ऋषि दयानंद का गुरु विरजानंद से विद्या प्राप्ति का उद्देश्य और उसका परिणाम

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ओ३म्
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ऋषि दयानन्द ने सच्चे शिव वा ईश्वर को जानने के लिए अपने पितृ गृह का त्याग किया था। इसके बाद वह धर्म ज्ञानियों व योगियों की तलाश कर उनसे ईश्वर के सत्यस्वरूप व उसकी प्राप्ति के उपाय जानने में तत्पर हुए थे। देश के अनेक स्थानों पर वह इस उद्देश्य की पूर्ति में गये और अनेक विद्वानों, धर्म गुरुओं व योगियों के सम्पर्क में आये। जिनसे जो ज्ञान व क्रियात्मक योग का प्रशिक्षण उनको प्राप्त हो सकता था, वह उन्हें प्राप्त किया था। कालान्तर में वह धर्म गुरु व शीर्ष वैदिक विद्वान एवं सच्चे योगी बने। उनके समान ज्ञान प्राप्ति की अवस्था जो उन दिनों बड़े-बड़े धर्म गुरुओं की नहीं होती थी, वह उसे प्राप्त कर भी सन्तुष्ट नहीं हुए। उनमें विद्या की और अधिक वृद्धि की भावना बनी हुई थी। उनकी कुछ शंकायें भी रही होंगी जो वह समझते थे कि किसी सच्चे विद्वान गुरु को प्राप्त होने पर दूर हो जायेंगी। इस लिये वह सन् 1860 में मथुरा के दण्डी-स्वामी प्रज्ञा-चक्षु गुरु विरजानन्द सरस्वती जी को प्राप्त हुए। यहां आने से लगभग तीन वर्ष पहले सन् 1857 में देश में स्वतन्त्रता का प्रथम संग्राम हो चुका था। आजादी प्राप्ति का यह प्रयत्न विफल रहा था। इसके विफल होने पर अंग्रेजों ने इस क्रान्ति में सम्मिलित सभी लोगों को कठोर दण्ड दिया जिसमें अधिकांश का वध कर दिया था। हजारों की संख्या में लोग मार डाले गये थे। ऐसा बताया जाता है कि क्रान्तिकारियों को मारकर उनके शवों को चैराहों पर पेड़ों आदि पर लटका दिया गया था जिससे भविष्य में कोई क्रान्तिकारी अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष व आन्दोलन का साहस न कर सके। ऋषि दयानन्द इस क्रान्ति के प्रत्यक्ष दर्शी थे। वह कहां थे, इसे उन्होंने अंग्रेजों का दमनकारी शासनकाल होने के कारण प्रकट नहीं किया। सत्यार्थप्रकाश आदि में उन्होंने जो कुछ घटनायें लिखी हैं उससे उनके इस स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका होने का अनुमान होता है परन्तु उन सब घटनाओं को इतिहास के परिप्रेक्ष्य में तिथि, स्थान व समय के अनुसार सिलसिलेवार रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। ऋषि दयानन्द तो क्या किसी भी क्रान्तिकारी से उसके 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में भूमिका व कार्यों का विस्तृत वर्णन करने की अपेक्षा नहीं की जाती। अतः हमें इतना ही स्वीकार करना पड़ता है कि उनकी इस संघर्ष में सक्रिय भूमिका रही है।

स्वामी दयानन्द देश की स्वतन्त्रता के निर्भीक व साहसी पोषक एवं समर्थक थे। इसका प्रमाण उनके सत्यार्थप्रकाश एवं अन्य ग्रन्थों में प्रस्तुत विचारों से चलता है। सत्यार्थप्रकाश में तो उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि स्वदेशी राज्य सर्वोपरि उत्तम होता है अथवा मत-मतान्तर के आग्रह रहित, अपने और पराये का पक्षपातशून्य, प्रजा पर पिता माता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों (अंग्रेजों) का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है। अंग्रेजी राज्य में सन् 1883 व उससे इतने स्पष्ट शब्दों में स्वदेशी शासन का समर्थन व विदेशी राज्य का विरोध किसी अन्य धार्मिक पुरुष ने नहीं किया। अनेक धार्मिक पुरुष व संगठन तो अंग्रेजों के राज्य के समर्थक थे अथवा मौन थे। अतः स्वामी दयानन्द एक अनूठे देशभक्त, स्वराज्य के मंत्रदाता, उसके पोषक, निर्भीक व साहसी संन्यासी थे जो देश को स्वतन्त्र देखना चाहते थे। उनके यह विचार अनायास नहीं बने थे अपितु अनुमान है कि यह सन् 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के समय से पूर्व से निरन्तर चले आ रहे थे जिन्हें शब्दरूप उन्होंने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ लिखते समय दिया था।

1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की विफलता के बाद ऋषि दयानन्द ने विद्या प्राप्ति को अपना लक्ष्य निर्धारित किया। योग में कृतकार्यता वह पहले ही प्राप्त कर चुके थे। उनके स्थान पर कोई और व्यक्ति होता तो वह अपनी योग की उपलब्धियों से ही सन्तुष्ट हो जाता परन्तु ऋषि दयानन्द विरले महापुरुष थे जिनसे भविष्य में देश का उपकार होना था। अतः ऋषि दयानन्द ने विद्या प्राप्ति के मार्ग को चुना और विद्या प्राप्त कर देश से सभी अन्धविश्वास तथा सामाजिक बुराईयों को दूर करने का अपूर्व, महनीय एवं प्रभावशाली कार्य किया। उन्होंने देश से अविद्या दूर करने सहित विद्या के प्रसार का भी देशवासियों को मन्त्र दिया। आर्यसमाज का आठवां नियम है कि सब मनुष्यों को ‘अविद्या का नाश तथा विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।’ स्वामी दयानन्द ने मथुरा में गुरु विरजानन्द की पाठशाला में वेदांग व्याकरण पढ़ा और इसके द्वारा सत्य वेदार्थ को प्राप्त किया। अपने गुरु से उन्हें देश में अन्धविश्वासों व प्रचलित अविद्या-अज्ञान-अंधविश्वासों के कारणों एवं उनके निवारण के उपायों पर चर्चा करने का भी अनेक बार अवसर मिला होगा। इसका कारण यह है कि स्वामी दयानन्द व गुरु विरजानन्द दोनों ही अपने अपने स्वभाव से देश तथा वैदिक धर्म के अनन्य प्रेमी महापुरुष थे। इस अनुमान की पुष्टि ऋषि दयानन्द की विद्या पूरी होने के बाद गुरु दक्षिणा के अवसर पर गुरु विरजानन्द जी के स्वामी दयानन्द को दिये परामर्श से स्पष्ट हो जाती है जिसमें उन्होंने ऋषि दयानन्द को देश व समाज से अविद्या, अन्धविश्वासों व सामाजिक कुरीतियों को दूर कर वैदिक धर्म का प्रचार प्रसार करने की प्रेरणा की थी। गुरुजी ने यह परामर्श दिया और ऋषि दयानन्द ने इसे तत्क्षण स्वीकार कर लिया था। इससे यह भी अनुमान होता है कि परमात्मा की भी ऐसी ही इच्छा थी जिसे इन दोनों महापुरुषों ने मिलकर साकार करने का प्रयत्न किया था।

ऋषि दयानन्द गुरु विरजानन्द सरस्वती को प्राप्त होने से पूर्व अपने योग गुरु श्री ज्वालानन्द पुरी तथा श्री शिवानन्द गिरी जी के प्रशिक्षण में योग की उच्च स्थिति समाधि को प्राप्त हो चुके थे। उन दिनों देश में वैदिक सनातन धर्म व पुराणों विषयक जो व जितना ज्ञान उपलब्ध था उसे भी वह प्राप्त कर चुके थे। वह पुराणों व उसके आधार पर किये जाने वाले कृत्यों को सत्य एव आचरण करने योग्य स्वीकार नहीं करते थे। वेद अभी उनकी पहुंच से दूर प्रतीत होते हैं। वेदों का नाम पुराणों, उपनिषदों एवं दर्शनों में प्रमुखता से आता है अतः वेदों के नाम से तो वह निश्चय ही परिचित थे परन्तु वेदों का अध्ययन व उनकी परीक्षा करना शेष था। उनकी इस इच्छा की पूर्ति ही दण्डी गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती से हुई थी। यह भी तथ्य प्रतीत होता है कि गुरु विरजानन्द जी से उन्होंने वेदांगों का अध्ययन किया था परन्तु वेदों का क्रम से मन्त्र व उसके वेदार्थ का अध्ययन उन्होेने अपनी वेदांगों की योग्यता के आधार पर गुरु दक्षिणा के बाद सम्पन्न किया। वेदों की परीक्षा कर लेने पर उनके सम्मुख पुराणों की अविश्वसनीय एवं कल्पित बातों का वेद विरुद्ध होना स्पष्ट हो गया था। इसी कारण उन्होंने वेदों को स्वतः प्रमाण बताया और अन्य उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, वाल्मीकि रामायण तथा महाभारत आदि की बातों को वेदानुकूल होने पर ही स्वीकार करने अन्यथा उन्हें अस्वीकार किया। देश विदेश का कोई वेद व मत-मतान्तरों का विद्वान उनके धर्म व मत-मतान्तरों की अवैदिक एवं वेदविरुद्ध बातों का खण्डन नहीं कर सका। काशी में 16 नवम्बर, सन् 1869 को मूर्तिपूजा की वेदानुकूलता पर सम्पन्न काशी शास्त्रार्थ में उन्होंने अकेले काशी व देश के लगभग 30 शीर्ष सनातनी विद्वानों को परास्त किया थां। अन्य अनेक अवसरों पर भी सनातनी विद्वानों सहित ईसाई व मुस्लिम विद्वानों को भी उन्होंने शास्त्रार्थ व धर्म चर्चाओं में निरुत्तर किया था और विधर्मियों की सभी जिज्ञासाओं का समाधान किया था।

ऋषि दयानन्द ने वेद धर्म प्रचार के लिये 10 अप्रैल, 1875 को मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की थी। कालान्तर में देश विदेश में इसकी इकाईयां व शाखायें स्थापित हुईं जिन्होंने वेद धर्म प्रचार सहित विधर्मियों द्वारा छल, बल व लोभ से हिन्दुओं व आदिवासियों के धर्मान्तरण पर रोक लगाने व उसे नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आर्यसमाज के प्रचार से देशी व विदेशी मतों के अनेक विद्वानों ने भी स्वेच्छा से सत्य वैदिक धर्म को स्वीकार किया। ऋषि दयानन्द के समय में देश शिक्षा की दृष्टि से अविद्या से ग्रस्त था। ऋषि दयानन्द के बाद उनके अनुयायियों ने देश भर में गुरुकुल एवं डी.ए.वी. स्कूल व कालेज स्थापित कर देश में शिक्षा में सुधार कर एक बड़े अभाव को दूर किया। आर्यसमाज ने देश में प्रचलित सभी अन्धविश्वासों एवं सामाजिक कुप्रथाओं पर भी प्रहार किये जिससे विगत लगभग 155 वर्षों में देश में अनेक अन्धविश्वास समाप्त हुए तथा अनेक कम हुए हैं। सामजिक कुरितियां भी काफी कम व समाप्त हुई हैं। हिन्दुओं के ईसाई व मुसलमान बनाने की गति को भी आर्यसमाज ने कम व बन्द किया। बाल विवाह बन्द हुए, गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित जन्मना जाति तोड़कर तथा प्रेम विवाहों का समाज में प्रचलन हुआ। इसके साथ ही देश में विधवाओं के विवाहों को भी मान्यता मिली। दलितोद्धार का प्रशंसनीय कार्य भी आर्यसमाज ने किया। सामाजिक असमानता तथा एतद्विषयक मान्यताओं को दूर करने में भी आर्यसमाज को सफलता मिली। अनेक दलित एवं पौराणिक देवियां भी आर्यसमाज के कारण वेदों का अध्ययन कर सकीं और वेद विदुषी व पुरुष विद्वान बन कर उन्होंने विद्यालयों व महाविद्यालयों में संस्कृत के वक्ता, प्रवक्ता तथा प्रोफेसर आदि पदों को सुशोभित किया। देश को सभी वर्णों में से अनेक वेद भाष्यकार मिले। अनेक वेद विदुषी स्त्रियां वेद पारायण महायज्ञों की ब्रह्मा बनती हैं व छात्रायें यज्ञों में मंत्रोच्चार करती हैं जो पौराणिक वेद विरुद्ध मान्यताओं के विपरीत है एवं समाज व देश के लिए हितकर है। आर्यसमाजों में अनेक दलित जाति के भाई वेद पढ़कर पुरोहित का कार्य विगत डेढ़ शताब्दी से कर करा रहे हैं। देश की आजादी में आर्यसमाज का सर्वोपरि योगदान है। देश में ज्ञान व विज्ञान की जो उन्नति हुई है उसमें भी हमें भूमिका में ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज ही दृष्टिगोचर होते हैं। यह सब देश हित व समाज उन्नति के कार्य ऋषि दयानन्द और उनके आर्यसमाज की देश व समाज को देन हैं।

ऋषि दयानन्द ने योग में प्रवीणता प्राप्त कर विद्या प्राप्ति का जो संकल्प किया उसके आंशिक रूप से पूरा होने से उन्हें व देश को अकथनीय लाभ हुआ। यदि ऋषि दयानन्द न आते और वेदप्रचार न करते तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि देश, हिन्दू मत व इसके अनुयायियों की आज क्या स्थिति होती? आर्यसमाज ने वेद प्रचार कर हिन्दुओं व उनके अस्तित्व सहित वैदिक सनातन धर्म की रक्षा की है। यह सब प्रयोजन ऋषि दयानन्द के विद्या प्राप्ति के व्रत व उसके सफल क्रियान्वयन से सिद्ध हुए हैं। हम गुरु विरजानन्द और ऋषि दयानन्द को उनके वेद प्रचार, देश व समाज सुधार तथा अन्य सभी मानवतावादी कार्यों के लिये नमन करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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