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झारखंड में विद्यमान है सारे देश को स्वस्थ रखने की अपार संभावनाएं

हमारे देश का झारखंड एक ऐसा प्रांत है जिसमें अपार संभावनाएं छिपी हुई हैं । झारखंड का जन्म भी इसी आशा और अपेक्षा से हुआ था कि यहां के लोग अलग राज्य बनने के बाद अपना सुनियोजित विकास होते हुए देख पाएंगे । यह अलग बात है कि राजनीति के पचड़े , लफड़े और झगड़े में पड़े सारे राजनीतिक दल और विकास के तथाकथित अलंबरदार झारखंड को उस ओर ले चलने का सार्थक और गंभीर प्रयास नहीं कर पाए , जिनके कारण इस राज्य का निर्माण हुआ था।
इस प्रांत की अपार संभावनाओं को खोजा व तलाशा जाए तो पता चलता है कि यहां पर पर्यटन का एक बहुत ही शानदार भविष्य है । इस राज्य के निर्माण से लेकर अब तक किसी भी सरकार ने इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किया , अन्यथा यहां पर वन्यजीवों को सुरक्षित और संरक्षित स्थान देकर उनके लिए पर्यटकों को खींचा जा सकता था ।

यहां पर वनौषधियों के माध्यम से पूरे देश को नहीं बल्कि सारे संसार को स्वस्थ रखने की अपार संभावनाएं हैं। परंतु सारा वन क्षेत्र यूं ही उपेक्षित हुआ पड़ा है । हां , कुछ ऐसे जुल्मी , राक्षसी और समाज विरोधी लोगों ने वनों को काटना अवश्य आरंभ किया है जो इन वनों में अपार खनिज सम्पदा खोजने की लालसा रखते हैं। यह अलग बात है कि इन वनों के कटान से प्राकृतिक संतुलन गड़बड़ा रहा है और पर्यावरण के लिए एक गंभीर संकट खड़ा होता जा रहा है।
यह ज्ञात होना चाहिए कि सारंडा के जंगलों में एक दशक पहले तक बंगाल, ओडिशा से पर्यटक आते रहे थे । सुरक्षा कारणों से अब उनकी संख्या लगभग शून्य हो चुकी है। यहाँ की सरकारों को चाहिए था कि वे पर्यटन को बढ़ावा देने वाली संभावनाओं को तलाशतीं और उन पर काम कर इस प्रदेश को पर्यटक क्षेत्र के रूप में विकसित कर यहां के लोगों के आर्थिक स्तर को ऊंचा उठाती ।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हमने औषधियों के मामले में विदेशी कंपनियों पर अधिक भरोसा किया है । जबकि होना यह चाहिए था कि अपनी आयुर्वेद की चिकित्सा प्रणाली को वैश्विक चिकित्सा प्रणाली के रूप में स्थापित करने की दिशा में कार्य किया जाता । कमीशनखोर राजनीति ने विदेशी कंपनियों से कमीशन लेने के चक्कर में अपने लोगों के रोजगार के अवसरों को समाप्त किया और विदेशी कंपनियों के द्वारा दवाई के नाम पर परोसे जा रहे जहर को अपने नागरिकों की नसों में चढ़ने दिया। उसी का परिणाम यह हुआ कि आज देश का बहुत बड़ा वर्ग बीमार है । एक रिपोर्ट के अनुसार देश की एक अरब पैंतीस करोड़ की जनसंख्या में से एक अरब दस करोड़ लोग बीमार हैं । इसका कारण यह है कि लोगों को स्वस्थ रखने की जिम्मेदारी लेने वाले लोगों में जनसेवा का मूलभूत संस्कार विलुप्त हो गया है। यदि ईमानदारी से प्रयास किए जाते तो झारखंड के वनों का और उनमें मिलने वाली औषधियों का मनुष्य स्वास्थ्य के लिए उपयोग करते हुए न केवल सारे झारखंड को बल्कि देश के लोगों के एक बहुत बड़े समुदाय को रोजगार दिया जा सकता था।

भारत सरकार की गलत नीतियों के चलते भारत से बाहर ऐसी टीमें भेजी जाती रहीं जिनके सदस्य बाहर जाकर मौज मस्ती व गुलछर्रे उड़ाते रहे और वहाँ से आकर विदेशी कंपनियों से अनुबंधों के प्रस्ताव या कागजात सरकारों को सौंपते रहे । बदले में अपना लाभ प्राप्त करते रहे । यदि यही टीमें झारखंड की वन औषधियों का आकलन करने के लिए भेजी जातीं अर्थात इस बात पर सर्वे कराया जाता कि यहां पर कौन-कौन सी बीमारियों को ठीक करने की औषधियां उपलब्ध हो सकती हैं और किस प्रकार उनका उपयोग मानव स्वास्थ्य के लिए किया जा सकता है , तो कुछ और ही बात होती। इस कार्य में झारखंड के स्थानीय लोगों की सहायता भी ली जा सकती थी क्योंकि वह परंपरा से ऐसी वन औषधियों का सेवन करने के अभ्यासी रहे हैं जिनसे बड़े से बड़ा रोग भी शांत हो जाता है।
आजादी के बाद हमारे राजनीतिक तंत्र में एक भारी दोष यह भी देखने में आया है कि यहां पर डिग्रीधारियों पर अधिक विश्वास किया जाता है अपेक्षाकृत उन लोगों के जो परंपरा से इन तथाकथित डिग्रीधारी विद्वानों से कहीं अधिक ज्ञान रखते हैं । यही कारण है कि परंपरागत रूप से अपने कार्य में माहिर इन वास्तविक कुशल लोगों की उपेक्षा कर इन्हें हाशिए पर ले जाकर भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया गया । जबकि तथाकथित डिग्रीधारी विद्वानों की मूर्खतापूर्ण बातों को मानने का सरकार ने एक फैशन सा आरंभ कर दिया।
मैं अपनी बात को इस उदाहरण से और अधिक तरीके से स्पष्ट कर सकता हूं कि अभी पिछले दिनों 27 मई को मेरे ऑफिस में बाहर से एक सांप आ घुसा। जिसे जब देखा गया तो उसे पकड़वाने के लिए वन विभाग की टीम को फोन किया गया । साथ ही परंपरागत रूप से सांपों को पकड़ने के लिए जाने जाने वाले सपेरों को भी बुलवाया गया । जब वन विभाग की टीम मेरे यहाँ आई तो उसने सांप के छुपे होने के कारण उसे पकड़ने में अपनी असमर्थता व्यक्त की और यह कह दिया कि जब दोबारा दिखाई दे तो आप हमको फोन कर देना । जबकि सपेरों ने सांप को सफलतापूर्वक सकुशल न केवल पकड़ लिया, बल्कि उसे जीवित कहीं दूर जाकर जंगलों में छोड़ भी दिया । कहने का अभिप्राय है कि वन विभाग की टीम परंपरागत रूप से अपने काम में पारंगत इन सपेरों की अपेक्षा कहीं अधिक अक्षम और निकम्मी साबित हुई।
तब मैं सोच रहा था कि देश की सरकार को चाहिए कि परंपरा से अपने पेशे में कुशल लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान करते हुए इन्हें वन विभाग में सांप आदि के पकड़ने की जिम्मेदारी देकर इनके जीवन स्तर को सुधारने की दिशा में काम करना चाहिए। इसके लिए यह आवश्यक नहीं कि उनके पास डिग्री ही हो , बल्कि उनकी कुशलता का मापदंड निर्धारित कर उसी के आधार पर इन्हें कार्य दिया जाए । इससे हमारे समाज की मरती हुई जीवन परंपरा को सुरक्षित रखने में सहायता मिलेगी। यही बात हमें झारखंड के मूल निवासी आदिवासियों के बारे में सोचनी व समझनी चाहिए । हम उन्हें अपने क्षेत्र का विशेषज्ञ मानकर उनसे सलाह लें और उनकी जीवनशैली को परख कर उसके अनुसार यह सुनिश्चित करें कि मनुष्य को स्वस्थ रखने में उनकी जीवन शैली और उनके अनुभव का कैसे लाभ लिया जा सकता है ?
20वीं सदी के प्रारम्भ से इस क्षेत्र में खनन और औद्योगीकरण के विकास ने वनौषधियों के इन आश्रय स्थलों का निर्ममतापूर्वक विनाश करना आरंभ किया।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि झारखंड के मूल निवासी कहीं अधिक स्वस्थ और हष्ट पुष्ट दिखाई देते हैं । इसका कारण केवल यही है कि वह तथाकथित सभ्य समाज की अपेक्षा बहुत कम उन साधनों का उपयोग कर पाते हैं जिन्हें आधुनिक मनुष्य अपनी जीवन शैली का एक आवश्यक अंग बना चुके हैं। इसके उपरांत भी वे स्वस्थ और हष्ट पुष्ट केवल इसलिए रह पाते हैं कि वह इन सब लोगों की अपेक्षा प्रकृति के कहीं अधिक निकट रहते हैं । प्रकृति का सानिध्य बनाकर रहने में और प्रकृति के साथ मित्रता पूर्वक व्यवहार करने से उनके भीतर रोग निरोधक क्षमता भी उन लोगों से कहीं अधिक होती है जो आलीशान बंगलों में रहकर अपने आपको कहीं अधिक मजबूत और ताकतवर मानते हैं।
इन लोगों के जीवन स्तर को सुधारने और झारखंड के वन औषधि के भंडार का उचित संरक्षण करने की दिशा में सरकारें आज भी काम करें तो झारखंड के इन मूलनिवासी आदिवासियों को न केवल एक नया जीवन मिलेगा बल्कि यह देश को भी एक नया जीवन दे सकेंगे । हमें यह भूल जाना चाहिए कि आदिवासियों को हम रोजगार देंगे या नया जीवन देंगे बल्कि यह समझ कर चलना चाहिए कि यह आदिवासी ही हम को नया जीवन देने की क्षमता रखते हैं । आवश्यकता बस सरकार की नीतियों में सकारात्मक परिवर्तन कराने की है। इसके लिए आवश्यक है कि तेजी से सिमटते जंगलों और वन औषधि संपन्न क्षेत्रों का कटान तुरंत रोका जाए । मानव मात्र को बचाने के लिए ऐसा किया जाना समय की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों की दृष्टि में झारखंड के वन मुख्यत: आर्द्र पर्णपाती एवं शुष्क पर्णपाती वन के रूप में पाए जाते हैं। आर्द्र पर्णपाती वनों का विस्तार झारखंड में अधिक है। इसके वृक्ष ऊँचे और मोटे होते हैं। सखुआ इस जंगल का सबसे प्रमुख वृक्ष है। आम, कटहल, जामुन, जुग्नफर आदि अन्य वृक्ष हैं, जिनमें पतझड़ के मौसम में भी पत्ते लगे रहते हैं। महुआ छोटानागपुर का सामान्य वृक्ष है, पर जंगलों में यह मुख्य रूप से पहाड़ी और ऊँचे शुष्क क्षेत्रों तक सीमित है। टून, शीशम, सागवान, हर्रे, करम, कुसुम और पैसार कुछ बहुमूल्य इमारती लकड़ियों के पेड़ यहाँ के मूल वृक्ष नहीं हैं, पर यहाँ इनका पर्याप्त विकास हुआ है। शुष्क पर्णपाती वनों के वृक्ष होते हैं और जंगल कम घने होते हैं। यहाँ के जंगलों में शीशम, खैर, बेर, पलास और छोटे बाँस अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।
वनों के वितरण की दृष्टि से रांची, हजारीबाग, खूँटी, पलामू, चतरा, दुमका, लातेहार और सिंहभूम जिले अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, जहाँ की लगभग आधी धरती जंगलों से भरी है। यातायात के सुगम साधनों के विकास के कारण रांची और हजारीबाग के जंगलों का सबसे अधिक दोहन हुआ है।
आज मानव अपने पैरों पर अपने आप कुल्हाड़ी मारने का काम कर रहा है और वनक्षेत्रों को तेजी से काटता हुआ आगे बढ़ रहा है । ऐसा लगता है कि जैसे उसने प्रकृति के विरुद्ध ही महाभारत छेड़ दिया है। हर व्यक्ति अपने आप में महारथी बनकर तेजी से धुआंधार बाण वर्षा करता हुआ आगे बढ़ रहा है। यद्यपि प्राकृतिक शक्तियां अपने आप में मनुष्य से बहुत अधिक शक्ति संपन्न होती हैं । जब प्रकृति का कहर टूटता है तो मनुष्य को अपनी सीमाओं का बोध अपने आप हो जाता है परंतु विनाश से पहले ही सद्बुद्धि आ जाए तो कहीं अधिक अच्छा है , इसलिए वन औषधि संपन्न झारखंड के वनों को उन लोगों के चंगुल से मुक्त कराया जाना समय की आवश्यकता है जो यहां खनिज संपदाओं की खोज में आकर धड़ाधड़ वनों का कटान करते जा रहे हैं । ऐसे लोगों से भी इस क्षेत्र की मुक्ति आवश्यक है जो निहित स्वार्थ में जंगलों में आग लगा देते हैं और देश की भारी संपदा को थोड़ी देर में जलाकर खाक कर देते हैं। ऐसे लोगों को मानवता का शत्रु घोषित कर उनके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्यवाही की जानी अपेक्षित है।
विशेषज्ञों की मानें तो झारखंड के वनों में वनौषधियों का जो भंडार है, वह पूरे विश्व के जंगलों में नहीं है। सर्वेक्षण रिपोर्ट बार-बार कह रही है कि झारखंड की जड़ी-बूटियाँ निरन्तर विलुप्त हो रही हैं। सर्पगंधा, कुसुम, रत्ति, आँवला, हर्रे, बहेड़ा आदि के फल, जड़ एवं छाल की व्यापक पैमाने पर इन जंगलों से चोरी हो रही है। वनाधिकार कानून तथा अन्य संवैधानिक प्रावधानों के तहत वनवासियों को वनोत्पादों के उपयोग की छूट दी गई है। इसका अवैध लाभ जंगल से बाहर के लोग उठा रहे हैं।
पूरे झारखंड में ऐसे आपराधिक तत्व सक्रिय दिखाई देते हैं जो वन औषधियों का दोहन कर या फिर इस प्रांत की प्राकृतिक संपदा का विनाश करने में रुचि ले रहे हैं । यहां के मूल निवासी आदिवासियों को थोड़े बहुत पैसे मिल जाते हैं और वे उन्हीं में गुजारा कर लेते हैं । आज उनकी नादानी भरी जिंदगी उनके भविष्य को चौपट करने वाली सिद्ध हो रही है। उनमें से कोई भी यह सोचने की क्षमता तक नहीं रखता कि उनकी आने वाली पीढ़ियों का क्या हाल होगा ? जो लोग समझते हैं वह चुप हैं और चुपचाप अपनी रोजी-रोटी में लगे हुए हैं । जबकि जो इन प्राकृतिक शक्तियों और संपदाओं का दोहन कर अधिक से अधिक लाभ अर्जित करना चाहते हैं वे इस खेल में दिन-रात लगे हुए हैं । निश्चित रूप से इस खेल में राजनीतिक पार्टियों के नेताओं का भी सहयोग व सहभागिता है। इसके अतिरिक्त भूमाफिया किस्म के लोग और सत्ता में बैठे शासन प्रशासन के लोग भी कहीं ना कहीं इस सारे कार्य में संलिप्त हैं। यही कारण है कि जो लोग इस धंधे में लगे हुए हैं वे चोरी-छिपे इन जड़ी-बूटियों को बाहर के व्यापारियों को अच्छी रकम लेकर बेचते जा रहे हैं। तस्करी कार्य नेपाल के रास्ते धड़ल्ले से हो रहा है।
सारी राजनीति बौनी और घिनौनी होकर रह गई है। सत्ता में आने के लिए लोग चुनाव लड़ते हैं और सत्ता में बने रहने के लिए लोग पैसा बटोरते हैं । यह अलग बात है कि वे जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाते तो फिर जनता उनको हटाकर दूसरी पार्टी को इस उम्मीद के साथ सरकार बनाने का अवसर प्रदान करती है कि शायद इसके आने से उनके दिन बदलेंगे ? परंतु अगली सरकार भी नई बोतल में पुरानी शराब ही सिद्ध होती है और वह भी आकर पुरानी वाली सरकार के ढर्रे पर ही एक काम करने लगती है। इससे पता चलता है कि झारखंड के लोगों के भाग्य पर अभी ताले लगे हुए हैं । अभी वह दिन दूर है जब कोई ऐसी जन हितेषी सरकार यहाँ आएगी जो यहां के प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग करते हुए यहां के मूल निवासियों का जीवन स्तर सुधारने की दिशा में ठोस काम करेगी और यहां के वन औषधीय भंडार का सारे देश के लिए ही नहीं बल्कि सारे संसार के लिए सदुपयोग करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम करेगी।
वैसे इस समय उम्मीद की एक किरण भी दिखाई दे रही है । केंद्र की मोदी सरकार ने आयुष मंत्रालय को स्थापित कर इस दिशा में एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक कदम उठाया है । सरकार की इस सार्थक पहल से उम्मीद की एक किरण अवश्य ही दिखाई देती है कि कभी ना कभी झारखंड के वन औषधीय महत्व को सरकार समझेगी और जब यहां के वनों का सदुपयोग करते हुए पूरे देश और संसार के लिए मनुष्य को स्वस्थ रखने की प्राकृतिक औषधियां तैयार की जाएंगी तो यहां के लोगों का न केवल जीवन स्तर सुधरेगा बल्कि वह अपने आप को आधुनिक कहलाने में भी आनंद अनुभव करेंगे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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