रवाह बना रहता है। श्रोत्र इंद्रीय आत्मा में शब्द को पहुंचाती है, त्वचा स्पर्श का बोध कराती है, चक्षु रूप को दिखाती है, जिव्हा रस का और नासिका गंध का अनुभव कराती है। आत्मा पांच प्रकार के अलग-अलग संस्कारों के साथ व्यवहार करने लगता है।

कभी तो अज्ञान के कारण पापवासनाओ का प्रवाह बहने लग जाता है और कभी सुसंस्कारों के जागने के कारण अच्छे भावों का प्रवाह बहने लग जाता है। शरीर आत्मा का देश है। वहां आत्मा की सरित सरस्वती में पांच ज्ञानेन्द्रियों के संस्कार की नदियां अपने अपने विषय का प्रवाह बहाती है ‌। जब तक ये पांचों नदियां चल रही हैं शरीर में स्थित आत्मा की नदी सरस्वती भी पांच प्रकार की बहती रहेगी। नदियों के स्त्रोत अर्थात ज्ञानेन्द्रियों को बंद कर दो तो प्रवाह एक ही रह जाएगा। जब मन के साथ पांच ज्ञानेन्द्रियां ठहर जाती हैं और बुद्धि भी काम नहीं करती उसे परमगति कहते हैं।।….. 🍁 विचाराधीन मंत्रराज का शब्दार्थ इस प्रकार से है। ( सस्त्रोतम्: ) स्त्रोत सहित ( पंच नद्य: ) पांच नदियां ( सरस्वतीम् ) सरस्वती ( अपि यन्ति ) भी चलती है। ( सा+ उ+ सरस्वती ) वही सरस्वती ( तु ) भी ( देशे ) देश में ( पञ्चधा सरित अभवत् ) पांच प्रकार की नदी हो गई है ।। 🌺

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